"कामन्दकीय नीतिसार" के अवतरणों में अंतर

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'''कामंदकीय नीतिसार''' [[राजनीति|राज्यशास्त्र]] का एक [[संस्कृत]] ग्रंथ है। इसके रचयिता का नाम 'कामंदकि' अथवा 'कामंदक' है जिससे यह साधारणत: 'कामन्दकीय' नाम से प्रसिद्ध है। वास्तव में यह ग्रंथ [[कौटिल्य]] के [[अर्थशास्त्र ग्रन्थ|अर्थशास्त्र]] के सारभूत सिद्धांतों (मुख्यत: राजनीति विद्या) का प्रतिपादन करता है। यह श्लोकों में रूप में है। इसकी भाषा अत्यन्त सरल है।
 
नीतिसार के आरम्भ में ही विष्णुगुप्त चाणक्य की प्रशंशा की गयी है-
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वंशे विशालवंश्यानाम् ऋषीणामिव भूयसाम् ।
अप्रतिग्राहकाणां यो बभूव भुवि विश्रुतः ॥
जातवेदा इवार्चिष्मान् वेदान् वेदविदांवरः ।
योधीतवान् सुचतुरः चतुरोऽप्येकवेदवत् ।।
यस्याभिचारवज्रेण वज्रज्वलनतेजसः ।
पपात मूलतः श्रीमान् सुपर्वा नन्दपर्वतः ॥
एकाकी मन्त्रशक्त्या यः शक्त्या शक्तिधरोपमः ।
आजहार नृचन्द्राय चन्द्रगुप्ताय मेदिनीम् ।।
नीतिशास्त्रामृतं धीमान् अर्थशास्त्रमहोदधेः ।
समुद्दद्ध्रे नमस्तस्मै विष्णुगुप्ताय वेधसे ॥ इति ॥
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== रचनाकाल ==