"अखिल भारतीय हिन्दू महासभा": अवतरणों में अंतर

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== स्थापना ==
[[स्वराज्य]] के लिए मुसलिम सहयोग की आवश्यकता समझकर कांग्रेस ने जब मुसलमानों के [[मुस्लिम तुष्टीकरण|तुष्टीकरण]] की नीति अपनाई तो कितने ही हिंदू देशभक्तों को बड़ी निराशा हुई। फलस्वरूप सन्वर्ष 1910१९११ में पूज्य पं॰ [[मदनमोहन मालवीय]] के नेतृत्व में [[प्रयाग]] में हिंदू महासभा की स्थापना की गई।
 
सन्वर्ष 1916१९१६ में [[बालगंगाधर तिलक|लोकमान्य तिलक]] की अध्यक्षता में [[लखनऊ]] में कांग्रेस अधिवेशन हुआ। यद्यपि तिलक जी भी मुस्लिमपोषकनीति से क्षुब्ध थे, फिर भी लखनऊ कांग्रेस ने ब्रिटिश अधिकारियों के प्रभाव में पड़कर एकता और राष्ट्रहित की दोहाई देकर मुस्लिम लीग से समझौता किया जिसके कारण सभी प्रांतों में मुसलमानों को विशेष अधिकार और संरक्षण प्राप्त हुए। अंग्रेजों ने भी अपनी कूटनीति के अनुसार चेम्सफोर्ड योजना बनाकर मुसलमानों के विशेषाधिकार पर मोहर लगा दी।
 
हिंदू महासभा ने सन्वर्ष 1917१९१७ में [[हरिद्वार]] में महाराजा नंदी कासिम बाजार की अध्यक्षता में अपना अधिवेशन करके [[कांग्रेस]]-[[मुस्लिम लीग]] समझौते तथा [[चेम्सफोर्ड योजना]] का तीव्र विरोध किया किंतु हिंदू बड़ी संख्या में कांग्रेस के साथ थे अत: सभा के विरोध का कोई परिणाम न निकला।
 
अंग्रेजों ने स्वाधीनता आंदोलन का दमन करने के लिए [[रौलट ऐक्ट]] बनाकर क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए पुलिस और फौजी अदालतों को व्यापक अधिकार दिए। कांग्रेस की तरह हिंदू महासभा ने भी इसके विरुद्ध आंदोलन चलाया, पर मुसलमान आंदोलन से दूर थे। उसी समय गांधी जी ने [[तुर्की]] के खलीफा को अंग्रेजों द्वारा हटाए जाने के विरुद्ध तुर्की के [[खिलाफत आंदोलन]] के समर्थन में भारत में भी खिलाफत आंदोलन चलाया। हजारों हिंदू इस आंदोलन में जेल गए परंतु खिलाफत का प्रश्न समाप्त होने ही मुसलमानों ने पुन: कोहाट, मुलतान और मालावार आदि में मार-काट कर सांप्रदायिकता की आग भड़काई।