"कुरुक्षेत्र" के अवतरणों में अंतर

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== पौराणिक कथा ==
कुरू ने जिस क्षेत्र को बार-बार जोता था, उसका नाम कुरूक्षेत्र पड़ा। कहते हैं कि जब कुरू बहुत मनोयोग से इस क्षेत्र की जुताई कर रहे थे तब इन्द्र ने उनसे जाकर इस परिश्रम का कारण पूछा। कुरू ने कहा-'जो भी व्यक्ति यहाँ मारा जायेगा, वह पुण्य लोक में जायेगा।' इन्द्र उनका परिहास करते हुए स्वर्गलोक चले गये। ऐसा अनेक बार हुआ। इन्द्र ने देवताओं को भी बतलाया। देवताओं ने इन्द्र से कहा-'यदि संभव हो तो कुरू को अपने अनुकूल कर लो अन्यथा यदि लोग वहां यज्ञ करके हमारा भाग दिये बिना स्वर्गलोक चले गये तो हमारा भाग नष्ट हो जायेगा।' तब इन्द्र ने पुन: कुरू के पास जाकर कहा-'नरेश्वर, तुम व्यर्थ ही कष्ट कर रहे हो। यदि कोई भी पशु, पक्षी या मनुष्य निराहार रहकर अथवा युद्ध करके यहाँ मारा जायेगा तो स्वर्ग का भागी होगा।' कुरू ने यह बात मान ली। यही स्थान समंत-पंचक अथवा प्रजापति की उत्तरवेदी कहलाता है।
श्रीमन नारायण नारायण ।अखबार का कारनामा कुरूक्षेत्र के इतिहास के स्वरूप को बदलने का प्रयास । कुरूक्षेत्र का नाम कुरूक्षेत्र _धर्मक्षेत्र कैसे पड़ा इसके बारे महाभारत मे उल्लिखित किया गया है जब शौनक जी को सुत जी बताते हैकि आदि काल से ही यह क्षेत्र युद्ध क्षेत्र रहा है। इसी धरती पर वशिष्ट जी और विश्वामित्रजी के साथ युद्ध हुआ था।इसी धरती पर परशुरामजी ने हैहय वंश का नाश किया था। सुत जी कहते है कि ऐसी किवन्दंती है कि एक किसान खेत मे पानी भर रहा था उसी समय उसकी पत्नी खाना लेकर आई थी पति ने कहा जब तक मै भोजन कर रहा हु तब तक तुम काम देखो तब पत्नी पानी रोकने लगी लेकिन पानी रूक नहीं रहा था सो उसने अपने बच्चे को मेढ मे डाल कर चली आयी थी यह घटना बार की बात है भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध स्थल को तय करने के लिए अर्जुन को लेकर यात्रा पर गए थे जहाँ उन्होंने देखा था।यह देखकर प्रभु श्री कृष्ण समझ गए थे कि यह स्थान युद्ध के लिए उपयुक्त है । क्यो कि किसी भी काय॔ के लिये उचित स्थान होता है भगवान् श्रीकृष्ण को डर था कि कही अपने लोगो का रक्त बहते देख कही कौरव पांडव संधि ना कर ले तो इस लिए इसी भूमि का चुनाव किया क्योकि इस भुमि मे मोह नही था। कुरू ने अपने अष्टाड़ भगवान् को दान मे दे दिया था तब भगवान् ने वरदान दिया था कि यह क्षेत्र कुरू क्षेत्र के नाम से जाना जायेगा । चुकि कुरू अष्टाड़धम॔ कि खेती कर रहे थे इसलिए इस क्षेत्र को धर्म क्षेत्र कहा जाता है । क्योंकि धर्म मे क्रोध नही हो ता है लेकिन कुरूक्षेत्र मे तप साहस धर्म सबकुछ था । इस बात का उल्लेख प्रभुदत जी ने भी अपने विचार अपने पुस्तक धर्म राष्ट्र मे किया है । इस बात कि व्याख्या संगमेशवरी शक्ति महापीठ मंदिर विन्दगाँवा भोजपुर के संत पुजयश्री योगा बाबा ने भी गर्थों के आधार पर की है।
[[File:Bhishma Kund-Kurukshetra.JPG|thumb|250px|right|भीष्म कुंड]]
 
== कुरुक्षेत्र के प्रमुख तीर्थ स्थान ==
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