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'''मनोविकार''' (Mental disorder) किसी व्यक्ति के [[मानसिक स्वास्थ्य]] की वह स्थिति है जिसे किसी स्वस्थ व्यक्ति से तुलना करने पर 'सामान्य' नहीं कहा जाता। स्वस्थ व्यक्तियों की तुलना में मनोरोगों से ग्रस्त व्यक्तियों का व्यवहार असामान्‍य अथवा दुरनुकूली (मैल एडेप्टिव) निर्धारित किया जाता है और जिसमें महत्‍वपूर्ण व्‍यथा अथवा असमर्थता अन्‍तर्ग्रस्‍त होती है। इन्हें '''मनोरोग''', '''मानसिक रोग''', '''मानसिक बीमारी''' अथवा '''मानसिक विकार''' भी कहते हैं।
 
मनोरोग मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन की वजह से पैदा होते हैं तथा इनके उपचार के लिए मनोरोग चिकित्सा की जरूरत होती है।<ref>[http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-75452.html असाध्य नहीं मनोरोग]। हिन्दुस्तान लाइव।{{हिन्दी चिह्न}}।[[७ अक्टूबर]], [[२००९]]। डॉ॰ गौरव गुप्ता</ref>
 
== मनोविकारों के प्रकार ==
तनावपूर्ण स्थितियों का सामना करते समय आमतौर पर व्यक्ति समस्या केंद्रित या मनोभाव केंद्रित कूटनीतियों को अपनाता है। समस्या केंद्रित नीति द्वारा व्यक्ति अपने बौद्विक साधानों के प्रयोग से तनावपूर्ण स्थितियों का समाधान ढूंढता है और प्रायः एक प्रभावशाली समाधान की ओर पहुंचता है। मनोभाव केंद्रित नीति द्वारा तनावपूर्ण स्थितियों का सामना करते समय व्यक्ति भावनात्मक व्यवहार को प्रदर्शित करता है जैसे चिल्लाना। यद्यपि, यदि कोई व्यक्ति तनाव का सामना करने में असमर्थ होता है तब वह प्रतिरोधक-अभिविन्यस्त कूटनीति की ओर रूझान कर लेता है, यदि ये बारबार अपनाए जाएं तो विभिन्न मनोविकार उत्पन्न हो सकते हैं। प्रतिरोधक-अभिविन्यस्त व्यवहार परिस्थिति का सामना करने में समर्थ नहीनहीं बनाते, ये केवल अपनी कार्यवाहियों को न्यायसंगत दिखाने का जरिया मात्र है।
 
शारीरिक समस्याएं जैसे ज्वर, खांसी, जुकाम इत्यदि ये विभिन्न प्रकार के मनोविकार होते हैं। इन वर्गों के मनोविकारों की सूची न्यूनतम व्यग्रता से लेकर गंभीर मनोविकारों जैसे मनोभाजन या खंडित मानसिकता तक है। [[अमेरिकी मनोविकारी संघ]] (American Psychiatric Association) द्वारा मनोविकारों पर नैदानिक और सांख्यिकीय नियम पुस्तक ( Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders (DSM)) को प्रकाशित किया गया है जिस में विविध प्रकार के मानसिक विकारों का उल्लेख किया गया है। मनोविज्ञान की जो शाखा विकारों का समाधान खोजती है उसे '''[[असामान्य मनोविज्ञान]]''' कहा जाता है।
 
=== बाल्यावस्था के विकार ===
 
*'''1. सौहार्द स्थापना''' : मनश्चिकित्सक सेवार्थियों से अच्छे और क्रियाशील संबंध निर्मित कर के उन्हें अपने सहयोग का आश्वासन देता है।
 
*'''2. व्यक्ति वृत्त को तैयार करना''' : सेवार्थी के परिवार, मित्र, समाज व जीविका के साथ सामंजस्य स्वरूप को ध्यान में रख कर विशेष विकार का व्यक्ति वृत्त तैयार किया जाता है।
 
*'''3. समस्या पर विचार करना''' : व्यक्ति वृत्त तैयार करने के पश्चात् मनश्चिकित्सक कुछ ऐसी समस्याओं पर विचार करता है जिन्हें तात्कालिक देखरेख की जरूरत होती है, जिनका नैदानिक जांच एवं साक्षात्कार के अनुसार दवा देकर समाधान किया जा सकता है।
 
*'''4. उपचारात्मक सत्र''' : समस्या की प्रकृति और गम्भीरता के अनुसार मनोचिकित्सक सेवार्थी के साथ उपचार केंद्रित सत्र की अगुवाई करता है। प्रत्येक सत्र के पश्चात हुए सुधार का निरीक्षण एवं मूल्यांकन किया जाता है और आवश्यक लगे तो भावी उपचार के तरीकों में बदलाव कर लिया जाता है।
 
*'''5. उपचारात्मक हस्तक्षेप''' : यह सुनिश्चित हो जाने पर कि सत्र द्वारा वांछित परिणामों की प्राप्ति हो गई है तब मनोचिकित्सक सत्र को समाप्त कर देता है। सेवार्थी और उसके परिवार जनों को घर पर ही कुछ सुझावों को मानने की सलाह दी जाती है और जरुरत पड़नेपर सेवार्थी को मनोचिकित्सक के पास दोबारा भी बुलाया जा सकता है।
 
 
*1. प्रारम्भ की स्थिति में कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से स्थिति के सम्मुख आता है। वह साधानों के सम्भाव्य व व्यवहार्यता का मूल्यांकन करता है। तनावपूर्ण स्थिति का सामना करने के लिए वह सबसे ज्यादा आशाजनक कार्यवाही का चुनाव करता है और व्यवहार्यता बनाए रखता है, वहीं यदि ये क्रिया उपयोगी न लगे तो वह इस पद्धति को बदल लेता है। परिस्थितियों की आवश्यकता के अनुसार व्यक्ति नई जानकारियां जुटा कर, सामर्थ्य का विकास करके, वर्तमान योग्यताओं का सुधार करके, नए संसाधानों का प्रयोग करता है। उदाहरण के लिए प्रारम्भ की प्रतिक्रिया तब प्रकट होती है जब विद्यार्थी मुश्किल परीक्षा से पहले दोहराने की योजना बनाता है।
 
*2. प्रत्याहार या अलगाव की स्थिति में यदि किसी व्यक्ति ने भूतकाल में अत्याधिक कठिन परिस्थिति का सामना किया हो एवं उसने उसका सामना करने के लिए अनुचित कूटनीति अपनाई हो, तब वह प्रथम अवस्था में अपनी असफलता को स्वीकार कर लेता है। वह शारीरिक व मनोवैज्ञानिक स्तर पर उस तनावपूर्ण स्थिति को छोड़ देता है। वह अपने प्रयत्नों को पुनर्निर्देशित करके उचित लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाता है। प्रत्याहार के उदाहरण स्वरूप जब किसी दोस्त के बार-बार नकारने पर आप उससे सम्बन्ध-विच्छेद करके दूसरे लोगों से मित्रता करने के प्रयत्न करते हैं।
 
*3. समझौते की स्थिति में, यदि व्यक्ति को लगता है कि मूलभूत लक्ष्य की प्रप्ति नहीं हो सकती, तो ऐसे में वह विकल्प के तौर पर दूसरे लक्ष्य को स्वीकार कर लेता है। इस तरह की प्रतिक्रिया तब प्रकट होती है जब व्यक्ति अपनी योग्यताओं का पुनर्मूल्यांकन करता है और अपनी अभिलाषाओं के स्तर को उसी के अनुसार कम कर लेता है। ये तनावपूर्ण स्थितियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनाए गए समझौतापरक व्यवहार को दर्शाता है। उदाहरण स्वरूप एक विद्यार्थी किसी विशेष विषय में अच्छे अंक प्राप्त नहीं कर पाता परंतु वह अन्य विषयों में अच्छे अंकों को प्राप्त करता है और वह इस सत्य को स्वीकारने की कोशिश करता है।
 
 
* मनोरोग चिकित्सक द्वारा दवाएं बतायी गई हैं तो इनका सेवन अवश्य करना चाहिए।
 
* दूसरी बीमारियों की तरह यह रोग भी आंतरिक स्तर पर जैविक असंतुलन की वजह से होता है।
 
* निगरानी में दवाएं लेना कारगर होता है, अब तो नई दवाओं के उपलब्ध होने के बाद लंबी अवधि तक दवाएं लेने के मामले कम हो रहे हैं।
 
* दवाओं के सेवन से मनोविकारों में काफी कमी होती है, खासतौर से तब जबकि इलाज शुरूआती चरण में आरंभ हो जाए।
 
* मनोविकारों के उपचार में दी जाने वाली दवाएं रासायनिक असंतुलन को बहाल करती हैं, कुछ दवाओं से नींद आती है लेकिन वे नींद की गोलियां नहीं होतीं।
 
* अवसाद जैसे मनोविकार भी [[मधुमेह]] या [[उच्च रक्तचाप]] की तरह के रोग ही होते हैं और इनके लिए भी विषेशज्ञ की देखरेख में इलाज कराने की आवश्यकता होती है।
 
मात्र भी मानते हैं।
 
अज्ञानी लोग उपचार के लिए स्थानीय या नजदीक ओझा, पंडित, मुल्ला आदि के पास जाकर अनावश्यक भभूत, जड़ी-बूटी का सेवन करते हैं तथा अमानवीय ढ़ंग से सताये जाते हैं ताकि 'पिशाचात्मा' का प्रकोप दूर किया जा सके।
 
यह सब गलत है। सही धारणा यह है कि यह बीमारी है और वैज्ञानिक ढंग से चिकित्सा विज्ञान द्वारा इसका इलाज संभव है। ये भी '''सही नहीं है''' कि-
 
* मानसिक विकार कोई रोग नहीं हैं बल्कि बुरी आत्माओं की वजह से पैदा होते हैं।
 
* दवाओं के सेवन से बचना चाहिए।
 
* आपको यह रोग अपनी कमजोरी से हुआ है और इससे बचाव करना चाहिए।
 
* दवाएं नुकसानदायक होती हैं, ये निर्भरता बढ़ाती हैं और जीवनभर लेनी पड़ती हैं।
 
* ज्यादातर मनोविकारों का कोई इलाज नहीं होता।
 
* बच्चों को दवाएं नहीं दी जानी चाहिए।
 
* इलाज के लिए नींद की गोलियां दी जाती हैं।
 
* अवसाद जैसे मर्ज अपने आप ठीक होते हैं या प्रभावित व्यक्ति के प्रयासों से।
* देवी देवताओं या झाड़फूंक से रोग सही हो सकता है।