"काव्यमीमांसा": अवतरणों में अंतर

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'''काव्यमीमांसा''' कविराज [[राजशेखर]] (८८०-९२० ई.) कृत [[काव्यशास्त्र]] संबंधी मानक ग्रंथ है। 'काव्यमीमांसा' का अभी तक केवल प्रथम अधिकरण 'कविरहस्य' ही प्राप्त है और इसके भी मात्र १८ अध्याय ही मिलते हैं। १९वाँ अध्याय 'भुवनकोश' अप्राप्त है। किंतु 'कविरहस्य' अधिकरण के प्रथम तीन अध्यायों से पता चलता है कि कृतिकार ने काव्यमीमांसा में १९ अधिकरणों का समायोजन किया था और प्रत्येक अधिकरण में विषयानुरूप कई-कई अध्याय थे।
 
उपलब्ध 'कविरहस्य' शीर्षक अधिकरण में मुख्यत: [[कवि]] शिक्षा संबंधी सामग्री है, यद्यपि लेखक ने ''"गुणवदलङकृतञ्चगुणवदलङकृतंच काव्यम"'' (अध्याय ६, पंक्ति २६) सूत्र के माध्यम से काव्य की परिभाषा भी प्रस्तुत की है तथापि इसका सविस्तार विवेचन नहीं किया है। हो सकता है, अगले अधिकरणों में कहीं उक्त विवेचन किया गया हो जो अब अप्राप्त हैं। 'कविरहस्य' अधिकरण के प्रथम अध्याय में राजशेखर ने काव्यशास्त्र के मूल स्रोत पर प्रकाश डालने के अतिरिक्त इसके अंतर्गत परिगणित होनेवाले विषयों की लंबी सूची भी दी है। दूसरे अध्याय में वैदिक वाङ्मयवांमय और उत्तरवदिक साहित्य के सन्दर्भ में [[काव्यशास्त्र]] का स्थान निश्चित करने के उपरांत, इसको सातवाँ वेदांग ([[वेदांग]] छह हैं) तथा १५वीं [[विद्या]] (विद्याएँ १४ हैं) कहा गया है। तीसरे अध्याय में [[ब्रह्मा]] एवं [[सरस्वती]] से काव्यपुरुष की उत्पत्ति, [[वाल्मीकि]] एवं [[व्यास]] से उसका संबंध, काव्यपुरुष का साहित्यविद्या से विवाह, पति पत्नी का भारत भर में भ्रमण और उनसे विभिन्न स्थानों पर वृत्तियों, प्रवृत्तियों तथा रीतियों का जन्म तथा अंत में काव्यपुरुष एवं साहित्यविद्या द्वारा कविमानस में स्थायी निवास का संकल्प वर्णित है। चौथे से नवें अध्याय तक पदवाक्यविवेक, काव्यपाककल्प, पाठप्रतिष्ठा, काव्यार्थयोनियाँ तथा अर्थव्याप्ति इत्यादि विषयों पर विचार किया गया है। १०वें अध्याय में कविचर्या तथा राजचर्या का सम्यक् उल्लेख है। ११वें से १८वें अध्याय तक शब्दहरण, काव्यहरण, कविसमय, भारत तथा संसार के भूगोल, घटनाओं, स्थानों एवं व्यक्तियों के वर्णन की प्राचीन पद्धतियों, कालगणना तथा ऋतुपरिवर्तनों का परिचय है।
 
काव्यमीमांसा में प्रत्यक्षकवि (समसामयिक कवि) के बारे में कहा है-