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== इतिहास ==
तत्व शब्द के साहित्यिक अर्थ अनेक हैं, पर [[रसायन विज्ञान]] में इसका प्रयोग विशेष अर्थ में होता है। पंचतत्व के अंतर्गत हमारे साहित्य में '''पृथ्वी, जल, तेजस, वायु और आकाश''' की गणना बहुत पुराने समय से होती आ रही है। पंचज्ञानेंद्रियों से रूप, रस, गंध स्पर्श और शब्द इन पंचतन्मात्राओं, पंचविषयों या पाँच संवेदनाओं की अनुभूति होती है और जिन स्थूल भूतों के कारण ये पंचतन्मात्राएँ व्यक्त होती हैं उन्हें ही पंचतत्व कहते हैं। सांख्य और वैशेषिक दर्शनों के आधार पर पृथ्वी का गुण गंध है और तद्विषयक ज्ञानेंद्रिय नासिका है, जल का गुण रस है और तद्विषयक ज्ञानेंद्रिय रसना या जिह्वा है, तेजस् या अग्नि का गुण रूप है और तद्विषयक ज्ञानेंद्रिय चक्षु है, वायु का गुण स्पर्श है और तद्वविषयक ज्ञानेंद्रिय त्वचा है तथा आकाश का गुण शब्द है, जिससे संबंध रखनेवाली ज्ञानेंद्रिय कर्ण हैं।
 
[[चीन]] के विद्वान् भी पुराने समय में, जैसा ईसा से 2,000 वर्ष पूर्व के लेख शू-किंग से पता चलता है, पाँच तत्व मानते थे। समस्त भौतिक सृष्टि के मूलाधार तत्व थे: '''पृथ्वी, अग्नि, जल धातु और काष्ठ'''। इन विद्वानों ने तत्व शब्द की कभी स्पष्ट परिभाषा देने की चेष्टा नहीं की। [[अरस्तू]] ने तत्वों के साथ भौतिक गुणों के संबंध का निर्देश किया। ये गुण थे: शुष्क या आर्द्र, उष्ण या शीतल और गुरु (भारी) या अल्प गुरु (हलका)।
 
यूरोप में 16वीं शती में रसायन के क्षेत्र का विस्तार हुआ, मामूली धातुओं को स्वर्ण में परिणत करना और आयु बढ़ाने एवं शरीर को निरोग करने के लिये ओषधियों की खोज करना रसायन का लक्ष्य बना। [[पैरासेल्सस]] ने तीन या चार तत्व माने, जिसके मूलाधार लवण, गंधक और पारद माने गए। ये तीनों क्रमश: स्थिरता, दहन या ज्वलन, एवं द्रवत्व या वाष्पशीलता के गुणों से संबंध रखते थे। 17वीं शती में फ्रांस एवं इंग्लैड में भी इसी प्रकार के विचारों के प्रश्रय मिलता रहा। डॉ॰ विलिस (1621-1675 ई0) ने मूलाधार सक्रिय तत्व ये माने : पारा या स्पिरिट, गंधक या तेल और लवण तथा इनके साथ निष्क्रिय तत्व जल या कफ और मिट्टी भी माने। जे0 बी0 वान हेलमॉण्ट (1577-1644 ई0) ने [[पानी]] को ही मुख्य तत्व माना और ये लवण, गंधक और पारे को भी मूलत: पानी समझते थे। हवा को भी उन्होने तत्व माना।
 
तत्व के संबंध में सबसे अधिक स्पष्ट विचार [[रॉबर्ट बॉयल]] (1627-1691 ई0) ने 1661 ई0 में रखा। उसने तत्व की परिभाषा यह दी कि हम तत्व उन्हें कहेंगें, जो किसी यांत्रिक या [[रासायनिक क्रिया]] से अपने से भिन्न दो पदार्थों में विभाजित न किए जा सकें।
 
स्टाल ने चार तत्व माने थे अम्ल, जल, पृथ्वी और फलॉजिस्टन। यह अंतिम तत्व वस्तुओं के जलने में सहायक होता था। रॉबर्ट बॉयल की परिभाषा को मानकर रसायनज्ञों ने तत्वों की सूची तैयार करनी प्रारंभ की। बहुत समय तक पानी तत्व माना जाता रहा। 1774 ई0 में [[प्रीस्टली]] ने [[ऑक्सीजन]] गैस तैयार की। [[कैवेंडिश]] ने 1781 ई0 में आक्सीजन और हाइड्रोजन के योग से पानी तैयार करके दिखा दिया और तब पानी तत्व न रहकर [[यौगिक|यौगिकों]] की श्रेणी में आ गया। [[लाव्वाज्ये]] ने 1789 ई0 में यौगिक और तत्व के प्रमुख अंतरों को बताया। उसके समय तक तत्वों की संख्या 23 पहुँच चुकी थी। 19वीं शती में [[सर हंफ्री डेवी]] ने [[नमक]] के मूल तत्व [[सोडियम]] को भी पृथक् किया और [[कैल्सियम]] तथा [[पोटासियम]] को भी यौगिकों में से अलग करके दिखा दिया। डेवी के समय के पूर्व [[क्लोरीन]] के तत्व होने में संदेह माना जाता था। लोग इसे ऑक्सिम्यूरिएटिक अम्ल मानते थे, क्योकिक्योंकि यह म्यूरिएटिक अम्ल (नमक का तेजाब) के ऑक्सीकरण से बनता था, पर डेवी (1809-1818 ई0) ने सिद्ध कर दिया कि क्लोरीन तत्व है।
 
प्रकृति में कितने तत्व हो सकते हैं, इसका पता बहुत दिनों तक रसायनज्ञों को न था। अत: तत्वों की खोज के इतिहास में बहुत से ऐसे तत्वों की भी घोषणा कर दी गई, जिन्हें आज हम तत्व नहीं मानते। 20वीं शती में [[मोजली]] नामक तरुण वैज्ञानिक ने [[परमाणु संख्या]] की कल्पना रखी, जिससे स्पष्ट हो गया कि सबसे हलके तत्व [[हाइड्रोजन|उदजन]] से लेकर प्रकृति में प्राप्त सबसे भारी तत्व [[यूरेनियम]] तक तत्वों की संख्या लगभग 100 हो सकती है। [[रेडियोधर्मिता|रेडियोधर्मी]] तत्वों की खोज ने यह स्पष्ट कर दिया कि तत्व [[बॉयल]] की परिभाषा के अनुसार सर्वथा अविभाजनीय नहीं है। प्रकृति में यूरेनियम विभक्त होकर स्वयं दूसरे तत्वों में परिणत होता रहता है। प्रयोगों ने यह भी संभव करके दिखा दिया है कि हम अपनी प्रयोगशालाओं में तत्वों का विभाजन और नए तत्वों का निर्माण भी कर सकते हैं। यूरेनियम के आगे 8-9 तत्वों को कृत्रिम विधि से बनाया भी जा सका है।
 
== प्रचुरता ==
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