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*(7) [[शंकरदिग्विजय]] (आदि शंकराचार्य का लोक प्रख्यात जीवन चरित्)।
 
अंतिम ग्रंथ की रचना के विषय में आलोचक संदेहशील भले हों, परंतु पूर्वनिबद्ध छहों ग्रंथ माधवाचार्य की असंदिग्ध रचनाएँ हैं। अनेक वर्षों तक मंत्री का अधिकार संपन्न कर और साम्राज्य को अभीष्ट सिद्धि की ओर अग्रसर कर माधवाचार्य ने संन्यास ले लिया और श्रृंगेरी के माननीय पीठ पर आसीन हुए। इनका इस आश्रम का नाम था - विद्यारण्यविद्यारण्य। इस समय भी इन्होंने पीठ को गतिशील बनाया तथा [[पंचदशी]] नामक ग्रंथ का प्रणयन किया जो [[अद्वैत वेदांत]] के तत्वों के परिज्ञान के लिए नितांत लोकप्रिय ग्रंथ है। विजयनगर सम्राट की सभा में अमात्य माधव, माधवाचार्य से नितांत पृथक् व्यक्ति थे जिन्होंने [[सूतसंहिता]] के ऊपर [[तात्पर्यदीपिका]] नामक व्याख्या लिखी है। सायण को वेदों के भाष्य लिखने का आदेश तथा प्रेरणा देने का श्रेय इन्हीं माधवाचार्य को है। इसी कारण सायणने वेदभाष्यको "माधवीय वेदार्थप्रकाश" नाम दिया है|
 
== सायण के गुरु ==