"ओंकारेश्वर मन्दिर" के अवतरणों में अंतर

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इस मंदिर में शिव भक्त कुबेर ने तपस्या की थी तथा शिवलिंग की स्थापना की थी। जिसे शिव ने देवताओ का धनपति बनाया था I कुबेर के स्नान के लिए शिवजी ने अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की थी I यह नदी कुबेर मंदिर के बाजू से बहकर नर्मदाजी में मिलती है, जिसे छोटी परिक्रमा में जाने वाले भक्तो ने प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में देखा है, यही कावेरी ओमकार पर्वत का चक्कर लगते हुए संगम पर वापस नर्मदाजी से मिलती हैं, इसे ही नर्मदा कावेरी का संगम कहते है I # धनतेरस पूजन #
इस मंदिर पर प्रतिवर्ष दिवाली की बारस की रात को ज्वार चढाने का विशेष महत्त्व है इस रात्रि को जागरण होता है तथा धनतेरस की सुबह ४ बजे से अभिषेक पूजन होता हैं इसके पश्चात् कुबेर महालक्ष्मी का महायज्ञ, हवन, (जिसमे कई जोड़े बैठते हैं, धनतेरस की सुबह कुबेर महालक्ष्मी महायज्ञ नर्मदाजी का तट और ओम्कारेश्वर जैसे स्थान पर होना विशेष फलदायी होता हैं) भंडारा होता है लक्ष्मी वृद्धि पेकेट (सिद्धि) वितरण होता है, जिसे घर पर ले जाकर दीपावली की अमावस को विधि अनुसार धन रखने की जगह पर रखना होता हैं, जिससे घर में प्रचुर धन के साथ सुख शांति आती हैं I इस अवसर पर हजारों भक्त दूर दूर से आते है व् कुबेर का भंडार प्राप्त कर प्रचुर धन के साथ सुख शांति पाते हैं I नवनिर्मित मंदिर
प्राचीन मंदिर ओम्कारेश्वर बांध में जलमग्न हो जाने के कारण भक्त श्री चैतरामजी चौधरी, ग्राम - कातोरा (गुर्जर दादा) के अथक प्रयास से नवीन मंदिर का निर्माण बांध के व् ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के बीच नर्मदाजी के किनारे २००६-०७ बनाया गया हैं I
 
== ओंकारेश्वर-दर्शन ==
 
नर्मदा किनारे जो बस्ती है उसे विष्णुपुरी कहते हैं। यहाँ नर्मदाजी पर पक्का घाट है। सेतु (अथवा नौका) द्वारा नर्मदाजी को पार करके यात्री मान्धाता द्वीपमें पहुँचता है। उस ओर भी पक्का घाट है। यहाँ घाट के पास नर्मदाजी में कोटितीर्थ या चक्रतीर्थ माना जाता है ।है। यहीं स्नान करके यात्री सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर ऑकारेश्वर-मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं। मन्दिर तट पर ही कुछ ऊँचाई पर है।
 
 
मन्दिर के अहाते में पञ्चमुख गणेशजी की मूर्ति है। प्रथम तल पर ओंकारेश्वर लिंग विराजमान हैं। श्रीओंकारेश्वर का लिङ्ग अनगढ़ है। यह लिङ्ग मन्दिर के ठीक शिखर के नीचे न होकर एक ओर हटकर है। लिङ्ग के चारों ओर जल भरा रहता है। मन्दिर का द्वार छोटा है। ऐसा लगता है जैसे गुफा में जा रहे हों। पास में ही पार्वतीजी की मूर्ति है। ओंकारेश्वर मन्दिर में सीढ़ियाँ चढ़कर दूसरी मंजिल पर जाने पर महाकालेश्वर लिङ्ग के दर्शन होते हैं। यह लिङ्ग शिखर के नीचे है। तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ लिङ्ग है। यह भी शिखर के नीचे है। चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर लिङ्ग है। पांचवीं मंजिल पर ध्वजेश्वर लिङ्ग है।
चित्र:Dhwajeshwar2_ध्वजेश्वर.jpg|ओंकारेश्वर मन्दिर के पांचवें तल पर स्थित ध्वजेश्वर लिङ्ग की छत का दृश्य
चित्र:Kedareshwarnandi_केदारेश्वर_नन्दी.jpg|ओंकारेश्वर मन्दिर के परिक्रमा क्षेत्र में स्थित केदारेश्वर मन्दिर के प्रांगण में स्थित नन्दी का दृश्य
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तीसरी, चौथी व पांचवीं मंजिलों पर स्थित लिङ्गों के ऊपर स्थित छतों पर अष्टभुजाकार आकृतियां बनी हैं जो एक दूसरे में गुंथी हुई हैं। द्वितीय तल पर स्थित महाकालेश्वर लिङ्ग के ऊपर छत समतल न होकर शंक्वाकार है और वहां अष्टभुजाकार आकृतियां भी नहीं हैं। प्रथम और द्वितीय तलों के शिवलिङ्गों के प्राङ्गणों में नन्दी की मूर्तियां स्थापित हैं। तृतीय तल के प्राङ्गण में नन्दी की मूर्ति नहीं है। यह प्राङ्गण केवल खुली छत के रूप में है। चतुर्थ एवं पंचम तलों के प्रांगण नहीं हैं। वह केवल ओंकारेश्वर मन्दिर के शिखर में ही समाहित हैं। प्रथम तल पर जो नन्दी की मूर्ति है, उसकी हनु के नीचे एक स्तम्भ दिखाई देता है। ऐसा स्तम्भ नन्दी की अन्य मूर्तियों में विरल ही पाया जाता है।
== ओंकारेश्वर यात्राक्रम ==
 
मान्धाता टापू में ही ऑकारेश्वर की दो परिक्रमाएँ होती हैं - एक छोटी और एक बड़ी ।बड़ी। ऑकारेश्वर की यात्रा तीन दिन की मानी जाती है। इस तीन दिन की यात्रा में यहाँ के सभी तीर्थ आ जाते हैं ।हैं। अत: इस क्रम से ही वर्णन किया जा रहा है।
 
प्रथम दिन की यात्रा- कोटि-तीर्थ पर ( मान्धाता द्वीप में ) स्नान और घाट पर ही कोटेश्वर, हाटकेश्वर, त्र्यम्बकेश्वर, गायत्रीश्वर, गोविन्देश्वर, सावित्रीश्वर का दर्शन करके भूरीश्वर, श्रीकालिका तथा पञ्चमुख गणपति का एवं नन्दी का दर्शन करते हुए ऑकारेश्वरजी का दर्शन करे ।करे। ओंकारेश्वर मन्दिर में ही शुकदेव, मान्धांतेश्वर, मनागणेश्वर, श्रीद्वारिकाधीश, नर्मदेश्वर, नर्मदादेवी, महाकालेश्वर, वैद्यनाथेश्वरः, सिद्धेश्वर, रामेश्वर, जालेश्वरके दर्शन करके विशल्या संगम तीर्थ पर विशल्येश्वर का दर्शन करते हुए अन्धकेश्वर, झुमकेश्वर, नवग्रहेश्वर, मारुति (यहाँ राजा मानकी साँग गड़ी है): साक्षीगणेश, अन्नपूर्णा और तुलसीजी का दर्शन करके मध्याह्न विश्राम किया जाता है। मध्याहोत्तर अविमुक्तेश्वर, महात्मा दरियाईनाथ की गद्दी, बटुकभैरव, मङ्गलेश्वर, नागचन्द्रेश्वर, दत्तात्रेय एवं काले-गोरे भैरव का दर्शन करते बाजार से आगे श्रीराममन्दिर में श्रीरामचतुष्टय का तथा वहीं गुफा में धृष्णेश्वर का दर्शन करके नर्मदाजीके मन्दिरमें नर्मदाजी का दर्शन करना चाहिये।
 
दूसरे दिन- यह दिन ऑकार ( मान्धाता ) पर्वत की पञ्चक्रोशी परिक्रमा का है। कोटितीर्थ पर स्नान करके चक्रेश्वर का दर्शन करते हुए गऊघाट पर गोदन्तेश्वर, खेड़ापति हनुमान, मल्लिकार्जुनः, चन्द्रेश्वर, त्रिलोचनेश्वर, गोपेश्वरके दर्शन करते श्मशान में पिशाचमुक्तेश्वर, केदारेश्वर होकर सावित्री-कुण्ड और आगे यमलार्जुनेश्वर के दर्शन करके कावेरी-संगम तीर्थ पर स्नान - तर्पणादि करे तथा वहीं श्रीरणछोड़जी एवं ऋणमुक्तेश्वर का पूजन करे ।करे। आगे राजा मुचुकुन्द के किले के द्वार से कुछ दूर जाने पर हिडिम्बा-संगम तीर्थ मिलता है। यहाँ मार्ग में गौरी-सोमनाथ की विशाल लिङ्गमूर्ति मिलती है (इसे मामा-भानजा कहते हैं)। यह तिमंजिला मन्दिर है और प्रत्येक मंजिल पर शिवलिङ्ग स्थापित हैं। पास ही शिवमूर्ति है। यहाँ नन्दी, गणेशजी और हनुमानजी की भी विशाल मूर्तियाँ हैं ।हैं। आगे अन्नपूर्णा, अष्टभुजा, महिषासुरमर्दिनी, सीता-रसोई तथा आनन्द भैरव के दर्शन करके नीचे उतरे। यह ऑकार का प्रथम खण्ड पूरा हुआ। नीचे पञ्चमुख हनुमान जी हैं। सूर्यपोल द्वार में षोडशभुजा दुर्गा, अष्टभुजादेवी तथा द्वारके बाहर आशापुरी माताके दर्शन करके सिद्धनाथ एवं कुन्ती माता ( दशभुजादेवी ) के दर्शन करते हुए किले के बाहर द्वार में अर्जुन तथा भीम की मूर्तियोंके दर्शन करे ।करे। यहाँ से धीरे-धीरे नीचे उतरकर वीरखला पर भीमाशंकर के दर्शन करके और नीचे उतरकर कालभैरव के दर्शन करे तथा कावेरी-संगम पर जूने कोटितीर्थ और सूर्यकुण्ड के दर्शन करके नौका से या पैदल (ऋतुके अनुसार जैसे सम्भव हो ) कावेरी पार करे ।करे। उस पार पंथिया ग्राम में चौबीस अवतार, पशुपतिनाथ, गयाशिला, एरंडी-संगमतीर्थ, पित्रीश्वर एवं गदाधर-भगवान के दर्शन करे। यहाँ पिण्डदानश्राद्ध होता है। फिर कावेरी पार कर के लाटभैरव-गुफा में कालेश्वर, आगे छप्पनभैरव तथा कल्पान्तभैरवके दर्शन करते हुए राजमहलमें श्रीराम का दर्शन करके औकारेश्वर के दर्शन से परिक्रमा पूरी करे ।करे।
 
तीसरे दिन की यात्रा- इस मान्धाता द्वीप से नर्मदा पार करके इस ओर विष्णुपुरी और ब्रह्मपुरी की यात्रा की जाती है। विष्णुपुरी के पास गोमुख से बराबर जल गिरता रहता है। यह जल जहाँ नर्मदा में गिरता है, उसे कपिला-संगम तीर्थ कहते हैं। वहाँ स्नान और मार्जन किया जाता है। गोमुख की धारा गोकर्ण और महाबलेश्वर लिङ्गों पर गिरती है। यह जल त्रिशूलभेद कुण्ड से आता है। इसे कपिलधारा कहते हैं। वहाँ से इन्द्रेश्वर और व्यासेश्वरका दर्शन करके अमलेश्वर का दर्शन करना चाहिये ।चाहिये।
 
== अमलेश्वर ==
[[चित्र:Amleshwar_अमलेश्वरAmleshwar अमलेश्वर.jpg|अंगूठाकार|ओंकारेश्वर में अमलेश्वर मंदिर का बाहरी दृश्य]]
 
अमलेश्वर भी ज्योतिर्लिङ्ग है ।है। अमलेश्वर मन्दिर अहल्याबाई का बनवाया हुआ है ।है। गायकवाड़ राज्य की ओरसे नियत किये हुए बहुत से ब्राह्मण यहीं पार्थिव-पूजन करते रहते हैं ।हैं। यात्री चाहे तो पहले अमलेश्वर का दर्शन करके तब नर्मदा पार होकर औकारेश्वर जाय; किंतु नियम पहले ओंकारेश्वर का दर्शन करके लौटते समय अमलेश्वर-दर्शन का ही है। पुराणों में अमलेश्वर नाम के बदले विमलेश्वर उपलब्ध होता है।<ref>http://puranastudy.byethost14.com/pur_index26/pva13.htm</ref> अमलेश्वर-प्रदक्षिणा में वृद्धकालेश्वर, बाणेश्वर, मुक्तेश्वर, कर्दमेश्वर और तिलभाण्डेश्वरके मन्दिर मिलते हैं।
 
अमलेश्वरका दर्शन करके (निरंजनी अखाड़ेमें) स्वामिकार्तिक ( अघोरी नाले में ) अघेोरेश्वर गणपति, मारुति का दर्शन करते हुए नृसिंहटेकरी तथा गुप्तेश्वर होकर (ब्रह्मपुरीमें) ब्रह्मेश्वर, लक्ष्मीनारायण, काशीविश्वनाथ, शरणेश्वर, कपिलेश्वर और गङ्गेश्वरके दर्शन करके विष्णुपुरी लौटकर भगवान् विष्णु के दर्शन करे ।करे। यहीं कपिलजी, वरुण, वरुणेश्वर, नीलकण्ठेश्वर तथा कर्दमेश्वर होकर मार्कण्डेय आश्रम जाकर मार्कण्डेयशिला और मार्कण्डेयेश्वर के दर्शन करे ।करे।
 
भगवान के महान भक्त अम्बरीष और मुचुकुन्द के पिता सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने इस स्थान पर कठोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया था। उस महान पुरुष मान्धाता के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत हो गया।