"समूह (गणितशास्त्र)": अवतरणों में अंतर

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समूह [[समरूपता|समरूपता]] की धारणा के साथ एक गहरी रिश्तेदारी साझा करते हैं। उदाहरण के लिए, एक [[समरूपता समूह]] एक ज्यामितीय ऑब्जेक्ट की समरूपता विशेषताओं को सांकेतिक शब्दों में बदलता है: यहां समूह उन परिवर्तनों का समूह हैं जो वस्तु को अपरिवर्तित छोड़ देते हैं और यहां इस तरह के दो परिवर्तनों को एक के बाद एक प्रदर्शन करना द्विचर संक्रिया हैं।
 
समूह की अवधारणा 18वीं शताब्दी में [[एवारिस्ट गेलोआ]] (Évariste Galois) के [[बहुपद समीकरण|बहुपद समीकरणों]] के अध्ययन से उठी। [[संख्या सिद्धांत|संख्या सिद्धान्त]] और [[ज्यामिति|ज्यामिति]] जैसे अन्य क्षेत्रों से योगदान के बाद, समूह धारणा को सामान्यीकृत और दृढ़तापूर्वक 1870 के आसपास स्थापित किया गया था। आधुनिक समूह सिद्धांत- एक सक्रिय गणितीय अनुशासन - समूहों के स्वतंत्र रूप से अध्ययन पर समर्पित हैहै।
 
{{समूह सिद्धांत}}
*सभी पूर्णांकों a, b और c के लिए, (a + b) + c = a + (b + c)। शब्दों में अभिव्यक्त करते हुए, पहले a और b को जोड़कर, और उसके परिणाम को c से जोड़कर जो अंतिम परिणाम आता है वही परिणाम a को b और c के जोड़ से जोड़ने पर आता है। इस विशेषता को ''[[साहचर्यता]]'' कहा जाता है।
*यदि a एक पूर्णांक है, तो 0 + a = a + 0 = a। शून्य को जोड़ का ''[[इकाई अवयव]]'' कहा जाता है, क्योंकि किसी भी पूर्णांक को शुन्य से जोड़ा जाये तो वही पूर्णांक प्राप्त होता है।
*प्रत्येक पूर्णांक a के लिए, एक पूर्णांक b है, जिससे कि a + b = b + a = 0। पूर्णांक b को पूर्णांक a का ''[[व्युत्क्रम अवयव]]'' कहा जाता है और इसको -a से दर्शाया जाता हैहै।
 
पूर्णांक, ऑपरेशन + के साथ, समान संरचनात्मक पहलुओं को साझा करने वाले एक व्यापक वर्ग से संबंधित वस्तु बनाते है। सामूहिक रूप से इन संरचनाओं को उचित रूप से समझने के लिए, निम्नलिखित सार [[परिभाषा|परिभाषा]] विकसित की गई है।