"प्रकाश का वेग": अवतरणों में अंतर

4,652 बाइट्स जोड़े गए ,  5 वर्ष पहले
सम्पादन सारांश नहीं है
छो (49.35.3.223 (Talk) के संपादनों को हटाकर Sanjeev bot के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया)
No edit summary
टैग: यथादृश्य संपादिका मोबाइल संपादन मोबाइल वेब संपादन
== इतिहास ==
आज के लगभग 300 वर्ष पहले यह गलत धारणा थी कि प्रकाश का वेग अनंत होता है, अर्थात् उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचने में कुछ भी समय नहीं लगता। सर्वप्रथम सितंबर, सन् 1676 में रोमर ने इस गलत धारणा को दूर कर यह बताया कि प्रकाश का वेग बहुत अधिक होने के बावजूद 'परिमित' होता है। [[बृहस्पति]] के उपग्रहों के ग्रहणों के अंतर काल में पृथ्वी से संबंधित दूरी के बदलने से होनेवाले परिवर्तन का अध्ययन कर, रोमर ने प्रकाश को पृथ्वी की कक्षा के व्यास को पार करने में लगनेवाले काल को निकाला। पृथ्वी की कक्षा के व्यास को मालूम कर, उसने प्रकाशवेग का मान मालूम किया, जो 2,14,300 किलोमीटर प्रति सेकंड के बराबर ज्ञात हुआ। उन दिनों की विज्ञान की प्रगति को देखते हुए यह अत्यंत प्रशंसापूर्ण कार्य था।
 
माना जाता है की आधुनिक काल में प्रकाश की गति की गणना Scotland के एक भोतिक विज्ञानी '''James Clerk Maxwell'''(13 June 1831 – 5 November 1879) ने की थी ।
 
जबकि आधुनिक समय में '''महर्षि सायण''' , जो वेदों के महान भाष्यकार थे , ने १४वीं सदी में प्रकाश की गति की गणना कर डाली थी जिसका आधार ऋग्वेद के प्रथम मंडल के ५ ० वें सूक्त का चोथा श्लोक था ।
 
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य ।
 
विश्वमा भासि रोचनम् ॥ …ऋग्वेद १. ५ ० .४
 
अर्थात् हे सूर्य, तुम तीव्रगामी एवं सर्वसुन्दर तथा प्रकाश के दाता और जगत् को प्रकाशित करने वाले हो।
 
उपरोक्त श्लोक पर टिप्पणी/भाष्य करते हुए महर्षि सायण ने निम्न श्लोक प्रस्तुत किया
 
तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥
 
-सायण ऋग्वेद भाष्य १. ५ ० .४
 
अर्थात् आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है 
 
उपरोक्त श्लोक से हमें प्रकाश के आधे निमिष में 2202 योजन चलने का पता चलता है अब समय की ईकाई निमिष तथा दुरी की ईकाई योजन को आधुनिक ईकाईयों में परिवर्तित कर सकते है ।
 
किन्तु उससे पूर्व प्राचीन समय व् दुरी की इन ईकाईयों के मान जानने होंगे .
 
निमेषे दश चाष्टौ च काष्ठा त्रिंशत्तु ताः कलाः |
 
त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यात् अहोरात्रं तु तावतः ||……..मनुस्मृति 1-64
 
मनुस्मृति 1-64 के अनुसार :
 
पलक झपकने के समय को 1 निमिष कहा जाता है !
 
18 निमीष = 1 काष्ठ;
 
30 काष्ठ = 1 कला;
 
30 कला = 1 मुहूर्त;
 
30 मुहूर्त = 1 दिन व् रात (लगभग 24 घंटे )
 
अतः एक दिन (24 घंटे) में निमिष हुए : 24 घंटे = 30*30*30*18= 486000 निमिष
 
24 घंटे में सेकंड हुए = 24*60*60 = 86400 सेकंड
 
86400 सेकंड =486000 निमिष
 
अतः 1 सेकंड में निमिष हुए : 1 निमिष = 86400 /486000 = .17778 सेकंड
 
1/2 निमिष =.08889 सेकंड
 
in 1/2 nimisha approx .08889 seconds
 
अब योजन ज्ञान करना है , श्रीमद्भागवतम 3.30.24, 5.1.33, 5.20.43 आदि के अनुसार 1 योजन = 8 मील लगभग 2202 योजन = 8 * 2202 = 17616 मील
 
As per Shrimadbhagwatam 1 yojana equals to approx 8 miles.
 
सूर्य प्रकाश 1/2 (आधे) निमिष में 2202 योजन चलता है अर्थात
 
.08889 सेकंड में 17616 मील चलता है ।
 
.08889 सेकंड में प्रकाश की गति = 17616 मील
 
1 सेक में = 17616 / .08889 = 198177 मील लगभग
 
वेदों के अनुसार प्रकाश की गति 198177 मील/सेकंड
 
आज की प्रकाश गति गणना 186000 मील प्रति सेकंड लगभग
 
== परिचय ==
68

सम्पादन