"श्यामसुन्दर दास" के अवतरणों में अंतर

15 बैट्स् नीकाले गए ,  3 वर्ष पहले
छो (बॉट: वर्तनी एकरूपता।)
बाबू श्याम सुंदर दास का जन्म विद्वानों की काशी में 1875 में हुआ था। इनका परिवार [[लाहौर]] से आकर काशी में बस गया था और कपड़े का व्यापार करता था। इनके पिता का नाम लाला देवी दास खन्ना था। बनारस के [[क्वींस कालेज]] से सन् 1897 में बी. ए. किया। जब इंटर के छात्र थे तभी सन् 1893 में मित्रों के सहयोग से [[नागरी प्रचारिणी सभा|काशी नागरीप्रचारिणी सभा]] की नींव डाली और 45 वर्षों तक निरंतर उसके संवर्धन में बहुमूल्य योग देते रहे। 1895-96 में "[[नागरीप्रचारिणी पत्रिका]]" निकलने पर उसके प्रथम संपादक नियुक्त हुए और बाद में कई बार वर्षों तक उसका संपादन किया। "[[सरस्वती पत्रिका|सरस्वती]]" के भी आरंभिक तीन वर्षों (1899-1902) तक संपादक रहे। 1899 में हिंदु स्कूल के अध्यापक नियुक्त हुए और कुछ दिनों बाद हिंदू कालेज में अंग्रेजी के जूनियर प्रोफेसर नियुक्त हुए। 1909 में [[जम्मू]] महाराज के स्टेट आफिस में काम करने लगे जहाँ दो वर्ष रहे। 1913 से 1921 तक [[लखनऊ]] के कालीचरण हाई स्कूल में हेडमास्टर रहे। इनके उद्योग से विद्यालय की अच्छी उन्नति हुई। 1921 में [[काशी हिंदू विश्वविद्यालय]] में हिंदी विभाग खुल जाने पर इन्हें अध्यक्ष के रूप में बुलाया गया। पाठ्यक्रम के निर्धारण से लेकर हिंदी भाषा और साहित्य की विश्वविद्यालयस्तरीय शिक्षा के मार्ग की अनेक बाधाओं को हटाकर योग्यतापूर्वक हिंदी विभाग का संचालन और संवर्धन किया। इस प्रकार इन्हें हिंदी की उच्च शिक्षा के प्रवर्तन और आयोजन का श्रेय है। उस समय विश्वविद्यालय स्तर की पाठ्य पुस्तकों और अलोचना ग्रंथों का अभाव था। इन्होंने स्वयं अपेक्षित ग्रंथों का संपादन किया, समीक्षाग्रंथ लिखे और अपने सुविज्ञ सहयोगियों से लिखवाए।
 
काशी नागरीप्रचारिणी सभा के माध्यम से श्री श्यामसुंदरदास ने हिंदी की बहुमुखी सेवा की और ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों का सूत्रपात एवं संचालन किया जिनसे हिंदी की अभूतपूर्व उन्नति हुई। न्यायालयों में [[देवनागरी|नागरी]] के प्रवेश के लिए [[महामना मदननोहनमदनमोहन मालवीय|मालवीय जी]] आदि की सहायता में उन्होंने सफल उद्योग किया। [[हिंदी वैज्ञानिक कोश]] के निर्माण में भी योग दिया। हिंदी की लेख तथा [[लिपि]] प्रणाली के संस्कार के लिए आरंभिक प्रयत्न (1898) किया। हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों की खोज का काम आरंभ कर इन्होंने उसे नौ वर्षों तक चलाया और उसकी सात रिपोर्टें लिखीं। "[[हिंदी शब्दसागर]]" के ये प्रधान संपादक थे। यह विशाल शब्दकोश इनके अप्रतिम बुद्धिबल और कार्यक्षमता का प्रमाण है। 1907 से 1929 तक अत्यंत निष्ठा से इन्होंने इसका संपादन और कार्यसंचालन किया। इस कोश के प्रकाशन के अवसर पर इनकी सेवाओं को मान्यता देने के निमित्त "कोशोत्सव स्मारक संग्रह" के रूप में इन्हें अभिनंदन ग्रंथ अर्पित किया गया।
 
[[काशी हिंदू विश्वविद्यालय]] में अध्यापनकार्य के समय उच्च अध्ययन में उपयोग के लिए इन्होंने [[भाषाविज्ञान]], आलोचना शास्त्र और हिंदी भाषा तथा साहित्य के विकास क्रम पर श्रेष्ठ ग्रंथ लिखे।