"बिहार का मध्यकालीन इतिहास" के अवतरणों में अंतर

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सामान्यतः ऐसा माना जाता है। कि बिहार पर प्रथम आक्रमण प्रथम तुर्क बख्तियार खिलजी ने किया था, परन्तु उसके आक्रमण से पूर्व भी बिहार में तुर्कों का आवागमन था। तुर्कों का प्रारम्भिक प्रभाव क्षेत्र पटना जिले का मनेर था। जहाँ हदारस मोमिन यारिफ बसने आये थे।
 
११९७-९८ ई. के पश्‍चात्‌ [[बख्तियार खिलजी]] ने [[मगध]] क्षेत्र में प्रथम आक्रमण किया और लूटा। इसके पश्‍चात उसने आधुनिक [[बिहार शरीफ]] (ओदन्तपुरी) पर आक्रमण किया। ओदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय के लूटने के बाद नालन्दा विश्‍वविद्यालय को जलाकर तहस-नहस कर दिया। इसी समय उसने आधुनिक बख्तियारपुर शहर को बसाया। इसी दौरान बिहार शरीफ तुर्कों का केन्द्र के रुपरूप में उभरा।
 
== बौद्ध विहार ==
* बौद्ध धर्म में बौद्ध भिक्षुओं के ठहरने के स्थान को विहार कहते हैं। यही विहार जो तुर्कों द्वारा दिया गया है। वह बाद में बिहार हो गया।
 
* बिहार शब्द विहार का अपभ्रंश रुपरूप है। यह शब्द बौद्ध (मठों) विहारों कि क्षेत्रीय बहुलता के कारण (बिहार) तुर्कों द्वारा दिया हुआ नाम है।
 
बिहार का अर्थ- "बौद्ध भिक्षुओं का निवास"
 
== ममलूक वंश ==
बख्तियार खिलजी की मृत्यु (१२०६ ई.) के बाद अलीमर्दन बिहार का कार्यकारी शासक बना। इसके बाद हस्युयद्दीन इवाज खिलजी ने गयासुद्दीन तुगलक (१२०७-२७ ई.) के नाम से लखनौती में स्वतन्त्र सत्ता कायम की और १२११ ई. में हूसामुद्दीन ने गयासुद्दीन की उपाधि धारण की। वह तिरहुत राजा से नजराना वसूला करता था। इसके बाद इजाउद्दीन तुगरील तुगान खान (१२३३-४५ ई.) ने भी तिरहुत पर आक्रमण किया था। दिल्ली में इल्तुतमिश के सुल्तान बनने के बाद उसने बिहार पर विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन १२८५ ई. तक विशाल सएना लेकर बिहार की ओर चल पड़ा, उसने बिहार शरीफ एवं बाढ़ पर अधिकार कर लिया और लखनौती के आगे बढ़ा परन्तु राजमहल की पहाड़ियों में तोलियागढ़ी शासक इवाज की सेना से मुठभेड़ हुई उसने तुरन्त अधीनता स्वीकार कर आत्मसमर्पण कर दिया। इल्तुतमिश ने मालिक अलाउद्दीन जानी को बिहार में दिल्ली के प्रथम प्रतिनिधि के रुपरूप में नियुक्‍त किया, परन्तु शीघ्र ही इवाज ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद इल्तुतमिश का पुत्र नसीरुद्दीन महमूद अन्त में वहाँ आया। बलबन की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत से बिहार पुनः स्वतन्त्र हो गया।
 
ममलूक राजवंश के समय तुर्कों का मनेर, बिहार शरीफ के अलावा शाहाबाद (गया), पटना, मुंगेर, भागलपुर, नालन्दा, सासाराम एवं विक्रमशिला इत्यादि क्षेत्रों पर अधिकार रहा। परन्तु दक्षिण बिहार में तुर्कों का उतना प्रभाव क्षेत्रों पर अधिकार रहा। परन्तु दक्षिण बिहार में तुर्कों का उतना प्रभाव क्षेत्र नहीं रहा।
गयासुद्दीन का अन्तिम सैन्य अभियान बंगाल विजय थी। उसने १३२४ ई. में बंगाल-बिहार के लिए सैन्य अभियान भेजा। लखनौती शासक नसीरुद्दीन ने समर्पण कर दिया परन्तु सोनार गाँव के शासक गयासुद्दीन बहादुर ने विरोध किया, जिसे पराजित कर दिल्ली भेज दिया गया।
 
तुगलक वंश के समय में ही मुख्य रुपरूप से बिहार पर दिल्ली के सुल्तानों का महत्वपूर्ण वर्चस्व कायम हुआ। गयासुद्दीन तुगलक ने १३२४ ई. में बंगाल अभियान से लौटते समय उत्तर बिहार के कर्नाट वंशीय शासक हरिसिंह देव को पराजित किया। इस प्रकार तुर्क सेना ने तिरहुत की राजधानी डुमरॉवगढ़ पर अधिकार कर लिया और अहमद नामक को राज्य की कमान सौंपकर दिल्ली लौट गया। गयासुद्दीन की १३२५ ई. में मृत्यु के बाद उसका पुत्र उलूख खान बाद में जौना सा मुहम्मद-बिन-तुगलक नाम से दिल्ली का सुल्तान बना।
 
मुहम्मद-बिन-तुगलक के काल में बिहार के प्रान्तपति मखदूल मुल्क था, जिसे कर्नाट वंश के राजा हरिसिंह देव के खिलाफ अभियान चलाकर नेपाल भागने के लिए मजबूर कर दिया था। इस प्रकार तिरहुत क्षेत्र को तुगलक साम्राज्य में मिला लिया तथा इस क्षेत्र का नाम तुगलकपुर रखा गया, जो वर्तमान दरभंगा है। दरभंगा में मुहम्मद-बिन-तुगलक ने एक दुर्ग और जामा मस्जिद बनवाई। इसी के समकालीन सूफी सन्त हजरत शर्फुउद्दीन याहया मेनरी का बिहार में आगमन हुआ। १३५१ ई. मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद दिल्ली का सुल्तान उसका चचेरा भाई फिरोज तुगलक बना।
 
== [[चेरो राजवंश]] ==
बिहार में चेरो राजवंश के उदय का प्रमाण मिलता है, जिसका प्रमुख चेरो राज था। वह शाहाबाद, सारण, चम्पारण एवं मुजफ्फर तक विशाल क्षेत्र पर एक शक्‍तिशाली राजवंश के रुपरूप में विख्यात है।
 
१२वीं शताब्दी में चेरो राजवंश का विस्तार बनारस के पूरब में पटना तक तथा दक्षिण में बिहार शरीफ एवं गंगा तथा उत्तर में कैमूर तक था। दक्षिण भाग में चेरो सरदारों का एक मुस्लिम धर्म प्रचारक मंसुस्‍हाल्लाज शहीद था। शाहाबाद जिले में चार चेरो रान्य में विभाजित था-
बिहार के मध्यकालीन इतिहास में नूहानी वंश का उदय एक महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट स्थान रखता है क्योंकि इसके उदय में सिकन्दर लोदी (१४८९-१५१७ ई.) के शासनकालीन अवस्था में हुए राजनैतिक परिवर्तनों से जुड़ा है।
 
जब सिकन्दर लोदी सुल्तान बना तो उसका भाई (जो जौनपुर के गवर्नर था) वारवाक शाह ने विद्रोह कर बिहार में शरण ली। इसके पहले जौनपुर का पूर्व शासक हुसैन शाह शर्की भी बिहार में आकर तिरहुत एवं सारण के जमींदारों के साथ विद्रोही रुपरूप में खड़े थे।
 
बिहार विभिन्न समस्याओं का केन्द्र बना हुआ था फलतः सिकन्दर लोदी ने बिहार तथा बंगाल के लिए अभियान चलाया।
बिहार में अफगानों का इतिहास भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस समय सूर वंश का अभि उत्‍थान हुआ जो बिहार सहित भारत में राजनीतिक स्थिति में क्रान्तकारी परिवर्तन हुआ। यह काल सूर वंश का काल १५४० से १५४५ ई. तक माना जाता है। यहँ पठानो का लम्बी अवधि तक शासन रहा।
 
शेरशाह ने १५४० ई. में उत्तर भारत में सूर वंश तथा द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की। शेरशाह को भारतीय इतिहास में उच्च कोटि का शासक, सेनानायक और साम्राज्य निर्माता कहा जाता है। वह सूर वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक था। उसने प्रारम्भिक जीवन में अरबी और फारसी में अध्यन किया। पानीपत के युद्ध के उपरान्त शेरशाह दिल्ली में बाबरी सेना में भर्ती हो गया। शेरशाह ने बाबर की सेना में रहकर युद्ध के तरीके और अस्त्रों का प्रयोग व्यापक रुपरूप से सीखा। इसी अनुभव के आधार पर शेरशाह ने हुमायूँ को चौसा और कन्नौज के युद्ध में पराजित किया। उसने १५२७ ई. के अन्त तक मुगलों की अधीनता के साथ रहकर अपनी अफगान शक्‍ति को बढ़ाया।
 
बिहार का शासक-मुगलों ने विद्रोही अफगानों को पराजित कर अफगान सैनिकों के योग्य अफगान को नष्ट कर दिया। १५२८ ई. के असफल अफगान विद्रोह के बाद शेर खाँ जलाल खाँ का मन्त्री और संरक्षक नियुक्‍त हो गया। शेर खाँ ने संरक्षक की हैसियत से शासन करना प्रारम्भ कर दिया। उसने स्थानीय सरदारों पर कड़ा नियन्त्रण रखा, उसके हिसाब पर जांच कराई और प्रजा पर अत्याचार करने वालों को दण्डित किया जिससे नूहानी सरदार शत्रु हो गये। नूहानी सरदारों ने बंगाल शासक नुसरतशाह से आवेदन किया कि बिहार को शेर खाँ के प्रभाव से मुक्‍त करने का प्रयास करे।
बिहार के महान अफगान सम्राट शेरशाह का स्थापित सूर वंश के पतन के बाद भी बिहार अफगानो के अधीन बना रहा। ताज खाँ करारानी, सुलेमान खाँ एवं दाऊद खाँ करारानी आदि के अधीन में रहा।
 
इन अफगान शासकों ने बिहार पर अपना नियन्त्रण १५८० ई. तक बनाये रखा। सुलेमान खाँ ने १५५६ ई. से १५७२ ई. तक शासन किया और अपना अधिकार क्षेत्र को उड़ीसा तक विस्तार किया। उसने तत्कालीन सम्राट के साथ सम्मानप‘ऊर्ण व्यवहारिकता बनाये रखी, लेकिन उसका पुत्र दाऊद खाँ करारानी ने अकबर के प्रति अहंकारी रवैया अपनाया। फलतः मुगल शासक अकबर ने १५७४ ई. में बिहार पर आक्रमण किया और पटना पर अधिकार कर लिया। दाऊद खाँ भाग गया। बिहार मुगलों के अधीन १५७४ ई. से १५८० ई. तक पूर्णत हो गया। १५८० ई. तक बिहार को मुगल साम्राज्य एक प्रान्त के रुपरूप में घोषित कर दिया गया।
 
अफगानों ने विद्रोह का झण्डा बुलन्द किया तथा खान-ए-खनाम मुनीम खान को बिहार का गवर्नर नियुक्‍त किया गया। मुजफ्फर खान, टोडरमल एवं मुनीम खाँ ने इस अवधि में रोहतासगढ़, सूरजगढ़, मुंगेर भागलपुर एवं अन्य इलाकों पर कब्जा कर लिया।