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'''[[निघंटु]]''' भारतीय कोश का प्राचीनतम रूप है। निघंटु सामान्यत: ऐसे कोशों को कहते हैं जिनमें ऐसे प्राचीन शब्दों का विवेचन होता था जो तत्काल प्रचलित न हों। निघंटु का आरंभ वैदिक भाषा के ऐसे शब्दों के संग्रह के लिये हुआ था जिनका प्रचलन लोक से उठ गया था और लोगों को उनके समझने में कठिनाई होने लगी थी। [[यास्क]] का [[निरुक्त]] ऐसे ही एक निघंटु का भाष्य है। यास्क द्वारा व्याख्यात निघंटु पंचाध्यायी कहा जाता है। इसके प्रथम तीन अध्यायों को नैघंटुक कांड कहा गया है। इन कांडों के शब्दों की व्याख्या यास्क ने अपने निरुक्त के दूसरे और तीसरे अध्याय में की है। इनमें 1341 शब्द हैं पर व्याख्या केवल 230 शब्दों की ही है। निघंटु के परिगणित शब्दों में संज्ञा अर्थात् नाम और आख्यात् एवं अव्यय पदो का संकलन है। सर्वप्रथम पृथिवीबोधक इक्कीस पर्यायवाची शब्दों का परिचय है; तदनंतर ज्वलनार्थक अग्नि के ग्यारह पर्याय किए गए हैं। इस रूप मे तीनों अध्यायों में पर्यायवाची अथवा समानार्थबोधक शब्दों का समूह है। इनमें अनेक शब्द अनेकार्थक भी हैं। निघंटु में उनका संकलन पर्याय के रूप में ही हुआ है; निरुक्त में उनके अनेक अर्थ उदाहरण सहित बताए गए हैं। चतुर्थ अध्याय में 278 स्वतंत्र पदों का जो किसी के पर्याय नहीं है, संकलन है। इनमें वे शब्द हैं जिनके अनेक अर्थ हैं अथवा ऐसे शब्द हैं। जिनकी व्युत्पत्ति अज्ञात है। अंतिम अध्याय में वैदिक देवताबोधक 151 नाम हैं। इस निघंटु के रचयिता के संबंध में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। कुछ लोग यास्क को ही निघंटु और निरुक्त का रचयिता अनुमान करते हैं। कुछ उसे ऐसे वेदज्ञ ऋषि की रचना मानते हैं जिसका नाम अज्ञात है और कुछ उसे अनेक व्यक्तियों को रचना बताते हैं। इस उपलब्ध निघंटु के अतिरिक्त अन्य अनेक निघंटु तैयार हुए होंगे पर वे सभी लुप्त हैं।
 
वैदिक निघंटुओं की परंपरा कदाचित् आगे चलकर लुप्त हो गई परंतु [[अथर्ववेद]] के [[उपवेद]] [[आयुर्वेद]] में इस नाम के ग्रंथो की परंपरा चलती रही। इस प्रकार का एक निघंटु [[न्वंतरिधन्वंतरि निघंटु]] है जो चौथी शती ई. के पूर्व किसी समय की रचना अनुमान की जाती है। नौ अध्याय के इस ग्रंथ में पारिभाषिक शब्दों के अर्थ के साथ साथ उनके गुण-दोष का भी उल्लेख है।
 
==== निघंटु ग्रंथों के अनंतर ====