"घूर्णाक्षदर्शी": अवतरणों में अंतर

2,350 बैट्स् जोड़े गए ,  5 वर्ष पहले
सम्पादन सारांश रहित
No edit summary
No edit summary
[[न्यूटन का गति का पहला नियम|न्यूटन के प्रथम गतिनियम]] के अनुसार कोई भी पिंड जिस अवस्था में रहता है उसी में बना रहना चाहता है और उस अवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन का विरोध करने की प्रवृत्ति प्रदर्शित करता है। इस प्रवृत्ति को [[जड़त्व]] (inertia) कहते हैं। अपनी धुरी पर भ्रमण करता हुआ रोटर अपने प्रारंभिक तल में ही परिभ्रमण करना चाहता है और कोई बलघूर्ण (torque) स्थापित करने पर उसका विरोध करता है।
 
घूर्णदर्शी के रोटर की दूसरी विशेषता है '''[[पुरस्सरण]]'''। परिभ्रमण करते हुए किसी पिंड के कोणीय संवेग में परिवर्तन करने के लिये एक बलघूर्ण[[बलाघूर्ण]] आवश्यक होता है। यदि बलधूर्णबलाधूर्ण और [[कोणीय संवेग]] के अक्ष परस्पर संपाती (coincident) होते हैं, तो उस पिंड में एक कोणीय त्वरण उत्पन्न हो जाता है, किंतु उस पिंड के परिभ्रमण का तल अपरिवर्तित रहता है। इसके विपरीत यदि उक्त दोनों अक्ष परस्पर सम-कोणिक होते हैं, तो पिंड के कोणीय वेग में कोई अंतर नहीं आता, किंतु परिभ्रमण का तल स्वयं ही घूमने लगता है। इस प्रकार की गति को पुरस्सरण कहते हैं।
 
== घूर्णदर्शी का सिद्धांतसिद्धान्त ==
[[चित्र:Gyroscope operation.gif|right|thumb|300px|तीनों अक्षों में घूमने के लिये स्वतंत्र '''घूर्णदर्शी''' : बाहरी वलय का झुकाव चाहे कुछ भी हो, रोटर की स्पिन-अक्ष की दिशा नहीं बदलेगी]]
घूर्णक्षस्थापी की क्रियाएँ सभी परिभ्रमणशील या घूर्णशील पिंडों में दृष्टिगोचर होती है, किंतु अधिक कोणीय संवेग (momentum) वाले पिंडों में ये क्रियाएँ अधिक स्पष्ट होती हैं। ज्ञातव्य है कि किसी पिंड का कोणीय संवेग '''H = m r<sup>2</sup> w ''', जहाँ m = उस पिंड की संहति, r = उस पिंड के गुरुत्व केंद्र की भ्रमिअक्ष से दूरी तथा w उसका भ्रमिवेग है। [[कोणीय संवेग]] के कारण ही घूर्णाक्षस्थापी में दृढ़ता तथा जड़त्व के गुणों का समावेश होता है।
 
किसी पिंड पर जब कोई बलयुग्म कार्य करता है, तब उस पिंड में बलयुग्म (couple) के अक्ष के चारों ओर एक कोणीय संवेग उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण पिंडपिण्ड में उस अक्ष के चारों और भ्रमि करने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है। जितने समय तक वह बलयुग्म कार्य करता रहेगा उतने समय तक उस पिंड का कोणीय वेग बढ़ता ही जायगा।
 
It follows from this that a moment τ → {display} {} vec {\ tau}} {\ vec \ tau} applied perpendicular to the axis of rotation, and therefore perpendicular to L → {\ displaystyle {\ vec { L}}} {\ vec {L}}, causes a displacement perpendicular to both τ → {\ displaystyle {\ vec {\ tau}} { L}}} {\ vec L}. This movement is called precession. The angular velocity of the precession ΩP is given by
मान लिया, एक भारी चक्र (या पहिया) एक क्षैतिज धुरी क ख पर नर्तन (भ्रमि) कर रहा है। धुरी के दोनों सिरों पर दो बल F और F इस प्रकार कार्य कर रहे हैं कि उनसे एक बलयुग्म का निर्माण होता है। इससे उत्पन्न होने वाला बलघूर्ण '''G = F ´ 1''', जहाँ '''1''' अक्ष क ख की लंबाई है। इसके परिणामस्वरूप यह संपूर्ण प्रणाली एक अन्य लांबिक अक्ष के चारों ओर पुरस्सृत (precess) होने लगेगी। यदि चक्र के परिभ्रमण का वेग '''w''' तथा पुरस्सरण की दर '''w ¢''' हो तो '''G = I ´ w ´ w ¢''', जहाँ '''I''' उस चक्र का नर्तन अक्ष के चारों ओर अवस्थितित्व, या [[जड़त्वाघूर्ण]] (moment of Inertia), है। अत: यदि चक्र का कोणीय संवेग '''I ´ w''' काफी अधिक होगा तो '''w ¢''' का मान बहुत कम होगा।
 
निम्नलिखित समीकरण घूर्णाक्षदर्शी के गुण को अभिव्यक्त करता है-
इससे स्पष्ट है कि बहुत अधिक जड़त्वाघूर्णवाला चक्र (जैसे [[गतिपालक चक्र]] या [[फ्लाई-ह्वील]]) यदि किसी अक्ष के चारों ओर बहुत तेजी से परिभ्रमण कर रहा हो, तो उस पर किसी बाहरी अल्पकालिक बलघूर्ण, '''G''', का प्रभाव अत्यंत क्षीण पड़ेगा, अर्थात् विघ्नकारी बाह्य बलों से वह व्यवहारात: अप्रभावित रहेगा। कोणीय संवेग अधिक हो इस हेतु काफी अधिक व्यासवाला गतिपालक चक्र (फ्लाई-ह्वील) घूर्णाक्षस्थापी में प्रयुक्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त भ्रमि वेग '''w''' बढ़ाकर भी घूर्णक्षस्थापी के कोणीय संवेग में बहुत अधिक सीमा तक वृद्धि की जा सकती है इससे घूर्णक्षस्थापी पर किसी अल्पायु बाह्य बलयुग्म का प्रभाव नहीं पड़ सकता।
 
:<math>\vec\tau={{d \vec L}\over {dt}}={{d(I\vec \omega)} \over {dt}}= I\vec \alpha</math>
 
जहाँ सदिश <math>\vec\tau</math> तथा <math>\vec L</math> क्रमशः घूर्णाक्षदर्शी पर आरोपित बलाघूर्ण तथा कोणीय संवेग हैं। अदिश '''''I ''''' इसका [[जड़त्वाघूर्ण]] है, सदिश <font style="vertical-align:+20%"><math>\vec\omega</math></font> इसका कोणीय वेग है, और सदिश <font style="vertical-align:+20%"><math>\vec\alpha</math></font> कोणीय त्वरण है।
 
इस समीकरण से स्पष्ट है कि यदि बलाघूर्ण <math>\vec\tau</math> को घूर्णन-अक्ष के लम्बवत लगाया जाय (अर्थात <math>\vec{L}</math> के लम्बवत) तो इसके कारण <math>\vec\tau</math> तथा <math>\vec L</math> दोनों के लम्बवत विस्थापन उत्पन्न होगा। इस गति को [[पुरस्सरण]] (précession) कहते हैं। पुरस्सरण का कोणीय वेग '''Ω''{{ind|P}}''''' का व्यंजक निम्नलिखित होगा-
 
:<math>\vec\tau={\vec \Omega}_P \wedge \vec L</math>
[[चित्र:Gyroscope-9-3.svg|अंगूठाकार]]
मान लिया, एक भारी चक्र (या पहिया) एक क्षैतिज धुरी क -ख पर नर्तन (भ्रमि) कर रहा है। धुरी के दोनों सिरों पर दो बल F और F इस प्रकार कार्य कर रहे हैं कि उनसे एक बलयुग्म का निर्माण होता है। इससे उत्पन्न होने वाला बलघूर्ण '''G = F ´ 1.l''', जहाँ '''1l''' अक्ष क -ख की लंबाई है। इसके परिणामस्वरूप यह संपूर्ण प्रणाली एक अन्य लांबिक अक्ष के चारों ओर पुरस्सृत (precess) होने लगेगी। यदि चक्र के परिभ्रमण का वेग '''w''' तथा पुरस्सरण की दर '''w ¢''' हो तो '''G = I ´. w ´. w ¢''', जहाँ '''I''' उस चक्र का नर्तन अक्ष के चारों ओर अवस्थितित्व, या [[जड़त्वाघूर्ण]] (moment of Inertia), है। अत: यदि चक्र का कोणीय संवेग '''I ´ w''' काफी अधिक होगा तो '''w ¢''' का मान बहुत कम होगा।
 
इससे स्पष्ट है कि बहुत अधिक जड़त्वाघूर्णवाला चक्र (जैसे [[गतिपालक चक्र]] या [[फ्लाई-ह्वील]]) यदि किसी अक्ष के चारों ओर बहुत तेजी से परिभ्रमण कर रहा हो, तो उस पर किसी बाहरी अल्पकालिक बलघूर्ण, '''G''', का प्रभाव अत्यंत क्षीण पड़ेगा, अर्थात् विघ्नकारी बाह्य बलों से वह व्यवहारातव्यवहारत: अप्रभावित रहेगा। कोणीय संवेग अधिक हो इस हेतु काफी अधिक व्यासवाला गतिपालक चक्र (फ्लाई-ह्वील) घूर्णाक्षस्थापी में प्रयुक्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त भ्रमि वेग '''w''' बढ़ाकर भी घूर्णक्षस्थापी के कोणीय संवेग में बहुत अधिक सीमा तक वृद्धि की जा सकती हैहै। इससे घूर्णक्षस्थापी पर किसी अल्पायु बाह्य बलयुग्म का प्रभाव नहीं पड़ सकता।
 
उपर्युक्त गुण के कारण घूर्णाक्षस्थापी का प्रयोग पृथ्वी के परिभ्रमण का दिग्दर्शन करने के हेतु किया जा सकता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में [[परिभ्रमण]] करती है। इसका एक परिभ्रमण 24 घंटों में पूरा होता है। यदि किसी घूर्णाक्षस्थापी को पृथ्वी तल के किसी स्थान पर इस प्रकार रखा जाय कि उसका भूमि अक्ष पूर्व पश्चिम दिशा में क्षैतिज रहे, तो पृथ्वी के परिभ्रमण के साथ साथ उसका संपूर्ण ढांचा (frame work) भी पृथ्वी के केंद्र की परिक्रमा करेगा, क्योंकि प्रत्येक समय उस ढाँचे का तल पृथ्वी-तल के लंबवत् (ऊर्घ्वाधर) रहेगा। किंतु अपने जड़त्व तथा अत्यधिक कोणीय संवेग के कारण भूमि अक्ष अपनी प्रारंभिक दिशा के ही समांतर रहेगा। इसलिये पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण भ्रमिअक्ष, जो प्रारंभ में पृथ्वीतल के समांतर था, प्रति क्षण कुछ कोण बनाता हुआ दिखलाई पड़ेगा। इस प्रकार घूणक्षिस्थापी का भ्रमिअक्ष अपने समकोणिक एकक्षैतिज अक्ष के चारों ओर पुरस्सरण करता हुआ प्रतीत होगा।
 
== घूर्णदर्शी के व्यावहारिक उपयोग ==
[[चित्र:Gyroscope hg.jpg|300px|thumb|right|वायुयान, मिसाइल, आदि में प्रयुक्त आधुनिक घूर्णाक्षदर्शी जिसका निर्माण Sperry Co. Corporation ने किया है।
 
घूर्णदर्शी के कुछ महत्वपूर्ण व्यावहारिक उपयोग निम्नलिखित हैं :
 
*1. '''घूर्णक्षस्थिरक (Gyro-stabilizer) के रूप में''' - बाह्य-बलघूर्ण के द्वारा अप्रभावित रहने के घूर्णाक्षस्थापी के गुण का उपयोग सागर के वक्ष पर यात्रा करनेवाले जलयानों को उत्ताल तरंगों के धक्कों से डगमगाने, या उलटने, से बचाने के लिये किया जाता है। इससे सागरीय यात्रा अधिक निरापद एवं कष्टरहित बनाई जा सकी है। जलयानों के डेकों के नीचे यान की केंद्ररेखा पर एक घूर्णाक्षस्थापी लगा दिया जाता है जिसका चक्र, या घूर्णक, विशेष प्रकार के दृढ़ इस्पात का बना होता है। इस घूर्णदर्शी का भ्रमिअक्ष ऊर्ध्वाधर होता है। जब तंरगों के झोंकां से जलयान दाहिने बाएँ डगमगाता है तब भी इसका भ्रमिअक्ष पूर्ववत् ऊर्ध्वाधर बना रहता है। इस कारण वह तंरगों के विरुद्ध एक प्रतिकारी बलघूर्ण का सृजन कर उन्हें संतुलित करता है और इस प्रकर जलयान को सीधा रखने का प्रयत्न करता है। इससे जलयानों का झुकाव किसी भी ओर ऊर्ध्वाधर से चार या पाँच अंशों से अधिक नहीं होने पाता और उसके यात्रियों को तज्जनित कष्ट या असुविधा की अनुभूति नहीं होती।
*2. घूर्णदर्शी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपयोग [[वायुयान|वायुयानों]] के परिचालन में किया जाता है। उनमें इसका उपयोग दो प्रकार से होता है :
: (क) दिशासूचक घूर्णदर्शी के रूप में, और
: (ख) कृत्रिम क्षितिज के रूप में।
 
एक दूसरा घूर्णदर्शी चालक को यही ठीक ठीक बतलाता है कि वह कितने ऊँचे या नीचे जा रहा है। धरती से बहुत ऊँचाई पर उड़नेवाले वायुयान के चालक को यह पता लगाना कठिन होता है कि उसका यान ऊपर या नीचे की ओर किस दिशा में जा रहा है। इसलिये उसे इस घूर्णदर्शी की सहायता लेनी पड़ती है। इसके भ्रमिअक्ष की प्रारंभिक दिशा ऊर्ध्वाधर होती है। जब वायुयान ऊपर चढ़ता या नीचे उतरता है, तब वायुयान तल के ऊर्ध्वाधर से इस अक्ष के झुकाव द्वारा वायुयान की दिशा का ठीक ठीक ज्ञान हो जाता है। इस घूर्णदर्शी का कृत्रिम क्षितिज कहते हैं, क्योंकि इससे वही सहायता ली जाती है जो पृथ्वी पर क्षितिज से मिलती है। के अनुसार कोई भी पिंड जिस अवस्था में रहता है उसी में बना रहना चाहता है और उस अवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन का विरोध करने की प्रवृत्ति प्रदर्शित करता है। इस प्रवृत्ति को जड़त्व (inertia) कहते हैं। अपनी धुरी पर भ्रमण करता हुआ रोटर अपने प्रारंभिक तल में ही परिभ्रमण करना चाहता है और कोई बलघूर्ण (torque) स्थापित करने पर उसका विरोध करता है।
 
==विभिन्न रूप==
* Gyrostat[edit]
 
* MEMS
 
* HRG
 
* VSG (vibrating structure gyroscope) या CVG (Coriolis vibratory gyroscope)
 
* DTG (dynamically tuned gyroscope)
 
* Ring laser
 
* Fiber optic gyroscope
 
* London moment
 
==सन्दर्भ==
==इन्हें भी देखें==
*[[जाइरेटर]] (Gyrator)
*[[जड़त्वाघूर्ण]]
*[[कोणीय संवेग]]
*[[पुरस्सरण]]
 
== बाहरी कड़ियाँ ==