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परम्परा का महत्त्व
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(परम्परा का महत्त्व)
* '''परपरगुरु''' - परमगुरु के गुरु
* '''परमेष्टिगुरु''' - परपरगुरु के गुरु
 
== परम्परा का महत्त्व ==
यास्क ने स्वयं परम्परा की प्रशंसा की है -
 
‘अयं मन्त्रार्थचिन्ताभ्यूहोऽपि श्रुतितोऽपि तर्कतः ॥<ref>(नि० १३॥१२)</ref>
 
अर्थात् मन्त्रार्थ का विचार परम्परागत अर्थ के श्रवण अथवा तर्क से निरूपित होता है। क्योंकि -
 
‘न तु पृथक्त्वेन मन्त्रा निर्वक्तव्याः प्रकरणश एव निर्वक्तव्याः।'
 
मन्त्रों की व्याख्या पृथक्त्वया हो नहीं सकती, अपि तु प्रकरण के अनुसार ही हो सकती है।
 
‘न ह्येषु प्रत्यक्षमस्ति अनृषेरतपसो वा ॥'
 
वेदों का अर्थ किसके द्वारा सम्भव है? इस विषय पर यास्क का कथन है कि - मानव न तो ऋषि होते हैं, न तपस्वी तो मन्त्रार्थ का साक्षात्कार कर नहीं सकते। 
 
== इन्हें भी देखें ==
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