"इब्न-बतूता" के अवतरणों में अंतर

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== जीवनी ==
इसके पूर्वजों का व्यवसाय काजियों का था। इब्न बत्तूता आरंभ से ही बड़ा धर्मानुरागी था। उसे मक्के की यात्रा (हज) तथा प्रसिद्ध मुसलमानों का दर्शन करने की बड़ी अभिलाषा थी। इस आकांक्षा को पूरा करने के उद्देश्य से वह केवल 2221 बरस की आयु में यात्रा करने निकल पड़ा। चलते समय उसने यह कभी न सोचा था कि उसे इतनी लंबी देश देशांतरों की यात्रा करने का अवसर मिलेगा। मक्के आदि तीर्थस्थानों की यात्रा करना प्रत्येक मुसलमान का एक आवश्यक कत्र्तव्य है। इसी से सैकड़ों मुसलमान विभिन्न देशों से मक्का आते रहते थे। इन यात्रियों की लंबी यात्राओं को सुलभ बनाने में कई संस्थाएँ उस समय मुस्लिम जगत् में उत्पन्न हो गई थीं जिनके द्वारा इन सबको हर प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त होती थीं और उनका पर्यटन बड़ा रोचक तथा आनंददायक बन जाता था। इन्हों संस्थाओं के कारण दरिद्र से दरिद्र "हाजी" भी दूर-दूर देशों से आकर हज करने में समर्थ होते थे।
 
इब्न बत्तूता ने इन संस्थाओं की बार-बार प्रशंसा की है। वह उनके प्रति अत्यंत कृतज्ञ है। इनमें सर्वोतम वह संगठन था जिसके द्वारा बड़े से बड़े यात्री दलों की हर प्रकार की सुविधा के लिए हर स्थान पर आगे से ही पूरी-पूरी व्यवस्था कर दी जाती थी एवं मार्ग में उनकी सुरक्षा का भी प्रबंध किया जाता था। प्रत्येक गाँव तथा नगर में ख़ानकाहें (मठ) तथा सराएँ उनके ठहरने, खाने पीने आदि के लिए होती थीं। धार्मिक नेताओं की तो विशेष आवभगत होती थी। हर जगह शेख, काजी आदि उनका विशेष सत्कार करते थे। इस्लाम के भ्रातृत्व से सिद्धांत का यह संस्था एक ज्वलंत उदाहरण थी। इसी के कारण देशदेशांतरों के मुसलमान बेखटके तथा बड़े आराम से लंबी लंबी यात्राएँ कर सकते थे। दूसरी सुविधा मध्यकाल के मुसलमानों का यह प्राप्त थीं कि अफ्रीका और भारतीय समुद्रमार्गो का समूचा व्यापार अरब सौदागरों के हाथों में था। ये सौदागर भी मुसलमान यात्रियों का उतना ही आदर करते थे।