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भारतीय अनुमान में आगमन और निगमन दोनो ही अंश है। सामान्य व्याप्ति के आधार पर विशेष परिस्थिति में साध्य के अस्तित्व का ज्ञान निगमन है और विशेष परिस्थितियों के प्रत्यक्ष अनुभव आधार पर व्याप्ति की स्थापना आगमन है। पूर्व प्रक्रिया को पाश्चात्य देशों में डिडक्शन और उत्तर प्रक्रिया को इंडक्शन कहते है। [[अरस्तू]] आदि पाश्चात्य तर्कशास्त्रियों ने निगमन पर बहुत विचार किया और [[जॉन स्टुअर्ट मिल|मिल]] आदि आधुनिक तर्कशास्त्रियों ने आगमन का विशेष मनन किया।
 
भारत में व्याप्ति की स्थापनाएँ (आगमन) तीन या तीनों मेमें से किसी एक प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर होती थीं। वे ये हैं :
 
(1) '''[[केवलान्वयी|केवलान्वय]]''', जब लिंग और साध्य का साहचर्य मात्र अनुभव में आता है, जब उनका सह-अभाव न देखा जा सकता हो।