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हालांकि पाकिस्तान नाम को चौधरी चौधरी रहमत अली द्वारा पहले ही प्रस्तावित कर दिया गया था परंतु
<ref>Choudhary Rahmat Ali, (1933), ''[[Now or Never; Are We to Live or Perish Forever?]]'', pamphlet, published January 28. (Rehmat Ali at the time was an undergraduate at the [[University of Cambridge]])</ref> सन 1933 तक मजलूम हक मोहम्मद अली जिन्ना एवं अन्य मुसलमान नेता हिंदू मुस्लिम एकता के सिद्धांत पर दृढ़ थे,<ref>Ian Talbot (1999), ''Pakistan: a modern history'', St. Martin's Press, ISBN 0-312-21606-8</ref> परंतु अंग्रेजों द्वारा लगातार प्रचारित किए जा रहे विभाजन प्रोत्साह गलतफहमियों मैं हिंदुओं में मुसलमानों के प्रति अविश्वास और द्वेष की भावना को जगा दिया था इन परिस्थितियों द्वारा खड़े हुए अतिसंवेदनशील राजनैतिक माहौल ने भी पाकिस्तान बनाने के उस प्रस्ताव को बढ़ावा दिया था<ref>Reginald Coupland (1943), ''Indian Politics (1936–1942)'', Oxford university press, London</ref>
 
इस प्रस्ताव की पेशी के उपलक्ष में प्रतीवर्ष 23 मार्च को [[पाकिस्तान]] में [[यौम-ए-पाकिस्तान]]('''पाकिस्तान दिवस''') के रूप में मनाया जाता है।
== पृष्ठभूमि व सत्र ==
[[File:Chaudhry Khaliquzzaman.jpg|250px|thumb|right|मुस्लिम लीग के लाहौर सत्र में भाषण देते हुए मौलाना खलकुज़्ज़माम]]
[[23 मार्च]] को [[लाहौर]] के [[मिंटो पार्क]] में [[ऑल इंडिया मुस्लिम लीग]] के तीन दिवसीय वार्षिक बैठक के अंत में वह ऐतिहासिक संकल्प पारित किया गया था, जिसके आधार पर [[ ऑल इंडिया मुस्लिम लीग | मुस्लिम लीग]] ने भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों के अलग देश के अधिग्रहण के लिए आंदोलन शुरू किया था और सात साल के बाद अपनी मांग पारित कराने में सफल रही।
 
[[उपमहाद्वीप]] में [[ब्रिटिश राज]] द्वारा सत्ता जनता को सौंपने की प्रक्रिया के पहले चरण में 1936/1937 में पहले आम चुनाव हुए थे उनमें [[मुस्लिम लीग]] को बुरी तरह से हार उठानी पड़ी थी और उसके इस दावे को गंभीर नीचा पहुंची थी कि वह उपमहाद्वीप के मुसलमानों के एकमात्र प्रतिनिधि सभा है। इसलिए [[मुस्लिम लीग]] नेतृत्व और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गए थे और उन पर एक अजब बेबसी का आलम था।
 
[[कांग्रेस]] को [[चेन्नई | मद्रास]], यू पी, सी पी, [[बिहार]] और [[उड़ीसा]] में स्पष्ट बहुमत हासिल हुई थी, [[खैबर पख्तूनख्वा | सीमा]] और [[मुंबई | बम्बई]] में उसने दूसरे दलों के साथ मिलकर गठबंधन सरकार का गठन किया था और [[सिंध]] और [[असम]] में जहां [[मुस्लिम]] हावी थे [[अखिल भारतीय कांग्रेस | कांग्रेस]] को काफी सफलता मिली थी।
 
पंजाब में अलबत्ता [[सिर इनाम हुसैन]] के [[यूनीनसट पार्टी]] और [[बंगाल]] में [[कृपा हक | मौलवी कृपा हक]] की प्रजा कृषक पार्टी को जीत हुई थी।
 
ग़रज़ [[भारत]] के 11 प्रांतों में से किसी एक राज्य में भी [[मुस्लिम लीग]] को सत्ता प्राप्त न हो सका। इन परिस्थितियों में [[मुस्लिम लीग]] ऐसा लगता था, उपमहाद्वीप के राजनीतिक धारा से अलग होती जा रही है।
 
[[File:Muhammad Zafarullah Khan.jpg|thumb|left|upright|मुहम्मद जफरुल्ला खान, दस्तावेज के लेखक]]
इस दौरान [[अखिल भारतीय कांग्रेस | कांग्रेस]] ने जो पहली बार सत्ता के नशे में कुछ ज्यादा ही सिर शार थी, ऐसे उपाय किए जिनसे मुसलमानों के दिलों में भय और खतरों ने जन्म लेना शुरू कर दिया। जैसे [[अखिल भारतीय कांग्रेस | कांग्रेस]] ने [[हिंदी]] को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया, गाओ क्षय पर पाबंदी लगा दी और [[अखिल भारतीय कांग्रेस | कांग्रेस]] के तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिया।
 
इस मामले में [[मुस्लिम लीग]] की सत्ता खोने के साथ अपने नेतृत्व में यह भावना पैदा हो रहा था कि [[मुस्लिम लीग]] सत्ता से इस आधार पर वंचित कर दी गई है कि वह अपने आप को मुसलमानों की प्रतिनिधि सभा कहलाती है। यही प्रारंभ बिंदु था मुस्लिम लीग के नेतृत्व में दो अलग राष्ट्रों की भावना जागरूकता कि।
 
इसी दौरान [[द्वितीय विश्व युद्ध]] समर्थन के बदले सत्ता की भरपूर हस्तांतरण के मसले पर [[ब्रिटिश राज]] और [[अखिल भारतीय कांग्रेस | कांग्रेस]] के बीच चर्चा भड़का और [[अखिल भारतीय कांग्रेस | कांग्रेस] ] सत्ता से अलग हो गई तो [[मुस्लिम लीग]] के लिए कुछ दरवाजे खुलते दिखाई दिए। और इसी पृष्ठभूमि में [[लाहौर]] में '' [[ऑल इंडिया मुस्लिम लीग]] '' 'का यह 3 दिवसीय बैठक 22 मार्च को शुरू हुआ।
 
बैठक से 4 दिन पहले [[लाहौर]] में [[अल्लामा पूर्वी इनायत उल्लाह ख़ां | अल्लामा पूर्वी]] के [[दीन]] पार्टी ने पाबंदी तोड़ते हुए एक सैन्य परेड की थी जिसे रोकने के लिए पुलिस ने गोलीबारी की। 35 के करीब दीन मारे गए। इस घटना की वजह से [[लाहौर]] में जबरदस्त तनाव था और [[पंजाब]] में [[मुस्लिम लीग]] की सहयोगी पार्टी [[यूनीनसट पार्टी]] सत्ता थी और इस बात का खतरा था कि दीन के फावड़ा वाहक कार्यकर्ता , [[मुस्लिम लीग]] का यह बैठक न होने दें या इस अवसर पर हंगामा बरपा है।
 
संयोग ही गंभीरता के मद्देनजर [[मुहम्मद अली जिन्ना]] ने उद्घाटन सत्र को संबोधित किया जिसमें उन्होंने पहली बार कहा कि [[भारत]] में समस्या सांप्रदायिक ोरारना तरह का नहीं है बल्कि बेन इंटरनेशनल है यानी यह दो देशों की समस्या है।
उन्होंने कहा कि हिंदुओं और मुसलमानों में अंतर इतना बड़ा और स्पष्ट है कि एक केंद्रीय सरकार के तहत उनका गठबंधन खतरों से भरपूर होगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में एक ही रास्ता है कि उन्हें अलग ममलकतें हूँ।
 
दूसरे दिन इन्हीं पदों पर [[23 मार्च]] को इस समय के [[बंगाल]] के [[मुख्यमंत्री]] [[कृपा हक | मौलवी कृपा हक]] ने संकल्प लाहौर दिया जिसमें कहा गया था कि इस तब तक कोई संवैधानिक योजना न तो व्यवहार्य होगा और न मुसलमानों को होगा जब तक एक दूसरे से मिले हुए भौगोलिक इकाइयों अलग गाना क्षेत्रों में परिसीमन न हो। संकल्प में कहा गया था कि इन क्षेत्रों में जहां मुसलमानों की संख्यात्मक बहुमत है जैसे कि भारत के उत्तर पश्चिमी और पूर्वोत्तर क्षेत्र, उन्हें संयोजन उन्हें मुक्त ममलकतें स्थापित की जाएं जिनमें शामिल इकाइयों को स्वायत्तता और संप्रभुता उच्च मिल ।मिल।
 
मौलवी इनाम उल द्वारा की पेशकश की इस संकल्प का समर्थन यूपी के मुस्लिम लेगी नेता [[चौधरी रिएक ाल्समाँ]], पंजाब [[मौलाना जफर अली खान]], सीमा से [[सरदार औरंगजेब]] सिंध से [[सिर अब्दुल्ला हारून]] और बलूचिस्तान से [[काजी ईसा]] ने की। संकल्प [[23 मार्च]] को समापन सत्र में पारित किया गया।
 
[[Image:Ispahani..jpg|left|thumb|[[हसन इस्फ़हानी]]]]
पहली बार पाकिस्तान की मांग के लिए क्षेत्रों की पहचान 7 अप्रैल सन् 1946 [[दिल्ली]] के तीन दिवसीय सम्मेलन में की गई जिसमें केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं के मुस्लिम लेगी सदस्यों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में [[ब्रिटेन]] से आने वाले [[कैबिनेट मिशन]] के प्रतिनिधिमंडल के सामने मुस्लिम लीग की मांग पेश करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया था जिसका मसौदा मुस्लिम लीग की कार्यकारिणी के दो सदस्यों [[चौधरी रिएक ाल्समाँ]] और [[हसन इस्फ़हानी]] ने तैयार किया था। इस करादाद में स्पष्ट रूप से पाकिस्तान में शामिल किए जाने वाले क्षेत्रों की पहचान की गई थी। पूर्वोत्तर में [[बंगाल]] और [[असम]] और उत्तर पश्चिम में [[पंजाब]], [[पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत | सीमा]], [[सिंध]] और [[बलूचिस्तान]]। आश्चर्य की बात है कि इस संकल्प में [[कश्मीर]] का कोई जिक्र नहीं था हालांकि उत्तर पश्चिम में मुस्लिम बहुल क्षेत्र था और [[पंजाब]] से जुड़ा हुआ था।
 
यह बात बेहद महत्वपूर्ण है कि [[दिल्ली]] कन्वेंशन इस संकल्प में दो राज्यों का उल्लेख बिल्कुल हटा दिया गया था जो संकल्प लाहौर में बहुत स्पष्ट रूप से था उसकी जगह पाकिस्तान की एकमात्र राज्य की मांग की गई थी।
सिर सिकंदर हयात खान दूसरे वर्ष सन 1942 में 50 साल की उम्र में निधन हो गया यूं पंजाब में [[मुहम्मद अली जिन्ना]] तीव्र विरोध के उठते हुए हिसार से मुक्ति मिल गई।
 
सन् 1946 के दिल्ली अधिवेशन में पाकिस्तान की मांग संकल्प [[हुसैन शहीद सोहरावर्दी]] ने पेश की और [[यूपी]] के मुस्लिम लेगी नेता [[चौधरी रिएक ाल्समाँ]] ने इसकी तायद की थी। संकल्प लाहौर पेश करने वाले [[कृपा हक | मौलवी कृपा हक]] इस सम्मेलन में शरीक नहीं हुए क्योंकि उन्हें सुन 1941 में [[मुस्लिम लीग]] सेखारज कर दिया गया था।
 
दिल्ली सम्मेलन में बंगाल के नेता [[अबू अलहाश्म]] ने इस संकल्प पर जोर विरोध किया और यह तर्क दिया है कि इस संकल्प लाहौर संकल्प से काफी अलग है जो [[मुस्लिम लीग]] के संविधान का हिस्सा है- उनका कहना था कि संकल्प लाहौर में स्पष्ट रूप से दो राज्यों के गठन की मांग की गई थी इसलिए दिल्ली कन्वेंशन को [[मुस्लिम लीग]] की इस बुनियादी संकल्प में संशोधन का कतई कोई विकल्प नहीं-