"समराङ्गणसूत्रधार" के अवतरणों में अंतर

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===यांत्रिकी===
समरांगणसूत्रधार के ३१वें अध्याय में यन्त्रों की क्रियाओं का वर्णन निम्न प्रकार है-
: कस्यचित्का किया साध्या,कालः साध्यस्तु कस्यचित्कस्यचित्।
: शब्दः कस्यापि चोच्छायोरूपस्पर्शो च कस्यचिद् ॥
: क्रियास्तु कार्यस्य वशादनंत्ताः परिकीर्तिताः।
किसी भी यंत्र के मुख्य गुण क्या-क्या होने चाहिए, इसका वर्णन समरांगण सूत्रधार में करते हुए पुर्जों के परस्पर सम्बंध, चलने में सहजता, चलते समय विशेष ध्यान न देना पड़े, चलने में कम ऊर्जा का लगना, चलते समय ज्यादा आवाज न करें, पुर्जे ढीले न हों, गति कम-ज्यादा न हो, विविध कामों में समय संयोजन निर्दोष हो तथा लंबे समय तक काम करना आदि प्रमुख २० गुणों की चर्चा करते हुए ग्रंथ में कहा गया है-
 
: यन्त्राणामाकृतिस्तेन निर्णेतुं शक्यतेशक्यते।
: यथावद्बीजसंयोगः सौश्लिष्ट्यं श्लक्ष्णतापि च ॥
: अलक्षता निर्वहणं लघुत्वं शब्दहीनताशब्दहीनता।
: शब्दे साध्ये तदाधिक्यमशैथिल्यमगाढता ॥
: वहनीषु समस्तासु सौश्लिष्ट्यं चास्खलद्रतिचास्खलद्रति।
: यताभीष्टार्थकारित्वं लयतालानुगामिता ॥
: इष्टकालेऽर्थदर्शित्वं पुनः सम्यक्त्वसंवृतिःसम्यक्त्वसंवृतिः।
: अनुल्बणत्वं ताद्रूप्यं दाढर्येमसृणता तथा ॥
: चिरकालसहत्वं च यन्त्रस्यैते गुणः स्मृताःस्मृताः।
 
अर्थात्