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आधुनिक काल में बारूद एक "कमजोर विस्फोटक" (low explosive) के रूप में जाना जाता है क्योंकि विस्फोट होने पर यह अपश्रव्य तरंगें (subsonic) पैदा करता है न कि पराश्रव्य तरंगें (supersonic)। इसलिये बारूद के जलने से उत्पन्न गैसे इतना ही दाब पैदा कर पाती हैं जो गोली को आगे फेंकने में सहायक होती है किन्तु बन्दूक की नली को क्षति नहीं पहुंचा पाती। किसी चट्टान के विध्वंस या किसी किले को तोडने के लिये बारूद का प्रयोग उपयुक्त नहीं होता बल्कि इनके लिये "टी एन टी" आदि अच्छे रहते हैं।
 
वर्तमान समय में बारूद के मानक मिश्रण में ७५% शोरा, १५% कोमल लकडीलकड़ी का कोयला तथा १०% गंधक होता है।
 
== इतिहास ==
पीछे अवयवों को शुद्ध रूप में प्राप्त कर उनसे बारूद बनाने में और उन्हें दानेदार बनाने में विशेष सुधार हुआ। अच्छा कोयला भी अब बनने लगा था। उसे भूरा या कोको कोयला कहते थे और यह राई (rye) नामक अनाज के पुआल से बनाया जाता था। पर एतदर्थ पुआल को पूरा पूरा तपाते नहीं थे। सामान्य बारूद में अवयवों का अनुपात निम्नलिखित रखते थे। शोरा 75 प्रतिशत, कोयला 15 प्रतिशत और गंधक 10 प्रतिशत। नए मिश्रण में इनकी आपेक्षिक मात्रा क्रमश: 80, 16, 3 रहती थी तथा एक भाग जल का भी रहता था। ऐसा बारूद बहुत सफल सिद्ध हुआ।
 
स्टैंपिंग मशीन के उपयोग में, जैसा ऊपर कहा गया है, खतरे का भय था। इसके स्थान में चक्र या ह्वील मिल (Wheel Mill) का प्रयोग शरू हुआ। आजकल भी चक्र या ह्वील मिल का उन्नत रूप ही प्रयुक्त होता है। इसमें एक क्षैतिज ईषा (shaft) रहती है, जो ऊर्ध्वाधर स्पिंडल (spindle) के घूमने से घूमती है। स्पिंडल में लोहे के दो भारी चक्र जुड़े रहते हैं, जिनका भार 10 से 12 टन तक और व्यास छह फुट होता है। एक बार में लगभग 300 पाउंड द्रव्य पीसा जाता है। पानी डालकर उसे गीला रखते हैं। पिसाई चार से लेकर पाँच घंटे में संपन्न होती है। फिर वह दबाया जाता है। प्रति वर्ग इंच पर 3,000 से 4,000 पाउंड दबाव रहता है। ऐसे उत्पाद का घनत्व 1.74 से 1.80 तक होता है। इसे फिर तोड़कर विभिन्न विस्तार के दाने प्राप्त करते हैं। इस विधि में समय कुछ अधिक लगता था। अत: अब इसमें कुछ और सुधार किया गया है। दो लोहे के कक्ष, ड्रम के आकार के रहते हैं। एक में शोरा गंधक और दूसरे में कोयला गंधक काँसे की गेंदों के द्वारा पीसा जाता है। चार घंटे में विभिन्न अवयव पूर्ण रूप से चूर्ण हो जाते हैं। दोनों कक्षों से चूर्ण को निकालकर, तीसरे ताँबे के ड्रम में रखकर, काष्ठ की गेंदों से दो घंटे तक पीसते हैं, जिसमें एकसम चूर्ण बन जाता है। इस विधि को बेलननाल (rolling barrel) विधि कहते हैं।
 
== इन्हें भी देखें ==