"जातक कथाएँ": अवतरणों में अंतर

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जातक [[खुद्दक निकाय]] का दसवाँ प्रसिद्ध ग्रन्थ है। जातक को वस्तुतः ग्रन्थ न कहकर ग्रन्थ समूह ही कहना अधिक उपयुक्त होगा। उसका कोई-कोई कथानक पूरे ग्रन्थ के रूप में है और कहीं-कहीं उसकी कहानियों का रूप संक्षिप्त महाकाव्य-सा है। जातक शब्द जन धातु से बना है। इसका अर्थ है भूत अथवा भाव। ‘जन्’ धातु में ‘क्त’ प्रत्यय जोड़कर यह शब्द निर्मित होता है। धातु को भूत अर्थ में प्रयुक्त करते हुए जब अर्थ किया जाता है तो जातभूत कथा एवं रूप बनता है। भाव अर्थ में प्रयुक्त करने पर जात-जनि-जनन-जन्म अर्थ बनता है। इस तरह ‘जातक’ शब्द का अ र्थ है, ‘जात’ अर्थात् जन्म-सम्बन्धीं। ‘जातक’ भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म सम्बन्धी कथाएँ है। बुद्धत्व प्राप्त कर लेने की अवस्था से पूर्व भगवान् बुद्ध बोधिसत्व कहलाते हैं। वे उस समय बुद्धत्व के लिए उम्मीदवार होते हैं और दान, शील, मैत्री, सत्य आदि दस पारमिताओं अथवा परिपूर्णताओं का अभ्यास करते हैं। भूत-दया के लिए वे अपने प्राणों का अनेक बार बलिदान करते हैं। इस प्रकार वे बुद्धत्व की योग्यता का सम्पादन करते हैं। बोधिसत्व शब्द का अर्थ ही है बोधि के लिए उद्योगशील प्राणी। बोधि के लिए है सत्व (सार) जिसका ऐसा अर्थ भी कुछ विद्वानों ने किया है। पालि सुत्तों में हम अनेक बार पढ़ते हैं, ‘‘सम्बोधि प्राप्त होने से पहले, बुद्ध न होने के समय, जब मैं बोधिसत्व ही था‘‘ आदि। अतः बोधिसत्व से स्पष्ट तात्पर्य ज्ञान, सत्य दया आदि का अभ्यास करने वाले उस साधक से है जिसका आगे चलकर बुद्ध होना निश्चित है। भगवान बुद्ध भी न केवल अपने अन्तिम जन्म में बुद्धत्व-प्राप्ति की अवस्था से पूर्व बोधिसत्व रहे थे, बल्कि अपने अनेक पूर्व जन्मों में भी बोधिसत्व की चर्या का उन्होंने पालन किया था। जातक की कथाएँ भगवान् बुद्ध के इन विभिन्न पूर्वजन्मों से जबकि वे बोधिसत्व रहे थे , सम्बन्धित हैं। अधिकतर कहानियों में वे प्रधान पात्र के रूप में चित्रित है। कहानी के वे स्वयं नायक है। कहीं-कहीं उनका स्थान एक साधारण पात्र के रूप में गौण है और कहीं-कहीं वे एक दर्शक के रूप में भी चित्रित किये गये है। प्रायः प्रत्येक कहानी का आरम्भ इस प्रकार होता है-‘‘एक समय राजा ब्रह्मदत्त के वाराणसी में राज्य करते समय (अतीते वाराणसिंय बह्मदत्ते रज्ज कारेन्ते) बोधिसत्व कुरंग मृग की योनि से उत्पन्न हुए अथवा ... सिन्धु पार के घोड़ों के कुल में उत्पन्न हुए अथवा ..... बोधिसत्व ब्रह्मदत्त के अमात्य थे अथवा ..बोधिसत्व गोह की योनि सें उत्पन्न हुए आदि, आदि।
 
जातक की कहानियों में से कुछ का नामकरण तो जातक में आई हुई गाथा के पहले शब्दों से हुआ है, यथा-अपष्णक जातक,; किसी का प्रधान पात्र के अनुसार, यथा वण्णुपथ जातक; किसी का उन जन्मों के अनुसार जो बोधिसत्व ने ग्रहण किये यथा, निग्रेध मिग जातक, मच्छ जातक, आदि।
 
==जातकों की संख्या एवं रचनाकाल==
जातकों की निश्चित संख्या कितनी है, इसका निर्णय करना बड़ा कठिन है। लंका, बर्मा और सिआम में प्रचलित परम्परा के अनुसार जातक 550 हैं। समन्तपासादिका की निदान कथा में भी जातकों की संख्या इतनी ही बताई गई है। ‘‘पण्णासा धकनि पञ्चसतानि जातकंति वेदितब्बं।‘‘ अट्ठसालिनी की निदान कथा में भी -पण्णासाधिकानि पञ्चजातकसतानि‘‘ है। संख्या मोटे तौर पर ही निश्चित की गई है। जातक के वर्तमान रूप में 547 जातक कहनियाँ पाई जाती हैं। पर यह संख्या भी केवल ऊपरी है। जातकट्ठवण्णनाकार ने विषयवस्तु की दृष्टि से इन्हें पाँच वर्गों में विभाजित किया है-
 
*4. '''वैय्याकरण''' - गाथाएँ व्याख्यायित की गई है।
 
*5. '''समोधन''' - इसमें अतीतवत्थु के पात्रों का बुद्ध के जीवनकाल के पात्रों से सम्बन्ध बताया गया है।
 
जातक की कई कहानियाँ अल्प रूपान्तर के साथ दो जगह भी पाई जाती है या एक दूसरे में समाविष्ट भी कर दी गई हैं, और इसी प्रकार कई जातक कथाएँ सुत्त-पिटक, विनय-पिटक, तथा अन्य पालि ग्रन्थों में तो पाई जाती है, किन्तु जातक के वर्तमान रूप में संगृहीत नहीं है। अतः जातकों की संख्या में काफी कमी की भी और बृद्धि की भी सम्भावना है। उदाहरणतः मुनिक जातक(30) और सालूक जातक(286) की कथावस्तु एक ही सी है, किन्तु केवल भिन्न-भिन्न नामों से वह दो जगह आई है। इसके विपरीत ‘मुनिक जातक’ नाम के दो जातक होते हुए उनकी भी कथा भिन्न-भिन्न है।
 
यही बात मच्छ जातक नाम से दो जातक की भी है। कही-कहीं दो स्वतन्त्र जातकों को मिलाकर एक तीसरे जातक का निर्माण कर दिया गया है। उदाहरण के लिए पञ्चपंडित जातक(508) और दकरक्खस जातक(517) ये दोनों जातक महाउमग्ग जातक(546) में अन्तर्भावित हैं। जो कथाएँ जातक-कथा के रूप में अन्यत्र पाई जाती हैं, किन्तु ‘जातक’ में संगृहीत नहीं है, उनका भी कुछ उल्लेख कर देना आवश्यक होगा। मज्झिम निकाय का घटिकार- सुत्त या घटीकार सुत्त (2/4/1) एक ऐसी ही जातक कहानी है, जो ‘जातक’ में नहीं मिलती। इसी प्रकार दीर्घनिकाय का महागोविन्द सुत्त(2/6) जो स्वयं जातक की निदान कथा में भी ‘महागोविन्द जातक’ के नाम से निर्दिष्ट हुआ है, जातक के अन्दर नहीं पाया जाता है। इसी प्रकार धम्मपदट्ठकथा और मिलिन्द पञ्ह में भी कुछ ऐसी जातक-कथाएँ उद्धृत की गई हैं, जो जातक में संगृहीत नहीं है।
 
अतः कुछ जातक निश्चित रूप से कितने है इसका ठीक निर्णय नहीं हो सकता। जब जातकों की संख्या के सम्बन्ध में विचार करते हैं तो जातक से हमारा तात्पर्य एक विशेष शीर्षक वाली कहानी से होता है, जिसमें बोधिसत्व के जीवन-सम्बन्धी कि सी घटना का वर्णन हो, फिर चाहे उस एक जातक में कितनी ही अवान्तर कथाएँ क्यों न गूँथ दी गई हों। यदि कुल कहानियाँ गिनी जाय तो जातक में करीब तीन हजार कहानियाँ पाई जाती हैं। वास्तव में जातकों का संकलन सुत्त-पिटक और विनय-पिटक के आधार पर किया गया है। सुत्त -पिटक में अनेक ऐसी कथाएँ है जिनका उपयोग वहाँ उपदेश देने के लिए किया गया है। किन्तु बोधिसत्व का उल्लेख उसमें नहीं है। यह काम बाद में करके प्रत्येक कहानी को जातक का रूप दे दिया गया है। तित्तिर जातक(37) और दीघित कोसल जातक(371) का निमार्ण इसी प्रकार विनय-पिटक के क्रमशः चुल्लवग्ग और महावग्ग से किया गया है। मणिकंठ जातक(253) भी विनय-पिटक पर ही आधारित है। इसी प्रकार दीर्घ-निकाय के कूटदन्त सुत्त(1/5) और महासुदस्सन सुत्त(2/4) तथा मज्झिम निकाय के मखादेव सुत्त(2/4/3) भी पूरे अर्थों में जातक हैं। कम से कम 13 जातकां की खोज विद्वानों ने सुत्त पिटक और विनय-पिटक में की हैं। यद्यपि राजकथा चोर-कथा एवं इसी प्रकार की भय, युद्ध, ग्राम, निगम, नगर, जनपद, स्त्री, पनघट, भूत-प्रेत आदि सम्बन्धी कथाओं को तिरश्चीन (व्यर्थ की, अधम) कथाएँ कहकर भिक्षु संघ में हेयता की दृष्टि से देखा जाता था। फिर भी उपदेश के लिए कथाओं का उपयोग भिक्षु लोग कुछ-न-कुछ मात्रा मेंं करते ही थे। स्वयं भगवान ने भी उपमाओं और दृष्टान्तों के द्वारा धर्म का उपदेश दिया है। बौद्ध संस्कृत ग्रन्थ सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र के द्वितीय परिवर्त (उपाय कौशल्य-परिवर्त) में भी कहा गया है कि बुद्ध अनेक दृष्टान्तों से (दृष्टान्तशतेहि) तथा जातक(पूर्वजन्म सम्बन्धी कथाओं) के द्वारा सब प्राणियों के कल्याणार्थ उपदेश करते हैं। बुद्ध के अलावा अन्य भारतीय सन्त भी उपनिषदों के काल से लेकर रामकृष्ण परमहंस के समय तक आख्यायिकाओं और दृष्टान्तों के सहारे धर्मोंपदेश करते रहे हैं। इसी प्रवृत्ति के आधार पर जातककथाओं का विकास हुआ है। जन समाज में प्रचलित कथाओं को भी कही-कहीं ले लिया गया है, किन्तु उन्हें एक नया नैतिक रूप दे दिया गया है, जो बौद्ध धर्म की एक विशेषता है। अतः सभी जातक कथाओं पर बौद्ध धर्म की पूरी छाप है। पूर्व परम्परा से चले आते हुए लोक-आख्यानों का आधार उनमें हो सकता है, पर उनका सम्पूर्ण ढाँचा बौद्ध धर्म के नैतिक आदर्श के अनुकूल है। बुद्ध वचनों का वर्गीकरण नौ अंगों के रूप में किया गया है, जिनके नाम हैं-
 
1 . सुत्त
 
2 . गेय
 
3 . वेय्याकरण
 
4 . गाथा
 
5 . उदान
 
6 . इतिक्तुक
 
7 . जातक
 
8 . अब्भुतधम्म और
 
9 . वेदल्ल।
 
1 . सुत्त (सूत्र) का अर्थ है सामान्यतः बुद्ध उपदेश। दीर्घ-निकाय सुत्त निपात आदि में गद्य में रखे हुए भगवान बुद्ध के उपदेश सुत्त हैं।
 
2 . गेय्य (गेय)- पद्य मिश्रित अंश (सगाथकं) गे य्य कहलाते हैं। ‘‘सब्बं पि सगाथक सुत्तं गेय्यं वेदितब्बं।’’
 
3 . वैय्याकरण (व्याकरण, विवरण, विवेचन) वह व्याख्यापरक साहित्य है, जो अभिधम्म-पिटक तथा अन्य ऐसे ही अंशों में सन्निहीत है।
 
4 . पद्य में रचित अंग गाथा (पालि श्लोक) कहलाते हैं, यथा धम्मपद आदि की गाथाएँ।
 
5 . उदान का अर्थ है बुद्ध मुख से निकले हुए भावमय प्रीति-उद्गार या ऊर्ध्व वचन। ये उद्गार सौमनस्य की अवस्था में बुद्ध मुख से निकली हुई ज्ञानमयिक गाथाओं के रूप में है। ‘‘सोमनस्सञ्नाणमयिक गाथापटि संयुत्ता।‘‘
 
6 . इतिवुत्तक का अर्थ है-‘‘ऐसा कहा गया या ऐसा तथागत ने कहा। ‘‘वुत्त हेतं भगवता‘‘ से आरम्भ होने वाले बुद्ध वचन इतिवुत्तक है।
 
7 . जातक का अर्थ है- (बुद्ध के पूर्व) जन्म सम्बन्धी कथाएँ। ये जातक में संगृहीत है और कुछ अन्यत्र भी त्रिपिटक में पाई जाती है।
 
8 . अब्भुत-धम्म (अद्भुत धर्म) वे सुत्त हैं, जो अद्भुत वस्तुओं या योग सम्बन्धी विभूतियों का निरूपण करते हैं। अंगुत्तर निकाय के ‘‘चत्तारों में भिक्खवे अच्छ रिया अब्भुत धम्मा आनन्दे‘‘ जैसे अंश ‘अब्भुतधम्म’ है।
 
9 . ‘वेदल्ल’ वे उपदेश हैं जो प्रश्न और उत्तर के रूप में लिखे गये हैं, जिनमें आध्यात्मिक प्रसन्नता और सन्तोष प्राप्त कर के प्रश्न पूछे जायँ। ‘‘सब्बे पि वेदं च तुटिठं च लुद्धा पुचिछतसुत्तन्ता वेदल्लं ति वेदितब्बा।‘‘ चुल्ल वेदल्ल सुत्तन्त महा वेदल्ल सुत्तन्त, सम्मादिट्ठि सुत्तन्त, सक्कपञ्ह सुत्तन्त आदि इसके उदाहरण है।
 
बुद्ध वचनों का यह नौ प्रकार का विभाजन उनके शैली स्वरूपों या नमूनों की दृष्टि से ही है, ग्रन्थों की दृष्टि से नहीं। इतने प्रकार के बुद्ध उपदेश होते थे, यही इस वर्गीकरण का अभिप्राय है। बुद्ध वचनों का नौ अंगों में विभाजन जिनमें जातक की संख्या सातवीं है, अत्यन्त प्राचीन है। अतः जातक कथाएँ सर्वांश में पालि-साहित्य के महत्वपूर्ण एवं आवश्यक अंग हैं। उनकी संख्या के विषय में अनिश्चितता विशेषतः उनके समय-समय पर सुत्त पिटक और विनय-पिटक तथा अन्य श्रोतों से संकलन के कारण और स्वयं पालि पिटक के नाना वर्गीकरणों और उनके परस्पर संमिश्रण के कारण उत्पन्न हुई है। चुल्ल निद्देस में हमें केवल 500 जातकों का (पञ्च जातक सतानि) का उल्लेख मिलता है। चीनी यात्री फाह्यान ने पाँचवी शताब्दी ईसवी में 500 जातकों के चित्र लंका में अंकित हुए देखे थे। द्वितीय तृतीय शताब्दी ईस्वी पूर्व के भरहुत और साँची के स्तूपों में जातकों के चित्र अंकित मिले हैं। जिनमें से कम से कम 27 या 29 जातकों के चित्रों की पहचान रायस डेविड्स ने की थी। तब से कुछ अन्य जातक कहानियों की पहचान भी इन स्तूपों की पाषाण-वेष्टनियों पर की जा चुकी हैं। ये सब तथ्य जातक की प्राचीनता और उसके विकास के सूचक हैं।
 
स्थविरवादी पालि साहित्य के समान संस्कृत बौद्ध धर्म के ग्रन्थों में भी जातक कथाएँ पाई जाती हैं। पालि के नवांग बुद्ध वचन की तरह यहाँ द्वाद श अंग धर्मप्रवचन माने गये है। इन दोनों ही जगह जातक एक अंग या धर्म-प्रवचन के भाग के रूप में विद्यमान है। बौद्ध संस्कृत ग्रन्थ जातकमाला में जो आर्यशूर की रचना बताई जाती है 34 जातक कथाएँ मिलती है। आर्यशूर को लामा, तारनाथ ने अश्वघोष का ही दूसरा नाम बताया है परन्तु यह ठीक नहीं जान पड़ता है। सम्भवतः वे चतुर्थ शताब्दी ईसवी के कवि थे। लोकोत्तरवादियों के प्रसिद्ध ग्रन्थ महावस्तु में जो 200 ई0 पूर्व से 400 ई0 तक के बीच के काल में लिखी गई, करीब 80 जातक कथाएँ मिलती है। इसमें से कुछ पालि जातक के समान हैं और कु छ ऐसी भी हैं, जो पालि जातक में नहीं पाई जाती।
 
रायस डेविड्स का कथन है कि जातक का संकलन और प्रणयन मध्य देश में प्राचीन जनकथाओं के आधार पर हुआ। विण्टरनित्ज ने भी प्रायः इसी मत का प्रतिपादन किया है। अधिकांश जातक बुद्धकालिन है। साँची और भरहुत के स् तूपों की पाषाण-वेष्टनियों पर उनके दृश्यों का अंकित होना उनके पूर्व अशोककालीन होने का पर्याप्त साक्ष्य देता है। जातक के काल और कर्तृत्व के सम्बन्ध में अधिक प्रकाश उसके साहित्यिक रूप और विशेषताओं के विवेचन से पड़ेगा। प्रत्येक जातक कथा पाँच भागों में विभक्त है।
 
1 . पञ्चुप्पन्नवत्थु 2 . अतीतवत्थु 3 . गाथा 4 . वेय्याकरण या अत्यवण्णना और 5 . समोधन।
 
पञ्चुप्पन्नवत्थु का अर्थ है वर्तमान काल की घटना या कथा। बुद्ध के जीवन काल में जो घटना घटी वह पच्चुप्पन्नवत्थु है। उस घटना ने भगवान को किसी पूर्वजन्म के वृत् त को कहने का अवसर दिया। यह पूर्वजन्म का वृत्त ही अतीतवत्थु है। प्रत्येक जातक का कथा की दृष्टि सबसे अधिक महत्वपूर्ण भाग यह अतीतवत्थु ही है। इसी के अनुकूल पच्चप्पन्नवत्थु कहीं-कहीं गढ़ ली गई प्रतीत होती है। अतीतवत्थु के बाद एक या अनेक गाथाएँ आती हैं। इनका सम्बन्ध वैसे तो अतीतवत्थु से ही होता है, किन्तु कहीं-कहीं पच्चप्पन्नवत्थु से भी होता है। गाथाएँ जातक के प्राचीनतम अंश हैं। वास्तव में गाथाएँ ही जातक हैं। पच्चुप्पन्नवत्थु आदि पाँच भागों से समन्वित जातक तो वास्तव में जातकट्ठवण्णना या जातक में वेय्याकरण या अत्थव ण्णना आती है। इसमें गाथाओं की व्याख्या और उनका शब्दार्थ होता है। सबसे अन्त में समोधन(समवधान) आता है, जिसमें अतीतवत्थु के पात्रों का बुद्ध के जीवन काल के पात्रों के साथ सम्बन्ध मिलाया जाता है, यथा उस समय अटारी पर से शिकार खेलने वाला शिकारी अब का देव दत्त था और कुरूंग मृग तो मैं था ही, आदि आदि।
 
जातक मेंं बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ संगृहीत है जबकि उन्होंने बोधिसत्व के रूप में विभिन्न पारमिताएँ पूरी कीं और बुद्धत्व के लिए योग्यता सम्पादित की। सुत्त-पिटक के प्रथम चार निकायों में बुद्ध के ऐतिहासिक रूप की ही प्रतिष्ठा है। बाद में जातक में (तथा बुद्धवंस और चरिया-पिटक में) उनके ऐतिहासिक जीवन को पूर्व की कथाओं से सम्बद्ध कर दिया पाते हैं। जातकट्ठकथा की निदान कथा में बुद्ध जीवन के तीन निदान बताये गये हैं, दूरे निदान में अत्यन्त दूर अतीत की बुद्ध जीवन की कथा है, ऐसा माना जाता है कि अत्यन्त सुदूर अतीत में बुद्ध सुमेध तपस्वी बनकर उत्पन्न हुए थे। उस समय उन्होंने दीपंकर बुद्ध में बड़ी निष्ठा दिखाई जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने उन्हें आगे चलकर बुद्ध होने का आशीर्वाद दिया। अनेक जन्मों तक विभिन्न शरीर धारण करते हुए सुमे ध तपस्वी की साधना चलती रही। अन्त में वेस्सन्तर राजा के रूप में शरीर त्याग कर वे तुषित लोक में गये। सुमेध तपस्वी के रूप से लेकर तुषित लोक में जाने तक की बुद्ध की यह साधना कथा दूर निदान के अन्तर्गत है। 547 जातक कथाएँ अपण्णक जातक से लेकर वेस्सन्तर जातक तक बुद्ध जीवनी के इस दूरे निदान से ही सम्बन्धित है। इन कथाओं से यहाँ तात्पर्य है इनमें वर्णित अतीतवत्थु। इनका सम्बन्ध बुद्ध की जीवन-कथा के दूरे निदान से है अर्थात् ये बहुत दूर अतीत की कथाएँ हैं। लुम्बिनी वन में जन्म लेने के समय से लेकर बोधि-प्राप्ति तक की कथा अविदूरे निदान से सम्बन्धित है। अर्थात वह इतने दूर अतीत की नहीं है। बोधि प्राप्ति से लेकर निर्वाण प्राप्ति तक की बुद्ध जीवनी सन्तिके निदान के अन्तर्गत है। अर्थात वह समीप की है। जातक की पच्चुप्पन्नवत्थु में इसके कुछ अंश प्रस्तावना रूप में आते हैं। जातक की कहानियों में अतीतवत्थ में बुद्ध जीवनी के दूरे निदान के अन्दर समाविष्ट उनके पूर्व जन्मों की कहानियाँ आती है। ऐतिहासिक बुद्ध के जीवन की किसी घटना का उल्लेख कर इन दूरे निदान की कथाओं के कहने के लिए अवकाश निकाल लिया गया है। जो हो वास्तव में जातक का निर्माण करती है।
 
प्रत्येक जातक के पाँच अंगों के उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जातक गद्य-पद्य मिश्रित रचनाएँ हैं। गाथा (पद्य) भाग जातक का प्राचीनतम भाग माना जाता है। त्रिपिटक के अन्तर्भूत इस गाथा भाग को ही मानना अधिक उपयुक्त होगा। शेष सब अट्ठकथा है। परन्तु जातक-कथाओं की प्रकृति ऐसी है कि मूल को व्याख्या से अलग कर देने पर कुछ भी समझ में नहीं आ सकता। केवल गाथाएँ कहानी का निर्माण नहीं करती। उनके ऊपर जब वर्तमान और अतीत की घटनाओं को ढाँचा चढ़ाया जाता है तभी कथावस्तु का निर्माण होता है। अतः पूरे जातक में उपर्युक्त पाँच अवयवों का हाना आवश्यक है जिसमें गाथा-भाग को छोड़कर शेष सब उसकी व्याख्या है बाद का जोड़ा हुआ है। फिर भी सुविधा के लिए और ऐतिहासिक दृष्टि से गलत ढंग पर हम उसकों जातक कह देते हैं। वास्तव में 547 जातक कथाओं के संग्रह को जो उपर्युक्त पाँच अंगों से समन्वित है, हमें जातक न कहकर जातकट्ठवण्णना (जातक के अर्थ की व्याख्या) या जातकटठकथा ही कहना चाहिए। फॉसबाल और कॉवल ने जिसका क्रमशः रोमन लिपि में और अंग्रेजी में सम्पादन और अनुवाद किया है या हिन्दी में भदन्त आनन्द कौसल्यायन ने ‘जातक’ शीर्षक से 6 भागों में अनुवा द किया है, वह वास्तव में जातक न होकर जातक की व्याख्या है। जातक कथाएँ तो मूल रूप में केवल गाथाएँ है, शेष भाग उसकी व्याख्या है।
 
गाथा और जातक के शेष भाग का कालक्रम आदि की दृष्टि से क्या पारस्परिक सम्बन्ध है यह प्रश्न सामने आता है। अटठ्कथा में गाथा-भाग को अभिसम्बुद्ध गाथा या भगवान् बुद्ध द्वारा भाषित गाथाएँ कहा गया है। वे बुद्धवचन हैं। अतः वे तिपिटक के अंगभूत थी और उनकों वहाँ से संकलित कर उनके ऊपर कथाओं का ढाँचा प्रस्तुत किया गया है। सम्पूर्ण जातक ग्रन्थ की विषयवस्तु का जिस आधार पर वर्गीकरण हुआ है, उससे भी यही स्पष्ट है कि गाथा-भाग, या जिसे पिण्टरनित्ज आदि विद्वानों ने गाथा-जातक कहा है, वहीं उसका मूलाधार है। जातक ग्रन्थ का वर्गीकरण विषय-वस्तु के आधार पर न होकर गाथाओं की संख्या के आधार पर हुआ है। थेर-थेरी गाथाओं के समान वह भी निपातों में विभक्त है। जातक में 22 निपात हैं। पहले निपात में 150 ऐसी कथाएँ है जिनमें एक की एक गाथा पाई जाती है। दूसरे निपात में भी 150 जातक कथाएँ है किन्तु यहाँ प्रत्येक कथा में दो-दो गाथाएँ पाई जाती हैं। इसी प्रकार तीसरे और चौथे निपात में पचास-पचास कथाएँ है और गाथाओं की संख्या क्रमशः तीन-तीन और चार-चार है। आगे भी तेरहवें निपात तक प्रायः यही क्रम चलता है। चौदहवें निपात का नाम पकिण्णक निपात है। इस निपात में गाथाओं की संख्या नियमानुसार 14 न होकर विविध है। इसलिए इसका नाम पकिण्णक (प्रकीर्णक) रख दिया गया है। इस निपात में कुछ कथाओं में 10 गाथाएँ भी पाई जाती है और कुछ में 47 तक भी पाई जाती है। आगे के निपातों में गाथाओं की संख्या निरन्तर बढ़ती गई है। पन्द्रहवें निपात का शीर्षक है वीस निपात, सोलहवें का तिंस निपात, सत्रहवें का चत्तालीस निपात, अट्ठारहवें का पण्णास निपात ,उन्नीसवें का सठ्ठि निपात, बीसवें का सत्ततिनिपात और इक्कीसवें का असीतिनिपात। बाइसें निपात में केवल दस जातक कथाएँ है किन्तु प्रत्येक में गाथाओं की संख्या सौ से भी ऊपर है। अन्तिक जातक (वेस्सन्तर जातक) में तो गाथाओं की संख्या सात सौ से भी ऊपर है।
 
इन सबसे यह निष्कर्ष निकलता है कि जातक कथाओं की आधार गाथाएँ ही है। स्वयं अनेक जातक कथाओं के वेय्याकरण भाग में पालि और अट्ठकथा के बीच भेद दिखाया गया है, जैसे कि पलि सुत्तों की अन्य अनेक अट्ठकथाओं तथा विसुद्धिमग्गों आदि ग्रन्थों में भी। जहाँ तक जातक के वेय्याकरण भाग से सम्बन्ध है, वहाँ पालि का अर्थ तिपिटक गत गाथा ही हो सकता है। भाषा के साक्ष्य से भी गाथा भाग अधिक प्राचीनता का द्योतक है अपेक्षाकृत गद्य भाग के। पिण्टरनित्ज ने कहा है जातक की सम्पूर्ण गाथाओं को तिपिटक का मूल अंश नहीं माना जा सकता है। उनमें भी पूर्वापर भेद है। स्वयं जातक के वर्गीकरण से ही यह स्पष्ट है। चौदहवें निपात (पकिण्णक निपात) में प्रत्येक जातक कथा की गाथाओं की संख्या नियमानुसार 14 न होकर कही-कहीं बहुत अधिक है। इसी प्रकार बीसवें निपात (सत्तति निपात) में उसकी दो जातक कथाओं की संख्या सत्तर-सत्तर न होकर क्रमशः 92 और 93 है। इस सबसे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जातक का गाथाओं अथवा गाथा जातक की मूल संख्या निपात के शीर्षक की संख्या के अनुकूल ही होगी। और बाद में उसका संवर्द्धन किया गया है। अतः कुछ गाथा एँ अधिक प्राचीन है और कुछ अपेक्षाकृत कम प्राचीन है। इसी प्रकार गद्य भाग भी कुछ अत्यन्त प्राचीनता के लक्षण लिए हुए है और कुछ अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। किसी-किसी जातक में गद्य और गाथा भाग में साम्य भी नहीं दिखाई पड़ता और कही-कहीं शैली में भी बड़ी विभिन्नता है। इस सबसे जातक के संकलनात्मक रूप और उसके भाषारूप की विविधता पर प्रकाश पड़ता है जिसमें कई रचयिताओं या संकलनकर्ताओं और कई शताब्दियों का योग रहा है।
 
जातक की गाथाओं की प्राचीनता तो निर्विवाद है ही, उसका अधिकांश गद्य भाग भी अत्यन्त प्राचीन है। भरहुत और साँची के स्तूपों की पाषाण वेष्टनियों पर जो चित्र अंकित है वे जातक के गद्य भाग से ही सम्बन्धित हैं। अतः जातक का अधिकांश गद्य-भाग जो प्राचीन है, तृतीय, द्वितीय शताब्दी ईसवी पूर्व में इतना लोकप्रिय तो होना हीं चाहिए कि उसे शिल्प कला का आधार बनाया जा सके। अतः सामान्यतः हम जातक को बुद्धकालीन भारतीय समाज और संस्कृति का प्रतीक मान सकते हैं। उसमें कुछ लक्षण और अवस्थाओं के चित्रण प्राग-बुद्धकालीन भारत के भी हैं और कुछ बुद्ध के काल के बाद के भी है। जहाँ तक गाथाओं की व्याख्या और उनके शब्दार्थ का सम्ब न्ध है, वह सम्भवतः जातक का सब से अधिक अर्वाचीन अंश है। इस अंश के लेखक आचार्य बुद्ध घोष माने जाते है। ‘गन्धवंस’ के अनुसार आचार्य [[बुद्धघोष]] ने ही ‘जातकट्ठण्णना’ की रचना की, किन्तु यह सन्दिग्ध है। भाषाशैली की भिन्नता दिखाते हुए और कुछ अन्य निषेधात्मक कारण देते हुए डॉ. टी. डब्ल्यू रायस डेविड्स ने बुद्धघोष को जातकट्ठवण्णना का रचयिता या संकलनकर्ता नहीं माना है। स्वयं जातकट्ठकथा के उपोद्घात में लेखक ने अपना परिचय देते हुए कहा है ‘‘ ....शान्तचित्त पण्डित बुद्धमित्त भिक्षु बुद्धदेव के कहने से ........ व्याख्या करूँगा। महिशासक सम्प्रदाय महाविहार की परम्परा से भिन्न एक बौद्ध सम्प्रदाय था। बुद्धघोष ने जितनी अट्ठकथाएँ लिखी है, शुद्ध महाविहारवासी भिक्षुओं की उपदेश विधि पर आधारित हैं। अतः जातकट्ठकथा के लेखक को आचार्य [[बुद्धघोष]] से मिलाना ठीक नहीं। सम्भवतः यह कोई अन्य सिंहली भिक्षु थे, जिनका काल पाँचवीं शताब्दी ईसवी माना जा सकता है।
 
==जातकों की सूची==