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इन्दिरा का जन्म 19 नवम्बर 1917 को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली [[नेहरू-गांधी परिवार|नेहरू परिवार]] में हुआ था। इनके पिता [[जवाहरलाल नेहरू]] और इनकी माता [[कमला नेहरू]] थीं।
 
इन्दिरा को उनका "गांधी" उपनाम [[फिरोज गांधी|फिरोज़ गाँधी]] से [[विवाह]] के पश्चात मिला था।<ref>[http://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/indira-gandhi-former-india-pm-firoge-gandhi-115062500010_1.html इंदिरा इस तरह बनीं गांधी, पढ़ें पूरी कहानी...] (वेबदुनिया)</ref> इनका [[मोहनदास करमचंद गाँधी]] से न तो खून का और न ही शादी के द्वारा कोई रिश्ता था। इनके पितामह [[मोतीलाल नेहरू]] एक प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादी नेता थे। इनके पिता [[जवाहरलाल नेहरू]] भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रमुख व्यक्तित्व थे और आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री रहे।
 
1934–35 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात, इन्दिरा ने [[शान्तिनिकेतन]] में [[रवीन्द्रनाथ टैगोर]] द्वारा निर्मित [[विश्व-भारती विश्वविद्यालय]] में प्रवेश लिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही इन्हे "प्रियदर्शिनी" नाम दिया था। इसके पश्चात यह इंग्लैंड चली गईं और [[ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय]] की प्रवेश परीक्षा में बैठीं, परन्तु यह उसमे विफल रहीं और [[ब्रिस्टल]] के [[बैडमिंटन स्कूल]] में कुछ महीने बिताने के पश्चात, 1937 में परीक्षा में सफल होने के बाद इन्होने [[सोमरविल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड]] में दाखिला लिया। इस समय के दौरान इनकी अक्सर फिरोज़ गाँधी से मुलाकात होती थी, जिन्हे यह [[इलाहाबाद]] से जानती थीं और जो [[लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स]] में अध्ययन कर रहे थे। अंततः 16 मार्च 1942 को आनंद भवन, इलाहाबाद में एक निजी आदि धर्म [[ब्रह्म]]-[[वेद|वैदिक]] समारोह में इनका विवाह फिरोज़ से हुआ।
उनकी परवरिश अपनी माँ की सम्पूर्ण देखरेख में, जो बीमार रहने के कारण नेहरू परिवार के गृह सम्बन्धी कार्यों से अलग रही, होने से इंदिरा में मजबूत सुरक्षात्मक प्रवृत्तिओं के साथ साथ एक निःसंग व्यक्तित्व विकसित हुआ। उनके पितामह और पिता का लगातार राष्ट्रीय राजनीती में उलझते जाने ने भी उनके लिए साथिओं से मेलजोल मुश्किल कर दिया। उनकी अपनी बुओं (पिता की बहनों) के साथ जिसमे [[विजयाल्क्ष्मी पंडित]] भी थीं, मतविरोध रही और यह राजनैतिक दुनिया में भी चलती रही।
 
इन्दिरा ने युवा लड़के-लड़कियों के लिए [[वानर सेना]] बनाई, जिसने विरोध प्रदर्शन और झंडा जुलूस के साथ साथ कांगेस के नेताओं की मदद में संवेदनशील प्रकाशनों तथा प्रतिबंधित सामग्रीओं का परिसंचरण कर [[भारतीय स्वतंत्रता संग्राम]] में छोटी लेकिन उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। प्रायः दोहराए जानेवाली कहानी है कीकि उन्होंने पुलिस की नजरदारी में रहे अपने पिता के घर से बचाकर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज, जिसमे 1930 दशक के शुरुआत की एक प्रमुख क्रांतिकारी पहल की योजना थी, को अपने स्कूलबैग के माध्यम से बहार उड़ा लिया था।
 
सन् 1936 में उनकी माँ कमला नेहरू [[तपेदिक]] से एक लंबे संघर्ष के बाद अंततः स्वर्गवासी हो गईं। इंदिरा तब 18 वर्ष की थीं और इस प्रकार अपने बचपन में उन्हें कभी भी एक स्थिर पारिवारिक जीवन का अनुभव नहीनहीं मिल पाया था। उन्होंने प्रमुख भारतीय, यूरोपीय तथा ब्रिटिश स्कूलों में अध्यन किया, जैसे[[शान्तिनिकेतन]], [[बैडमिंटन स्कूल]] और[[ऑक्सफोर्ड]]।
 
1930 दशक के अन्तिम चरण में [[ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय]], [[इंग्लैंड]] के [[सोमरविल्ले कॉलेज]] में अपनी पढ़ाई के दौरान वे लन्दन में आधारित स्वतंत्रता के प्रति कट्टर समर्थक [[भारतीय लीग]] की सदस्य बनीं।<ref>फ्रैंक, कैथेराइन (2001)''इंदिरा :इंदिरा नेहरू गांधी की जीवनी''</ref>
गांधीगण बाद में [[इलाहाबाद]] में बस गये, जहाँ फिरोज ने एक कांग्रेस पार्टी समाचारपत्र और एक बीमा कंपनी के साथ काम किया। उनका वैवाहिक जीवन प्रारम्भ में ठीक रहा, लेकिन बाद में जब इंदिरा अपने पिता के पास [[नई दिल्ली]] चली गयीं, उनके प्रधानमंत्रित्व काल में जो अकेले तीन मूर्ति भवन में एक उच्च मानसिक दबाव के माहौल में जी रहे थे, वे उनकी विश्वस्त, सचिव और नर्स बनीं। उनके बेटे उसके साथ रहते थे, लेकिन वो अंततः फिरोज से स्थायी रूप से अलग हो गयीं, यद्यपि विवाहित का तगमा जुटा रहा।
 
जब भारत का पहला आम चुनाव 1951 में समीपवर्ती हुआ, इंदिरा अपने पिता एवं अपने पती जो [[राय बरेली|रायबरेली]] निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़रहे थे, दोनों के प्रचार प्रबंध में लगी रही। फिरोज अपने प्रतिद्वंदिता चयन के बारे में नेहरू से सलाह मशविरा नहीनहीं किया था और यद्दपि वह निर्वाचित हुए, दिल्ली में अपना अलग निवास का विकल्प चुना। फिरोज ने बहुत ही जल्द एक राष्ट्रीयकृत बीमा उद्योग में घटे प्रमुख घोटाले को उजागर कर अपने [[राजनैतिक भ्रष्टाचार]] के विरुद्ध लड़ाकू होने की छबि को विकसित किया, जिसके परिणामस्वरूप नेहरू के एक सहयोगी, वित्त मंत्री, को इस्तीफा देना पड़ा।
 
तनाव की चरम सीमा की स्थिति में इंदिरा अपने पती से अलग हुईं। हालाँकि सन् 1958 में उप-निर्वाचन के थोड़े समय के बाद फिरोज़ को दिल का दौरा पड़ा, जो नाटकीय ढ़ंग से उनके टूटे हुए वैवाहिक वन्धन को चंगा किया। [[कश्मीर]] में उन्हें स्वास्थोद्धार में साथ देते हुए उनकी परिवार निकटवर्ती हुई। परन्तु [[8 सितम्बर]],[[1960]] को जब इंदिरा अपने पिता के साथ एक विदेश दौरे पर गयीं थीं, फिरोज़ की मृत्यु हुई।
== भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष ==
[[चित्र:Gandhi and Indira.jpg|thumb|left|महात्मा गाँधी के साथ १९३० के दशक में]]
1959 और 1960 के दौरान इंदिरा चुनाव लड़ीं और [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] की अध्यक्ष चुनी गयीं। उनका कार्यकाल घटनाविहीन था। वो अपने पिता के कर्मचारियों के प्रमुख की भूमिका निभा रहीं थीं।
 
नेहरू का देहांत [[27 मई]], [[1964]] को हुआ और इंदिरा नए प्रधानमंत्री [[लालबहादुर शास्त्री|लाल बहादुर शास्त्री]] के प्रेरणा पर चुनाव लड़ीं और तत्काल सूचना और प्रसारण मंत्री के लिए नियुक्त हो, सरकार में शामिल हुईं। हिन्दी के राष्ट्रभाषा बनने के मुद्दे पर दक्षिण के गैर हिन्दीभाषी राज्यों में दंगा छिड़ने पर वह [[चेन्नई]] गईं। वहाँ उन्होंने सरकारी अधिकारियों के साथ विचारविमर्श किया, समुदाय के नेताओं के गुस्से को प्रशमित किया और प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण प्रयासों की देखरेख की। शास्त्री एवं वरिष्ठ मंत्रीगण उनके इस तरह के प्रयासों की कमी के लिए शर्मिंदा थे। मंत्री गांधी के पदक्षेप सम्भवत सीधे शास्त्री के या अपने खुद के राजनैतिक ऊंचाई पाने के उद्देश्य से नहीं थे। कथित रूप से उनका मंत्रालय के दैनिक कामकाज में उत्साह का अभाव था लेकिन वो संवादमाध्यमोन्मुख तथा राजनीति और छबि तैयार करने के कला में दक्ष थीं।
 
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लेकिन,[[जनवादी गणराज्य चीन|जनवादी चीन गणराज्य से]] परमाणु खतरे तथा दो प्रमुख महाशक्तियों की दखलंदाजी में रूचि भारत की स्थिरता और सुरक्षा के लिए अनुकूल नहीं महसूस किए जाने के मद्दे नजर, गांधी का अब एक राष्ट्रीय परमाणु कार्यक्रम था। उन्होंने नये पाकिस्तानी राष्ट्रपति [[ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो]] को एक सप्ताह तक चलनेवाली [[शिमला]] शिखर वार्ता में आमंत्रित किया था। वार्ता के विफलता के करीब पहुँच दोनों राज्य प्रमुख ने अंततः [[शिमला समझौता|शिमला समझौते]] पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत [[कश्मीर]] विवाद को वार्ता और शांतिपूर्ण ढंग से मिटाने के लिए दोनों देश अनुबंधित हुए।
 
कुछ आलोचकों द्वारा नियंत्रण रेखा को एक स्थायी सीमा नहीनहीं बानाने पर इंदिरा गांधी की आलोचना की गई जबकि कुछ अन्य आलोचकों का विश्वास था की पाकिस्तान के 93,000 [[युद्धबंदी]] भारत के कब्जे में होते हुए [[पाकिस्तान शासित कश्मीर|पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर]] को [[पाकिस्तान]] के कब्जे से निकाल लेना चाहिए था। लेकिन यह समझौता [[संयुक्त राष्ट्र]] तथा किसी तीसरे पक्ष के तत्काल हस्तक्षेप को निरस्त किया एवं निकट भविष्य में [[पाकिस्तान]] द्वारा किसी बड़े हमले शुरू किए जाने की सम्भावना को बहुत हद तक घटाया। भुट्टो से एक संवेदनशील मुद्दे पर संपूर्ण आत्मसमर्पण की मांग नहीं कर उन्होंने पाकिस्तान को स्थिर और सामान्य होने का मौका दिया।
 
वर्षों से ठप्प पड़े बहुत से संपर्कों के मध्यम से व्यापार संबंधों को भी पुनः सामान्य किया गया।
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[[चित्र:Indira and Nixon.JPG|thumb|right|220px|1971 में [[रिचर्ड निक्सन]] और इंदिरा गाँधी। उनके बिच गहरा ब्याक्तिगत विद्वेष था जिसका रंग द्विपक्षीय संबंधों में झलका।]]
1960 के दशक में विशेषीकृत अभिनव कृषि कार्यक्रम और सरकार प्रदत्त अतिरिक्त समर्थन लागु होने पर अंततः भारत में हमेशा से चले आ रहे खाद्द्यान्न की कमी को, मूलतः गेहूं, चावल, कपास और दूध के सन्दर्भ में, अतिरिक्त उत्पादन में बदल दिया। बजाय संयुक्त राज्य से खाद्य सहायता पर निर्भर रहने के - जहाँ के एक राष्ट्रपति जिन्हें श्रीमती गांधी काफी नापसंद करती थीं (यह भावना आपसी था: निक्सन को इंदिरा "चुड़ैल बुढ़िया" लगती थीं<ref>[http://news.bbc.co.uk/2/hi/south_asia/4633263.stm बीबीसी समाचार] </ref>), देश एक खाद्य निर्यातक बन गया। उस उपलब्धि को अपने वाणिज्यिक फसल उत्पादन के विविधीकरण के साथ ''[[भारत में हरित क्रांति|हरित क्रांति]]'' के नाम से जाना जाता है। इसी समय दुग्ध उत्पादन में वृद्धि से आयी श्वेत क्रांति से खासकर बढ़ते हुए बच्चों के बीच कुपोषण से निबटने में मदद मिली। 'खाद्य सुरक्षा', जैसे कि यह कार्यक्रम जाना जाता है, 1975 के वर्षों तक श्रीमती गांधी के लिए समर्थन की एक और स्रोत रही।<ref>[http://indiaonestop.com/Greenrevolution.htm]</ref>
 
1960 के प्रारंभिक काल में संगठित हरित क्रांति गहन कृषि जिला कार्यक्रम (आईऐडिपि) का अनौपचारिक नाम था, जिसके तहत शहरों में रहनेवाले लोगों के लिए, जिनके समर्थन पर गांधी --यूँ की, वास्तव में समस्त भारतीय राजनितिक, गहरे रूपसे निर्भरशील रहे थे, प्रचुर मात्रा में सस्ते अनाज की निश्चयता मिली।<ref>Ibid. #3 पी.295</ref> यह कार्यक्रम चार चरणों पर आधारित था:
# नई और बेहतर मौजूदा बीज किस्मों को विकसित करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहकारी अनुसंधान की प्रतिबद्धता
# भूमि अनुदान कॉलेजों के रूप में कृषि संस्थानों के विकास की वैज्ञानिक अवधारणा,<ref>किसान, बी.एच.<i>'हरित क्रांति' के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक एशियाई अध्ययन, xx नंबर 1 (फरवरी, 1986) पन्ना.177</ref>
दस वर्षों तक चली यह कार्यक्रम गेहूं उत्पादन में अंततः तीनगुना वृद्धि तथा चावल में कम लेकिन आकर्षणीय वृद्धि लायी; जबकि वैसे अनाजों के क्षेत्र में जैसे[[बाजरा]], [[चना]] एवं मोटे अनाज (क्षेत्रों एवं जनसंख्या वृद्धि के लिए समायोजन पर ध्यान रखते हुए) कम या कोई वृद्धि नहीनहीं हुई--फिर भी इन क्षेत्रों में एक अपेक्षाकृत स्थिर उपज बरकरार रहे।
 
=== 1971 के चुनाव में विजय और द्वितीय कार्यकाल (1971- 1975) ===
 
गाँधी की सरकार को उनकी 1971 के जबरदस्त जनादेश के बाद प्रमुख कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कांग्रेस पार्टी की आंतरिक संरचना इसके असंख्य विभाजन के फलस्वरूप कमजोर पड़ने से चुनाव में भाग्य निर्धारण के लिए पूरी तरह से उनके नेतृत्व पर निर्भरशील हो गई थी। गांधी का सन् 1971 की तैयारी में नारे का विषय था ''[[गरीबी हटाओ]]''। यह नारा और प्रस्तावित गरीबी हटाओ कार्यक्रम का खाका, जो इसके साथ आया, गांधी को ग्रामीण और शहरी गरीबों पर आधारित एक स्वतंत्र राष्ट्रीय समर्थन देने के लिए तैयार किए गए थे। इस तरह उन्हें प्रमुख ग्रामीण जातियों के दबदबे में रहे राज्य और स्थानीय सरकारों एवं शहरी व्यापारी वर्ग को अनदेखा करने की अनुमति रही थी। और, अतीत में बेजुबां रहे गरीब के हिस्से, कम से कम राजनातिक मूल्य एवं राजनातिक भार, दोनों की प्राप्ति में वृद्धि हुई।
 
[[गरीबी हटाओ]] के तहत कार्यक्रम, हालाँकि स्थानीय रूपसे चलाये गये, परन्तु उनका वित्तपोषण, विकास, पर्यवेक्षण एवं कर्मिकरण नई दिल्ली तथा [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] दल द्वारा किया गया।
"ये कार्यक्रम केंद्रीय राजनैतिक नेतृत्व को समूचे देशभर में नये एवं विशाल संसाधनों के वितरित करने के मालिकाना भी प्रस्तुत किए..."<ref>रथ, नीलकंठ,''"गरीबी हटाओ":क्या आइआरडीपी यह कर सकती है ?"''(ईडब्लूपी, xx, नंo.6) फ़रवरी,1981.</ref>'अंततः,[[गरीबी हटाओ]] गरीबों के बहुत कम काम आये:आर्थिक विकास के लिए आवंटित सभी निधियों के मात्र 4% तीन प्रमुख गरीबी हटाओ कार्यक्रमों के हिस्से गये और लगभग कोईभी "गरीब से गरीब" तबके तक नहीनहीं पहुँची। इस तरह यद्यपि यह कार्यक्रम गरीबी घटाने में असफल रही, इसने गांधी को चुनाव जितानेका लक्ष्य हासिल कर लिया।
 
=== एक्छ्त्रवाद की ओर झुकाव ===
</blockquote>
 
यह भी आरोपित होता है कीकि वह आगे राष्ट्रपति अहमद के समक्ष वैसे [[आदेश|आध्यादेशों]] के जारी करने का प्रस्ताव पेश की जिसमे [[भारत की संसद|संसद]] में बहस होने की जरूरत न हो और उन्हें [[आदेश आधारित शासन]] की अनुमति रहे।
 
साथ ही साथ, गांधी की सरकार ने प्रतिवादिओं को उखाड़ फेंकने तथा हजारों के तादाद में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के गिरिफ्तारी और आटक रखने का एक अभियान प्रारम्भ किया;[[जग मोहन]] के पर्यवेक्षण में, जो की बाद में दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर रहे, [[जामा मस्जिद, दिल्ली|जामा मस्जिद]] के आसपास बसे बस्तियों के हटाने में संजय का हाथ रहा जिसमे कथित तौर पर हजारों लोग बेघर हुए और सैकड़ों मारे गये और इस तरह देश की राजधानी के उन भागों में सांप्रदायिक कटुता पैदा कर दी; और हजरों पुरुषों पर बलपूर्वक [[नसबंदी]] का परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाया गया, जो प्रायश: बहुत निम्नस्तर से लागु किया गया था।