"पुरुषार्थ" के अवतरणों में अंतर

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योग वसिष्ट के अनुसार सद्जनो और शास्त्र के उपदेश अनुसार चित्त का विचरण ही पुरुषार्थ कहलाता हे |<ref>http://hariomgroup.org/hariombooks/paath/Hindi/ShriYogaVashishthaMaharamayan/ShriYogaVashihthaMaharamayan-Prakarana-2.pdf</ref>
== बाहरी कड़ियाँ ==
* धर्म -
* [http://www.hindigaurav.com/index.php?option=com_content&view=article&id=646:2011-04-14-12-27-28&catid=17:2011-02-27-10-33-29&Itemid=19 चार पुरुषार्थ को जानें] (हिन्दी गौरव)
धर्म का अर्थ होता है धारण करना। अर्थात जो समाज के द्वारा धारण किया जाय।
लोक: धार्यते इति धर्म: ।
किसी ने तो भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक उन्नति के समन्वित रूप को धर्म माना है। और सभी वेदों का योगदान है हमारे कर्म और धर्म में इसलिये मनुस्मृति में लिखा भी है।
"वेदों अखिलो धर्म मूलम"।
अर्थात सभी वेदों का मूल ही धर्म है।
# कौशल किशोर (शिवाजी कॉलेज) DU
 
== सन्दर्भ ==
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