"वेद" के अवतरणों में अंतर

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== वैदिक वाङ्ममय का वर्गीकरण ==
 
वर्तमान काल में वेद चार हैं- लेकिन पहले ये एक ही थे । बाद में वेद को पढ़ना बहुत कठिन प्रतीत होने लगा, इसलिए उसी एक वेद के तीन या चार विभाग किए गए । तब उनको '''वेदत्रयी''' अथवा '''चतुर्वेद''' कहने लगे । मंत्रों का प्रकार और आशय यानि अर्थ काके आधार पर वर्गीकरण किया गया । काइसका आधार इस प्रकार है -
 
=== वेदत्रयी ===
प्रत्येक वेद की अनेक शाखाएं यानि व्याख्यान का तरीका बतायी गयी हैं। ऋषि पतञ्जलि के महाभाष्य के अनुसार ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1001, अर्थववेद की 91 इस प्रकार 1131 शाखाएं हैं परन्तु 12 शाखाएं ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैं। वेद की प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्दराशि चार भागों में उपलब्ध है: 1. [[संहिता]] 2. [[ब्राह्मण]] 3. [[आरण्यक]] 4. [[उपनिषद्]]। '''इनमें संहिता को ही वेद माना जाता है'''। शेष वेदों के व्याख्या ग्रन्थ हैं
 
अलग शाखाओं में मूल संहिता तो वही रहती हैं लेकिन आरण्यक और ब्राह्मण ग्रंथों में अन्तर आ जाता है । मंत्र भाग में भी क्रम परिवर्तन या बारंबरता जैसे बदलाव मिलते हैं । पुराने समय में इतनी शाखाओं के बाद भी आजकल कुल ९ शाखाओं के ही ग्रंथ मिलते हैं ।
 
 
==वेदों के विषय==
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