"केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ तंत्र" के अवतरणों में अंतर

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[[चित्र: Kelvin-helmholtz mechanism.png|thumb|केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ तंत्रऔर हेल्महोल्ट्ज़]]
'''केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ तंत्र''' (Kelvin–Helmholtz mechanism), एक खगोलीय प्रक्रिया है। यह तब पाई जाती है जब किसी तारे या ग्रह की सतह ठंडी होती है। यह ठंडापन, दाब के पतन का कारण बनता है, परिणामस्वरूप तारा या ग्रह सिकुड़ता है। यह संपीड़न, अगले चरण में, तारा/ग्रह के कोर को तप्त कर देता है। यह तंत्र [[बृहस्पति]] व [[शनि (ग्रह) | शनि]] और [[भूरा बौना | भूरे बौनों]] पर प्रमाणित हुए, जिनके केंद्रीय तापमान [[नाभिकीय संलयन]] अंतर्गत गुजरने के लिए पर्याप्त ऊंचे नहीं हैं | ऐसा अनुमान है कि इस तंत्र के माध्यम से बृहस्पति सूर्य से प्राप्त ऊर्जा की तुलना में अधिक छोड़ता है, पर शनि कदाचित नहीं।<ref>{{cite book | title = Giant Planets of Our Solar System: Atmospheres, Composition, and Structure | author = Patrick G. J. Irwin | publisher = Springer | year = 2003 | isbn = 3-540-00681-8 | url = http://books.google.com/books?id=p8wCsJweUb0C&pg=PA63&dq=%22kelvin+helmholtz+mechanism%22}}</ref>
 
[[चित्र: Kelvin-helmholtz mechanism.png|thumb|केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ तंत्र]]
यह तंत्र सूर्य की ऊर्जा के स्रोत की व्याख्या करने के लिए 19 वीं सदी में मूल रूप से [[विलियम थॉमसन, प्रथम बैरन केल्विन | केल्विन]] और [[हेल्महोल्ज़ | हेल्महोल्ट्ज़]] द्वारा प्रस्तावित हुआ था। मध्य 19 वीं शताब्दी तक, [[ऊर्जा संरक्षण का नियम | ऊर्जा का संरक्षण]] स्वीकार कर लिया गया था और भौतिकी के इस सिद्धांत का एक परिणाम यह है कि सूर्य के पास अपनी चमक को जारी रखने के लिए कुछ ऊर्जा स्रोत अवश्य होने चाहिए | चुंकि परमाणु अभिक्रिया अज्ञात थी, सौर ऊर्जा के स्रोत के लिए मुख्य उम्मीदवार गुरुत्वीय संकुचन था |
 
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