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===योग के प्रकार===
योग की उच्चावस्था [[समाधि]], [[मोक्ष]], [[कैवल्य]] आदि तक पहुँचने के लिए अनेकों साधकों ने जो साधन अपनाये उन्हीं साधनों का वर्णन योग ग्रन्थों में समय समय पर मिलता रहा। उसी को योग के प्रकार से जाना जाने लगा। योग की प्रमाणिकप्रामाणिक पुस्तकों में [[शिवसंहिता]] तथा [[गोरक्षशतक]] में योग के चार प्रकारों का वर्णन मिलता है -
 
: ''मंत्रयोगों हष्ष्चैव लययोगस्तृतीयकः। ''
====हठयोग====
'''{{मुख्य|हठयोग}}'''
हठ का शाब्दिक अर्थ हटपूर्वकहठपूर्वक किसी कार्य करने से लिया जाता है। हठ प्रदीपिका पुस्तक में हठ का अर्थ इस प्रकार दिया है-
 
: ''हकारेणोच्यते सूर्यष्ठकार चन्द्र उच्यते। ''
: ''सूर्या चन्द्रमसो र्योगाद्धठयोगोऽभिधीयते॥''
 
'''ह''' का अर्थ [[सूर्य]] तथ '''ठ''' का अर्थ [[चन्द्रमा|चन्द्र]] बताया गया है। सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था हठयोग है। शरीर में कई हजार नाड़ियाँ है उनमें तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन है, वे इस प्रकार हैं। सूर्यनाडीसूर्यनाड़ी अर्थात पिंगला जो दाहिने स्वर का प्रतीक है। चन्द्रनाडीचन्द्रनाड़ी अर्थात इड़ा जो बायें स्वारस्वर का प्रतीक है। इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है। इस प्रकार हठयोग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इड़ा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेषप्रवेश कराकर ब्रहमरन्ध्र में समाधिस्थ किया जाता है। [[हठयोग प्रदीपिका|हठ प्रदीपिका]] में हठयोग के चार अंगों का वर्णन है- आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बन्ध तथा नादानुसधान। [[घेरण्डसंहिता]] में सात अंग- ''षटकर्म, आसन, मुद्राबन्ध, प्राणायाम, ध्यान, समाधि'' जबकि [[योगतत्वोपनिषद]] में आठ अंगों का वर्णन है- ''यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, भ्रमध्येहरिम् और समाधि।''
 
====लययोग====
'''{{मुख्य|कुंडलिनी योग}}'''
चित्त का अपने स्वरूप विलीन होना या चित्त की निरूद्ध अवस्था लयोगलययोग के अन्तर्गत आता है। साधक के चित्त् में जब चलते, बैठते, सोते और भोजन करते समय हर समय ब्रहमब्रह्म का ध्यान रहे इसी को लययोग कहते हैं। [[योगत्वोपनिषद]] में इस प्रकार वर्णन है-
: ''गच्छस्तिष्ठन स्वपन भुंजन् ध्यायेन्त्रिष्कलमीश्वरम् स एव लययोगः स्यात'' (22-23)
 
==== राजयोग====
'''{{मुख्य|राजयोग}}'''
राजयोग सभी योगों का राजा कहलाया जाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ समामिग्रीसामग्री अवश्य मिल जाती है। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है। राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों का निरोध करना है।
 
महर्षि पतंजलि के अनुसार समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेशों का नाश होता है, चित्तप्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेकख्याति प्राप्त होती है है।
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