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खेल के बारे में आम धारणा यह है कि यह काम का [[विलोम]] है। खेल एक ऐसी स्थिति है जिसमें लोग कोई उपयोगी या विशिष्ट काम नहीं कर रहे होते हैं। खेल के बारे में एक सोच यह भी है कि यह आनन्ददायक, मुक्त और अनायास होता है। यह दृष्टिकोण छोटे बच्चे के विकास में खेल के महत्व को नकारता है। कई सालों से कई मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तकार बच्चे के विकास में खेल के महत्व पर जोर देने लगे हैं। इन्होंने खेल के अनेक पक्षों पर बल दिया है और बताया है कि खेल कैसे मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है।
 
यहाँ हम अनेक सिद्धान्तों की चर्चा करेंगे : मनोविश्लेषण, सामाजिक विकास का परिप्रेक्ष्य तथा रचनात्मक पद्धति।
===खेल का मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण===
एरिक्सन (Erikson) और अन्ना फ्रायड (Anna Freud) के अनुसार खेल अपूर्ण रह गयी इच्छाओं का स्थानापन्न और अतीत की घातक घटनाओं से मुक्ति और पुनर्जीवन का एक रास्ता है। मनोविश्लेषणात्मक पद्धति खेल के सामाजिक संवेगात्मक पक्षों पर बल देती है। खेल के द्वारा बच्चा माता-पिता के साथ अपने मानसिक द्वन्द्वों और विवेकहीन, भयों का समाधान करता है। एक बच्ची राक्षस-राक्षस खेल कर अंधेरे के भय पर काबू पाती है, एक बच्चा अपनी गुड़िया को किसी नियम के कल्पित उल्लंघन के लिये उसी तरह सजा देता है जैसे एक माता-पिता उसको सजा देते हैं। एरिक्सन की दृष्टि में प्रीस्कूल चरण के दौरान खेल एक बच्चे के लिये खोज, पहल और स्वतंत्रता का रास्ता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से खेल विरेचक अनुभव में माध्यम से आक्रामकता को दिशा देने का एक तरीका है। यह अतीत के लिये एक प्रतिक्रिया और अतीत की घटनाओं की ओर लौटने की प्रक्रिया का एक तन्त्र भी है।
 
===सामाजिक विकास का एक रूप : खेल===
पारटेल और अन्य सिद्धान्तकार खेल को सामाजिक आदान-प्रदान के एक रूप की तरह देखते हैं जो सहपाठियों के साथ सहयोगी कार्यां में संलग्न होने की बच्चे की विकसित होती हुई क्षमता को उत्तम भी बनाता है और प्रतिबिम्बित भी करता है। खेल के आरंभिक चरणों में सहपाठियों के साथ आदान-प्रदान लगभग नहीं या बहुत थोड़ा होता है और उस समय सामाजिक कौशलों के प्रयोग में असमर्थता भी दिखती है।आगे चलकर दूसरे के पक्ष से देखने की क्षमता, विभिन्न भूमिकाओं में समन्वय (जैसे एक माँ, एक बच्चा), खेल की विषयवस्तु के बारे में बातचीत और झगड़ों को सुलझाने की सामर्थ्य का विकास होता हुआ दिखाई देता है। खेल में कल्पित और नाटकीय स्थितियां सामान्यतः सामाजिक आदान-प्रदान की अधिक परिपक्व विधियाँ मानी जाती हैं। कुछ शोधकर्ताओं ने धक्का-मुक्की वाले खेलों को भी सामाजिक दृष्टिकोण से देखा है। धक्का-मुक्की के अन्तर्गत सब तरह के कुश्ती और ‘पकड़ो तो जाने‘ कोटि के खेल शामिल किये जा सकते हैं। सामाजिक खेलों की तरह धक्का-मुक्की के खेलों में भी भूमिकाएं होती हैं।
 
===संरचनावादी सिद्धान्त और खेल===
[[ज़ाँ प्याज़े|पियाजे]] (Jean Piaget) के अनुसार बच्चे की विकसित होती हुई मानसिक क्षमताओं में खेल एक बड़ी भूमिका निभाता है। पियाजे खेल के विकास के कई चरण गिनाते हैं।
 
'''पहला चरण''', जिसे वे अभ्यास या कार्यात्मक खेल कहते हैं, संवेदन-प्रेरित क्रिया के दौर का एक लक्षण है। कार्यात्मक खेल में बच्चा वस्तुओं के इस्तेमाल की परिचित पद्धतियों को दोहराता है। उदाहरण के लिए, खाली प्याले से पीता है, हाथों के इस्तेमाल से बालों में कंघी करने का नाटक करता है।
 
'''दूसरा चरण''', प्रतीकात्मक खेल है जिसका उभार क्रियापूर्व/परिचालनपूर्व ( pre-operational) दौर में होता है। यह मानसिक प्रतीकों के इस्तेमाल का दौर है। वस्तुएँ अपने से अलग किसी वस्तु का प्रतीक होती हैं। प्रतीकात्मक खेल में एक लकड़ी के गुटके (ब्लाक) को टेलीफोन, नाव, कुŸा, केला या हवाईजहाज बनाया जा सकता है। पियाजे ने संरचनात्मक और नाटकीय खेल में अन्तर किया है। संरचनात्मक खेल में दूसरी वस्तुओं को बनाने या रचने के लिए ठोस वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए कार और टंक वाले खिलौने के लिए, एक शहर बनाने में लकड़ी के ब्लॉकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। नाटकीय खेल में बच्चे शब्दों और मुद्राओं के द्वारा कल्पित स्थितियाँ और भूमिकाएं गढ़ते हैं। वे भूमिकाएं रचते और तय करते हैं कि कौन सा बच्चा किस भूमिका को निभाएगा और एक कल्पित दृश्य के लिए विषयवस्तु और उसके विकास की दिशा की सूझ लेते हैं । नाटकीय खेल का उभार प्रायः संरचनात्मक खेल के कुछ बाहर सतह पर आता है। पियाजे ने इस दौर के कल्पित स्वभाव के खेल को बच्चे के आत्म केन्द्रित विचार के प्रतिबिम्ब के रूप में देखा। पियाजे के अनुसार सात वर्ष की आयु के आसपास '''ठोस-क्रियात्मक दौर''' ( concrete operational period ) के आरंभ में यह समाप्त हो जाता है।
 
'''अन्तिम चरण''' में खेल नियमबद्ध क्रीड़ा (अंग्रेजी में play) को game में बदलने की बात कही गयी है। यहाँ हिंदी में ‘खेल‘ और ‘क्रीड़ा‘ में वही भेद किया जा रहा है। क्रीड़ा नियमबद्ध एवं संरचित खेल (structured play ) हैं, में बदल जाता है जो ठोस क्रियात्मक दौर में अपनी बुलन्दी पर पहुँचता है। इस दौर की विशेषता यह है कि सामाजिक आदान-प्रदान को आरंभ करने, नियंत्रित करने और जारी रखने तथा समाप्त करने के लिए बाह्य रूप से प्रत्यक्ष नियमों का प्रयोग किया जाता है।
 
अनेक समकालीन शोधकर्ताओं ने पियाजे की धारणाओं को विस्तार दिया है। स्मालेनस्की और शेफात्या ने इस बात की पुष्टि की है कि खेल के विकास का सीधा सहसंबंध भाषा के विकास, समस्या-समाधान और तर्कसंगत गणितीय चिन्तन के विकास के साथ जुड़ता है। किन्तु स्मालेनस्की और शेफात्या पियाजे की इस अवधारणा से सहमत नहीं हैं। खेल संवेदनप्रेरित क्रिया के चरण से लेकर पूर्वक्रियात्मक और ठोस क्रियात्मक चरण की ओर सहज प्रगति ( progression ) का परिणाम है। उनका विचार है कि खेल का विकास सामाजिक संदर्भ और बड़ों के पथप्रदर्शन पर निर्भर है। उनका यह विचार भी है कि कुछ बच्चों के लिए खेलों का प्रशिक्षण अनिवार्य है। इन्होंने अपने शोध से साबित किया है कि बच्चों के खेल के स्तर को वयस्क सफलतापूर्वक बढ़ा सकते हैं। खेल के बढ़े हुए स्तर का सकारात्मक प्रभाव बच्चे के अन्य संज्ञानात्मक कौशलों पर भी होता है।
 
====वाइगोत्स्कीय परिप्रेक्ष्य (Vygotskian Perspective) में खेल का स्थान====
वाइगोत्स्की (Lev Vygotsky) का विश्वास था कि खेल संज्ञानात्मक, भावात्मक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देता है। ऊपर चर्चित अन्य सिद्धान्तकारों के विपरीत विकास में खेल के महत्व के बारे में वाइगोत्स्की का दृष्टिकोण अधिक समन्वयकारी था।
 
वाइगोत्स्की के लिए खेल बच्चों को अपने व्यवहार पर नियंत्रण की क्षमता देने वाला मानसिक उपकरण है। खेल में जो कल्पित स्थितियाँ खड़ी की जाती हैं, वे बच्चे के व्यवहार को एक खास तरह से नियंत्रित करने वाली और दिशा देने वाली प्रथम बाधाएँ हैं। खेल व्यवहार को संगठित करता है। उदाहरण के लिए खेल में बच्चा स्वच्छन्द व्यवहार नहीं करता, ‘‘मम्मी-मम्मी’ या ‘ड्राइवर-ड्राइवर' के खेल में वह माँ या ट्रक-ड्राइवर होने का बहाना करता है।
 
हर कल्पित स्थिति में भूमिकाएं और नियम निश्चित नियम होते हैं जो स्वाभाविक रूप से सतह पर आ जाते हैं। भूमिकाएं चरित्रों की होती हैं जिनको बच्चे खेलते हैं जैसे समुद्री डाकू की या शिक्षक की भूमिका। कल्पित स्थिति की विषयवस्तु बदलने के साथ भूमिकाएं और नियम भी बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए ‘किराने की दुकान’ का, खेल के नियम, ‘शेर-शेर’ खेलते बच्चों की भूमिकाओं और खेल के नियमों से भिन्न होंगे। खेल के नियम आरंभ में खेल के भीतर प्रच्छन्न होते हैं, आगे चल कर वे सतह पर आ जाते हैं और बच्चों के बीच तय किये जाते हैं।
 
अतः खेल, में एक प्रत्यक्ष कल्पित स्थिति और कुछ प्रच्छन्न नियम शामिल होते हैं। कल्पित स्थिति बच्चों द्वारा रचित वह स्थिति है जिसके सच होने का बहाना किया जाता है। कल्पित होते हुए भी दूसरों के लिए प्रत्यक्ष हो जाती है क्योंकि बच्चे उसके लक्षण प्रकट कर देते हैं। वे कहते हैं, ‘मान लो कि यहां एक कुर्सी और वहां एक मेज़ है। मान लो कि हमारी कक्षा में छः बच्चे हैं और हम शिक्षक हैं।’ इशारों और आवाजों से भी वे अपने खेल की कल्पित स्थिति को प्रकट किया करते हैं। जैसे पेटोंल-पम्प-स्टेशन से निकलते हुए एक टंक को प्रकट करने के लिए ‘‘घुर्रर्रर्र घुर्रर्रर्र’’ की आवाज़ या एक कल्पित घोड़े की लगाम खींचते हुए बच्चे का "चींहिंहिंहिं का शोर।" लेकिन नियम प्रच्छन्न माने जाते हैं क्योंकि उनको आसानी से देखा नहीं जा सकता, व्यवहार के द्वारा केवल उनका अनुमान लगाया जा सकता है। नियम किसी विशेष भूमिका के साथ जुड़े हुए व्यवहार के नमूने के रूप में अभिव्यक्त होते हैं खेल की कल्पित स्थिति में हर भूमिका बच्चे के व्यवहार पर अपने नियम लागू कर देती है। पश्चिमी परिप्रेक्ष्य से देखें तो खेल के विषय में यह विचार असाधारण हैं क्योंकि परंपरागत रूप से हम खेल को सर्वथा स्वच्छन्द और निर्बाध समझते आए हैं।
 
लेकिन वाइगोत्स्की का कहना है कि खेल में बच्चे केवल मनमाना व्यवहार नहीं करते। ‘मम्मी-मम्मी के खेल में और ‘टीचर-टीचर’ के खेल में बच्चे अन्तर करते हैं। हर भूमिका के अनुसार भिन्न मुद्राएं, भिन्न वेषभूषा, यहां तक कि भाषा भी भिन्न होती है। खेल के आरंभिक चरणों में वे इन अन्तरों से अवगत नहीं होते, लेकिन चार वर्ष की उम्र के अधिकांश बच्चे दिखा देते हैं कि वे किसी भूमिका के निर्वाह में होने वाली ग़लतियों के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होते हैं और अक्सर एक दूसरे को सुधारते भी हैं, मम्मी ब्रीफकेस लेकर चलती हैं, ’‘तुम टीचर हो तो बच्चों को बैठना पड़ेगा,’’ ‘‘टीचर किताब को ऐसे पढ़ती हैं’’ इत्यादि। बच्चे मज़ाक की तरह भूमिका के नियमों का उल्लंघन भी करते हैं। तीन वर्ष का टोबी ऊंची कुर्सी पर चढ़कर कहता है, ‘‘अब मैं डैडी हूं।’’ फिर वह ठहाका लगा कर हंसता और कहता है, "डैडी अब अपनी ऊँची कुर्सी पर बैठ नहीं सकते।"
 
[[श्रेणी:शिक्षा]]