"आर्य प्रवास सिद्धान्त" के अवतरणों में अंतर

सम्पादन सारांश रहित
No edit summary
No edit summary
 
 
उपयुक्त सिद्धांत का प्रतिपादन १८वी शताब्दी के अंत में तब किया गया जब यूरोपीय भाषा परिवार की खोज हुई। जिसके अंतर्गत भारतीय भाषाओं में युरोपीय भाषाओं से कई समानताएं दिखीं। जैसे घोड़े को ग्रीक में इक्वस, फ़ारसी में इश्प और संस्कृत में अश्व कहते हैं, भाई को लैटिन-ग्रीक में फ्रेटर (अंग्रेज़ी में फ्रेटर्निटी, Fraternity), फ़ारसी में बिरादर और संस्कृत में भ्रातर कहते हैं । ऐसे शब्द तो समान दिखते हैं, लेकिन हज़ारों की संख्या में ऐसे शब्द हैं जिनका कोई सबंध नहीं है (जैसे ख़ून को लहू, Blood और Haemo, आदि हज़ारों हैं) । साथ ही संस्कृत और यूरोप की भाषाओं के
From home
 
===विरोधी तर्क ===
भारत की आज़ादी के बाद कई पुरातात्विक खो़ज हुए । इन खोज़ों, और डीएनए के अध्ययन, और भाषाभाषाओं की समरूपता आदि शोध इस सिद्धांत इससेसे मेल नहीं खाते । कुछ तर्क यहाँ दिए गए हैं -
* सबसे पुराने ऋगवेद में आर्य नाम की किसी जाति के आक्रमण का कोई उल्लेख नहीं ।
* किसी प्रयाण या आक्रमण का उल्लेख या यहाँ तक कि गाथा, संस्मरण आदि ना तो वेदों में और ना ही उपनिषद, आरण्यक, दर्शन-ग्रंथों या पुराणों में मिलता है । इसके उलट, रोमन गाथाओं में पूर्व की दिशा से हुए प्रयाण की याद और बाइबल में जोशुआ के पुस्तक में ऐसे छूटे हुए मातृभूमि की झलक मिलती है । यहूदी तालमुद में भी इसरायली लोगों को अपनी ज़मीन से असीरियाई शासको द्वारा बेदखल करने का उल्लेख है । अगर ऐसा कोई आक्रमण या यहाँ तक कि प्रयाण (प्रवास) भी होता तो वेदों-पुराणों-ब्राह्मण ग्रंथों-उपनिषदों-दर्शनों-बौद्ध ग्रंथों आदि में उसका उल्लेख मिलता, लेकिन वो नहीं है ।
8,287

सम्पादन