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[[चित्र:Merian insectes Surinam.jpg|right|thumb|300px|पादप और कीट]]
'''कीटविज्ञान''' (एंटोमॉलोजी Entomology) [[प्राणिविज्ञान]] का एक अंग है जिसके अंतर्गत कीटों अथवा षट्पादों का अध्ययन आता है। षट्पाद (षट्=छह, पाद=पैर) श्रेणी को ही कभी-कभी कीट की संज्ञा देते हैं। कीट की परिभाषा यह की जाती है कि यह वायुश्वसनीय संधिपाद प्राणी (Arthropod) है, जिसमें सिर, वक्ष और उदर स्पष्ट होते हैं; एक जोड़ी श्रृंगिकाएं (Antenna) तीन जोड़े, पैर और वयस्क अवस्था में प्राय: एक या दो जोड़े पंख होते हैं। कीटों में अग्रपाद कदाचित्‌ ही क्षीण होते हैं।
 
== परिचय ==
 
== लाभकारी कीट (Beneficial insects) ==
लाभकारी कीट पाँच भागों में बाँटे जा सकते हैं :
 
क जिनसे लाभदायक पदार्थ उत्पन्न होते हैं ;
 
ख. जो चिकित्सा के काम आते हैं ;
 
ग. जो हानिकारक कीटों के प्राकृतिक नियंत्रण में प्रयुक्त होते हैं ;
 
घ. जो फलों का परागण (Pollination) करते हैं और
 
ड. जो कला के काम आते हैं।
=== आवर्तना (Tropism) ===
कीटों पर वातावरण का लगातार प्रभाव पड़ता है। इसके प्रति वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संवेदनशील होते हैं। इन संवेदनाओं की अभिक्रिया को आवर्तना अथवा ट्रॉपोटैक्सेज़ (Tropotaxes), कहते हैं। आवर्तना कदाचित्‌ ही व्यक्तिश: होती है। किसी प्रकार के रसायन के प्रति कीटों की अभिक्रिया को रासायनिक आवर्तना (Chemotropism), स्पर्शसंवेदना के प्रति स्पर्शावर्तना (थिग्मॉट्रोपिज्म, Thigmotropism), जलधारक के प्रति स्रावावर्तना (रीऑट्रोपिज्म, Rheotropism), जल के प्रति जलावर्तना (हाइड्रॉट्रोपिज्म Hydotropism), विद्युद्धाराओं के प्रति अनिलावर्तना (ऐनिमॉट्रापिज्म, Anemotropism), गुरुत्वाकर्षण के प्रति भूम्यावर्तना (जिऑट्रापिज्म, Geotropism), प्रकाश के प्रति प्रकाशावर्तना (फोटॉट्रोपज्म), उष्णता के प्रति तापावर्तना (थरमॉट्रोपिज्म Thermotropism) कहलाती है।
=== सहजवृति ===
किसी जीव का एक या अनेक संवेदनाओं के प्रति संवेदनशील होना सहजवृत्ति कहलाता है। सहजवृत्तिवाली क्रियाओं के अंतर्गत नियामक परिवर्ती क्रियाएं (कोऑरडिनेटेड, रिफ्ल़ेक्सेज़ Coordinated reflexes) और आवर्तन की जटिल श्रृंखलाएं होती हैं। भारत के पियरिस ब्रैसिकी (Pieris brassiace) के स्वभाव की अपरिवर्तनीयता इसका एक उदाहरण है। मार्च में कुछ कीट (पियरिस ब्रैसिकी) हिमालय के पार्श्व में उड़ते पाए गए थे। अप्रैल के अंत में प्रति मिनट हजारों की संख्या में हिमाच्छादित शिखर की दिशा में, जहां वे निश्यच ही मृत्यु को प्राप्त हुए होंगे, ये उड़ रहे थे। कोई समझ नहीं पाता कि कौन सी शक्ति इन तितलियों को विनाश की ओर प्रेरित करती हैं। वस्तुत: उन्हें इस सर्वनाश का पूर्वाभास नहीं होता। उसी प्रकार देशांतरण करती हुई टिड्डियाँ किसी प्रकार के अवरोध की परवाह नहीं करतीं। निष्कर्ष यह है कि कीट अपने को असाधरण दशा के अनुकूल बनाने में अयोग्य होते हैं।