"आर्यभट" के अवतरणों में अंतर

42 बैट्स् जोड़े गए ,  3 वर्ष पहले
सम्पादन सारांश रहित
छो (कुछ अशुद्धियाँ सुधारी हैं.)
उन्होंने '''[[आर्यभटीय]]''' नामक महत्वपूर्ण ज्योतिष ग्रन्थ लिखा, जिसमें [[वर्गमूल]], [[घनमूल]], [[समान्तर श्रेणी]] तथा विभिन्न प्रकार के [[समीकरण|समीकरणों]] का वर्णन है। उन्होंने अपने आर्यभटीय नामक ग्रन्थ में कुल ३ पृष्ठों के समा सकने वाले ३३ श्लोकों में गणितविषयक सिद्धान्त तथा ५ पृष्ठों में ७५ श्लोकों में खगोल-विज्ञान विषयक सिद्धान्त तथा इसके लिये यन्त्रों का भी निरूपण किया।<ref>{{cite web |url= http://pustak.org/bs/home.php?bookid=4545|title= गणित-शास्त्र के विकास की भारतीय परम्परा|accessmonthday=[[१२ फरवरी]]|accessyear=[[२००९]]|format= पीएचपी|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=}}</ref> आर्यभट ने अपने इस छोटे से ग्रन्थ में अपने से पूर्ववर्ती तथा पश्चाद्वर्ती देश के तथा विदेश के सिद्धान्तों के लिये भी क्रान्तिकारी अवधारणाएँ उपस्थित कींं।
 
उनकी प्रमुख कृति, ''आर्यभटीय'', गणित और खगोल विज्ञान का एक संग्रह है, जिसे भारतीय गणितीय साहित्य में बड़े पैमाने पर उद्धतउद्धृत किया गया है और जो आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है। आर्यभटीय के गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल त्रिकोणमिति और गोलीय त्रिकोणमिति शामिल हैं। इसमे [[सतत भिन्न]] (कँटीन्यूड फ़्रेक्शन्स), [[द्विघात समीकरण]] (क्वाड्रेटिक इक्वेशंस), घात श्रृंखला के योग (सम्स ऑफ पावर सीरीज़) और [[[[आर्यभट की ज्या सारणी|ज्याओं की एक तालिका]] (Table of Sines) शामिल हैं।
 
''आर्य-सिद्धांत'', खगोलीय गणनाओं पर एक कार्य है जो अब लुप्त हो चुका है, इसकी जानकारी हमें आर्यभट के समकालीन [[वराहमिहिर]] के लेखनों से प्राप्त होती है, साथ ही साथ बाद के गणितज्ञों और टिप्पणीकारों के द्वारा भी मिलती है जिनमें शामिल हैं [[ब्रह्मगुप्त]] और [[भास्कर प्रथम|भास्कर I]]. ऐसा प्रतीत होता है कि ये कार्य पुराने [[सूर्य सिद्धांत]] पर आधारित है और ''आर्यभटीय '' के सूर्योदय की अपेक्षा इसमें मध्यरात्रि-दिवस-गणना का उपयोग किया गया है। इसमे अनेक खगोलीय उपकरणों का वर्णन शामिल है, जैसे कि [[ग्नोमों|नोमोन]](''शंकु-यन्त्र''), एक परछाई यन्त्र (''छाया-यन्त्र''), संभवतः कोण मापी उपकरण, अर्धवृत्ताकार और वृत्ताकार (''धनुर-यन्त्र'' / ''चक्र-यन्त्र''), एक बेलनाकार छड़ी ''यस्ती-यन्त्र'', एक छत्र-आकर का उपकरण जिसे ''छत्र- यन्त्र'' कहा गया है और कम से कम दो प्रकार की [[जल घड़ी|जल घड़ियाँ]]- धनुषाकार और बेलनाकार.<ref name="Ansari" />
 
==== बीजगणित ====
''आर्यभटीय '' में आर्यभट ने [[वर्ग|वर्गों]] और [[घन|घनों]] की [[श्रृंखला (गणित)|श्रृंखला]] के सुरुचिपूर्ण परिणाम प्रदान किये हैं।<ref>{{cite book|first=Carl B.| last=Boyer |authorlink=Carl Benjamin Boyer |title=A History of Mathematics |edition=Second |publisher=John Wiley & Sons, Inc. |year=1991 |isbn=0471543977 |page = 207 |chapter = The Mathematics of the Hindus |quote= He gave more elegant rules for the sum of the squares and cubes of an initial segment of the positive integers. The sixth part of the product of three quantities consisting of the number of terms, the number of terms plus one, and twice the number of terms plus one is the sum of the squares. The square of the sum of the series is the sum of the cubes.}}</ref>
 
:<math>1^2 + 2^2 + \cdots + n^2 = {n(n + 1)(2n + 1) \over 6}</math>
=== खगोल विज्ञान ===
आर्यभट की खगोल विज्ञान प्रणाली ''औदायक प्रणाली'' कहलाती थी, (''श्रीलंका'', भूमध्य रेखा पर ''उदय'', भोर होने से दिनों की शुरुआत होती थी।) खगोल विज्ञान पर उनके बाद के लेख, जो सतही तौर पर
एक द्वितीय मॉडल (''अर्ध-रात्रिका'', मध्यरात्रि), प्रस्तावित करते हैं, खो गए हैं, परन्तु इन्हे आंशिक रूप से [[ब्रह्मगुप्त|ब्रह्मगुप्त के]] ''[[खण्डखाद्यक]]'' में हुई चर्चाओं से पुनः निर्मित किया जा सकता है। कुछ ग्रंथों में वे पृथ्वी के घूर्णन को आकाश की आभासी गति का कारण बताते हैं।
[[ब्रह्मगुप्त|ब्रह्मगुप्तके]] ''खानदाखअद्याका'' में हुई चर्चाओं से पुनः निर्मित किया जा सकता है। कुछ ग्रंथों में वे पृथ्वी के घूर्णन को आकाश की आभासी गति का कारण बताते हैं।
 
==== सौर प्रणाली की गतियाँ ====
प्रतीत होता है की आर्यभट यह मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी की परिक्रमा करती है। यह ''श्रीलंका '' को सन्दर्भित एक कथन से ज्ञात होता है, जो तारों की गति का पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न आपेक्षिक गति के रूप में वर्णन करता है।
 
:जैसे एक नाव में बैठा आदमी आगे बढ़ते हुए स्थिर वस्तुओं को पीछे की दिशा में जाते देखता है, बिल्कुल उसी तरह श्रीलंका में (अर्थात भूमध्य रेखा पर) लोगों द्वारा स्थिर तारों को ठीक पश्चिम में जाते हुए देखा जाता है। [''अचलानी भानी समांपाशाचिमागानी'' - गोलापदागोलपाद .9]
 
परन्तु अगला छंद तारों और ग्रहों की गति को वास्तविक गति के रूप में वर्णित करता है: "उनके उदय और अस्त होने का कारण इस तथ्य की वजह से है कि प्रोवेक्टर हवा द्वारा संचालित गृह और एस्टेरिस्म्स चक्र श्रीलंका में निरंतर पश्चिम की तरफ चलायमान रहते हैं।
 
आर्यभट ने [[सौर मंडल]] के एक [[भूकेन्द्रीय|भूकेंद्रीय]] मॉडल का वर्णन किया है, जिसमे सूर्य और चन्द्रमा [[गृहचक्र]] द्वारा गति करते हैं, जो कि परिक्रमा करता है
पृथ्वी की. इस मॉडल में, जो पाया जाता है
''पितामहासिद्धान्तपितामहसिद्धान्त'' (ई. 425), प्रत्येक ग्रहों की गति दो ग्रहचक्रों द्वारा नियंत्रित है, एक छोटा ''मंद '' (धीमा) ग्रहचक्र और एक बड़ा ''शीघ्र '' (तेज) ग्रहचक्र।
दो ग्रहचक्रों द्वारा नियंत्रित है, एक छोटा ''मंदा '' (धीमा) ग्रहचक्र और एक बड़ा
''शीघ्र '' (तेज) ग्रहचक्र.
<ref>
{{Harvard reference
[[बृहस्पति]], [[शनि]] और [[नक्षत्र]]<ref name="Ansari" />
 
ग्रहों की स्थिति और अवधि की गणना समान रूप से गति करते हुए बिन्दुओं से सापेक्ष के रूप में की गयी थी, जो [[बुध]] और [[शुक्र]] के मामले में, जो पृथ्वी के चारों ओर औसत सूर्य के समान गति से घूमते हैं और मंगल, बृहस्पति और शनि के मामले में, जो राशिचक्र में पृथ्वी के चारों ओर अपनी विशिष्ट गति से गति करते हैं। खगोल विज्ञान के अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार यह द्वि ग्रहचक्र वाला मॉडल प्री-टोलेमिक[[टॉलेमी]] के पहले के [[यूनानी खगोल विज्ञान#ग्रीक खगोल विज्ञान|ग्रीक खगोल विज्ञान]]के तत्वों को प्रदर्शित करता है।<ref>ओटो न्यूगेबार, "प्राचीन और मध्यकालीन खगोल विज्ञान में गृह संचरण सिद्धांत", ''[[स्क्रिप्ट मेंथमेंटीका]]'', २२(१९५६): १६५-१९२; ओटो न्यूगेबार में पुनः प्रकाशित, ''खगोल विज्ञान और इतिहास: चयनित निबंध'', न्यूयॉर्क: स्प्रिन्जर-वेर्लग, १९८३, पीपी. १२९-१५६.आइएसबीएन ०-३८७-९०८४४-७</ref> आर्यभट के मॉडल के एक अन्य तत्व ''सिघ्रोका'', सूर्य के संबंध में बुनियादी ग्रहों की अवधि, को कुछ इतिहासकारों द्वारा एक अंतर्निहित [[सूर्य केंद्रीय|सूर्य केन्द्रित]] मॉडल के चिन्ह के रूप में देखा जाता है।<ref>ह्यूग थरस्टोन, ''प्रारंभिक खगोल विज्ञान'', न्यूयॉर्क: स्प्रिन्जर-वेर्लग, १९९६, पीपी.१७८-१८९.आईएसबीएन ०-३८७-९४८२२-८</ref>
 
==== ग्रहण ====