"श्राद्ध" के अवतरणों में अंतर

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भारतीय संस्कृति अपने माता-पिता या कुदुम्ब-परिवार का ही हित नहीं, अपने समाज या देश का ही हित नहीं वरन पुरे विश्व का हित चाहती है |
 
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को ‘पितृ पक्ष’ या ‘महालय पक्ष’ बोलते हैं । आपका एक माह बीतता है तो पितृलोक का एक दिन होता है । साल में एक बार ही श्राद्ध करने से कुल-खानदान के पितरों को तृप्ति हो जाती है ।
 
श्राद्ध क्यों करें ?
 
गरुड़ पुराण (10.57-59) में आता है कि ‘समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता । पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशुधन, सुख, धन और धान्य प्राप्त करता है ।’
 
‘हारीत स्मृति’ में लिखा है : 
 
न तत्र वीरा जायन्ते नारोग्यं न शतायुषः ।
 
न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवर्जितम् ।।
 
‘जिनके घर में श्राद्ध नहीं होता उनके कुल-खानदान में वीर पुत्र उत्पन्न नहीं होते, कोई निरोग नहीं रहता । लम्बी आयु नहीं होती और किसी तरह कल्याण नहीं प्राप्त होता (किसी-न-किसी तरह की झंझट और खटपट बनी रहती है) ।’
 
महर्षि सुमंतु ने कहा : ‘‘श्राद्ध जैसा कल्याण-मार्ग गृहस्थी के लिए और क्या हो सकता है ! अतः बुद्धिमान मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए ।’’
 
श्राद्ध पितृलोक में कैसे पहुँचता है ?
 
श्राद्ध के दिनों में मंत्र पढ़कर हाथ में तिल, अक्षत, जल लेकर संकल्प करते हैं तो मंत्र के प्रभाव से पितरों को तृप्ति होती है, उनका अंतःकरण प्रसन्न होता है और कुल-खानदान में पवित्र आत्माएँ आती हैं ।
 
‘यहाँ हमने अपने पिता का, पिता के पिता का और उनके कुल-गोत्र का नाम लेकर ब्राह्मण को खीर खिलायी, विधिवत् भोजन कराया और वह ब्राह्मण भी दुराचारी, व्यसनी नहीं, सदाचारी है । बाबाजी ! हम श्राद्ध तो यहाँ करें तो पितृलोक में वह कैसे पहुँचेगा ?’
 
जैसे मनीऑर्डर करते हैं और सही पता लिखा होता है तो मनीऑर्डर पहुँचता है, ऐसे ही जिसका श्राद्ध करते हो उसका और उसके कुल-गोत्र का नाम लेकर तर्पण करते हो कि ‘आज हम इनके निमित्त श्राद्ध करते हैं’ तो उन तक पहुँचता है । देवताओं व पितरों के पास यह शक्ति होती है कि दूर होते हुए भी हमारे भाव और संकल्प स्वीकार करके वे तृप्त हो जाते हैं । मंत्र और सूर्य की किरणों के द्वारा तथा ईश्वर की नियति के अनुसार वह आंशिक सूक्ष्म भाग उनको पहुँचता है ।
 
‘महाराज ! यहाँ खिलायें और वहाँ कैसे मिलता है ?’
 
भारत में रुपये जमा करा दें तो अमेरिका में डॉलर और इंग्लैंड में पाउंड होकर मिलते हैं । जब यह मानवीय सरकार, वेतन लेनेवाले ये कर्मचारी तुम्हारी मुद्रा (करंसी) बदल सकते हैं तो ईश्वर की प्रसन्नता के लिए जो प्रकृति काम करती है, वह ऐसी व्यवस्था कर दे तो इसमें ईश्वर व प्रकृति के लिए क्या बड़ी बात है ! आपको इस बात में संदेह नहीं करना चाहिए ।
 
जैसी भावना वैसा फल
 
देव, पितर, ऋषि, मुनि आदि सभीमें भगवान की चेतना है । निष्काम भाव से उनको तृप्ति कराने से भगवान में प्रीति होगी । सकाम भाव से उनको तृप्ति कराने से कुल-खानदान में अच्छी आत्माएँ आयेंगी । भगवान ने 5 हजार से भी अधिक वर्ष पहले कहा था :
 
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
 
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।।
 
‘देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं । इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता ।’ (गीता : 9.25)
 
प्रतिमा, मंत्र, तीर्थ, देवता एवं गुरु में जिसकी जैसी बुद्धि, भावना होती है, उसे वैसा फल मिलता है । पितृलोक में जाने की इच्छा से पूजन करता है तो मरने के बाद पितृलोक में जायेगा लेकिन पितरों की भलाई के लिए निष्काम भाव से, कर्तव्यबुद्धि से, भगवान की प्रसन्नता के लिए करता है तो हृदय प्रसन्न होकर उसके हृदय में भगवद्रस तो आयेगा, तड़प बढ़ी तो साकार-निराकार का साक्षात्कार करने में भी सफल होगा ।
 
भूत-प्रेत की सद्गति के लिए कुछ कर लें तो ठीक है लेकिन ‘भूत-प्रेत मुझे यह दे दें’ ऐसी कामना की और उनके प्रति स्थायी श्रद्धा और चिंतन हो गया तो भूतानि यान्ति भूतेज्या… ‘भूतों को पूजनेवाले (मरने के बाद) भूतों को प्राप्त होते हैं ।’ (गीता : 9.25)
 
श्राद्ध फलित होने का आसान प्रयोग
 
स्वधा देवी पितरों को तृप्त करने में सक्षम है । तो उसी देवी के लिए यह मंत्र उच्चारण करना है । श्राद्ध करते समय यह मंत्र 3 बार बोलने से श्राद्ध फलित होता है :
 
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा ।
 
जो जाने-अनजाने रह गये हों, जिनकी मृत्यु की तिथि का पता न हो, उनका भी श्राद्ध-तर्पण सर्वपित्री अमावस्या को होता है ।
 
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