"श्राद्ध" के अवतरणों में अंतर

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== श्राद्ध के लाभ ==
 
श्राद्ध करने की इच्छा से पुत्र को गया में आया देखकर पितरों के लिए आनन्दोत्सव होता है, तात्पर्य ये है कि जैसे उत्सव में हर्षोल्लास तथा आनंद होता है, वैसे हीं पितर भी खुशियाँ मानते हैं । वासु देवता, रुद्र, आदित्य और पितर ये सब श्राद्ध के देवता माने जाते हैं । हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा एवं परदादा क्रमसः वसु, रुद्र एवं आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के समय वे ही अन्य सभी पूर्वज पितरों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। ऐसा कहतें हैं कि वे श्राद्ध कराने वालों के शरीर में विद्यमान होकर और ठीक ढ़ग से रीति-रिवाजों के अनुसार किये गये श्राद्ध-कर्म एवं पिंड दान से तृप्त होकर पितर अपने वंशधर को सपरिवार स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि का आर्शीवाद देते हैं। श्राद्ध-कर्म में आहुतियों और उच्चारित मन्त्रों को वे अन्य सभी पितरों तक ले जाते हैं। एडुरेन.कॉम के अनुसार श्राद्ध करने से ये देवता प्रसन्न होकर दीर्घायु, संतान, धन, विद्या, ज्ञान, मोक्ष, सुख और राज्य प्रदान करने का आशीर्वाद देतें है ।
श्राद्ध करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्त हो परमगति को प्राप्त करता है। योगेन्द्र नारायण शास्त्री जी ने मनु स्मृति का हवाला देते हुए बताया कि श्राद्ध से संतुष्ट होकर पित्तरगण श्राद्ध करने वालों को दीर्घायु, धन, सुख और मोक्ष प्रदान करते हैं।
श्राद्ध करने की इच्छा से पुत्र को गया में आया देखकर पितरों के लिए आनन्दोत्सव होता है, तात्पर्य ये है कि जैसे उत्सव में हर्षोल्लास तथा आनंद होता है, वैसे हीं पितर भी खुशियाँ मानते हैं ।
 
== श्राद्ध ना करने से हानि ==
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