"अहल अल-हदीस" के अवतरणों में अंतर

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'''अहले हदीस''' ([[फ़ारसी]]:اهل حدیث‎‎, [[उर्दू]]: اہل حدیث‎, ) एशिया में [[सुन्नी]] इस्लाम मानते हैं। इन्हें सलफ़ी भी कहा जा है।<ref>Yoginder Sikand, "Islamist Militancy in Kashmir: The Case of the Lashkar-e Taiba." Taken from [https://books.google.com/books?id=Jc8gvJ7maJIC&pg=PA226 The Practice of War: Production, Reproduction and Communication of Armed Violence], pg. 226. Eds. Aparna Rao, Michael Bollig and Monika Böck। New York: Berghahn Booksहै।सल्फ़ी, 2008.वहाबी ISBNऔर 9780857450593</ref>अहले हदीस
 
सुन्नियों में एक समूह ऐसा भी है जो किसी एक ख़ास इमाम के अनुसरण की बात नहीं मानता और उसका कहना है कि शरीयत को समझने और उसके सही ढंग से पालन के लिए सीधे क़ुरान और हदीस (पैग़म्बर मोहम्मद के कहे हुए शब्द) का अध्ययन करना चाहिए.
 
इसी समुदाय को सल्फ़ी और अहले-हदीस और वहाबी आदि के नाम से जाना जाता है. यह संप्रदाय चारों इमामों के ज्ञान, उनके शोध अध्ययन और उनके साहित्य की क़द्र करता है.
 
लेकिन उसका कहना है कि इन इमामों में से किसी एक का अनुसरण अनिवार्य नहीं है. उनकी जो बातें क़ुरान और हदीस के अनुसार हैं उस पर अमल तो सही है लेकिन किसी भी विवादास्पद चीज़ में अंतिम फ़ैसला क़ुरान और हदीस का मानना चाहिए.
 
सल्फ़ी समूह का कहना है कि वह ऐसे इस्लाम का प्रचार चाहता है जो पैग़म्बर मोहम्मद के समय में था. इस सोच को परवान चढ़ाने का सेहरा इब्ने तैमिया(1263-1328) और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब(1703-1792) के सिर पर बांधा जाता है और अब्दुल वहाब के नाम पर ही यह समुदाय वहाबी नाम से भी जाना जाता है.
 
मध्य पूर्व के अधिकांश इस्लामिक विद्वान उनकी विचारधारा से ज़्यादा प्रभावित हैं. इस समूह के बारे में एक बात बड़ी मशहूर है कि ये धार्मिक मामलों में बहुत कट्टर हैं. सऊदी अरब के मौजूदा शासक इसी विचारधारा को मानते हैं.<ref>Yoginder Sikand, "Islamist Militancy in Kashmir: The Case of the Lashkar-e Taiba." Taken from [https://books.google.com/books?id=Jc8gvJ7maJIC&pg=PA226 The Practice of War: Production, Reproduction and Communication of Armed Violence], pg. 226. Eds. Aparna Rao, Michael Bollig and Monika Böck। New York: Berghahn Books, 2008. ISBN 9780857450593</ref>
 
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