"ब्रज" के अवतरणों में अंतर

15 बैट्स् नीकाले गए ,  3 वर्ष पहले
सम्पादन सारांश रहित
टैग: मोबाइल संपादन मोबाइल वेब सम्पादन
[[चित्र:*Bindrabun -Vrindavan-. Gate of Shet Lukhmeechund's Temple; a photo by Eugene Clutterbuck Impey, 1860's.jpg|right|thumb|300px|शेठ लक्ष्मीचन्द मन्दिर का द्वार (१८६० के दशक का फोटो)]]
'''ब्रज''' शब्द [[संस्कृत]] धातु 'ब्रज' से बना है, जिसका अर्थ गतिशीलता से है। जहां [[गाय]] चरती हैं और विचरण करती हैं वह स्थान भी ब्रज कहा गया है। [[अमरकोश]] के लेखक ने ब्रज के तीन अर्थ प्रस्तुत किये हैं- गोष्ठ (गायों का बाड़ा) मार्ग और वृंद (झुण्ड) १ संस्कृत के वृज शब्द से ही हिन्दी का ब्रजबृज शब्द बना है।
 
वैदिक संहिताओं तथा [[रामायण]], [[महाभारत]] आदि संस्कृत के प्राचीन धर्मग्रंथों में ब्रजबृज शब्द गोशाला, गो-स्थान, गोचर भूमि के अर्थों में भी प्रयुक्त हुआ है। ॠगवेद में यह शब्द गोशाला अथवा गायों के खिरक के रुप में वर्णित है। २ यजुर्वेद में गायों के चरने के स्थान को ब्रजबृज और गोशाला को गोष्ठ कहा गया है। ३ शुक्लयजुर्वेद में सुन्दर सींगों वाली गायों के विचरण स्थान से ब्रजबृज का संकेत मिलता है। ४ अथर्ववेद में गोशलाओं से सम्बधित पूरा सूक्त ही प्रस्तुत है। ५ हरिवंश तथा भागवतपुराणों में यह शब्द गोप बस्त के रुप में प्रयुक्त हुआ है। ६ स्कंदपुराण में महर्षि शांण्डिल्य ने ब्रजबृज शब्द का अर्थ व्थापित वतलाते हुए इसे व्यापक ब्रम्ह का रुप कहा है। ७ अत यह शब्द ब्रज की आध्यात्मिकता से सम्बधित है।
 
वेदों से लेकर पुराणों तक में ब्रज का सम्बध गायों से वर्णित किया गया है। चाहे वह गायों को बांधने का बाडा हो, चाहे गोशाला हो, चाहे गोचर भूमि हो और चाहे गोप-बस्ती हो। भागवतकार की दृष्टि में गोष्ठ, गोकुल और ब्रज समानार्थक हैं। भागवत के आधार पर सूरदास की रचनाओं मे भी ब्रज इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
बेनामी उपयोगकर्ता