"आर्यभट" के अवतरणों में अंतर

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==== सौर प्रणाली की गतियाँ ====
प्रतीत होता है की आर्यभट यह मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी की परिक्रमा करती है। यह ''श्रीलंका '' को सन्दर्भित एक कथन से ज्ञात होता है, जो तारों की गति का पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न आपेक्षिक गति के रूप में वर्णन करता है।
: '' अनुलोम-गतिस् नौ-स्थस् पश्यति अचलम् विलोम-गम् यद्-वत् ।
: '' अचलानि भानि तद्-वत् सम-पश्चिम-गानि लङ्कायाम् ॥'' (आर्यभटीय गोलपाद ९)
: ''जैसे एक नाव में बैठा आदमी आगे बढ़ते हुए स्थिर वस्तुओं को पीछे की दिशा में जाते देखता है, बिल्कुल उसी तरह श्रीलंका में (अर्थात भूमध्य रेखा पर) लोगों द्वारा स्थिर तारों को ठीक पश्चिम में जाते हुए देखा जाता है। [''अचलानी भानी समांपाशाचिमागानी'' - गोलपाद .9]
 
अगला छंद तारों और ग्रहों की गति को वास्तविक गति के रूप में वर्णित करता है:
:जैसे एक नाव में बैठा आदमी आगे बढ़ते हुए स्थिर वस्तुओं को पीछे की दिशा में जाते देखता है, बिल्कुल उसी तरह श्रीलंका में (अर्थात भूमध्य रेखा पर) लोगों द्वारा स्थिर तारों को ठीक पश्चिम में जाते हुए देखा जाता है। [''अचलानी भानी समांपाशाचिमागानी'' - गोलपाद .9]
: ''उदय-अस्तमय-निमित्तम् नित्यम् प्रवहेण वायुना क्षिप्तस्।
 
: ''लङ्का-सम-पश्चिम-गस् भ-पञ्जरस् स-ग्रहस् भ्रमति ॥'' (आर्यभटीय गोलपाद १०)
परन्तु अगला छंद तारों और ग्रहों की गति को वास्तविक गति के रूप में वर्णित करता है: "उनके उदय और अस्त होने का कारण इस तथ्य की वजह से है कि प्रोवेक्टर हवा द्वारा संचालित गृह और एस्टेरिस्म्स चक्र श्रीलंका में निरंतर पश्चिम की तरफ चलायमान रहते हैं।
 
''लंका'' ([[श्रीलंका]]) यहाँ भूमध्य रेखा पर एक सन्दर्भ बिन्दु है, जिसे खगोलीय गणना के लिए मध्याह्न रेखा के सन्दर्भ में समान मान के रूप में ले लिया गया था।