"सातवाहन" के अवतरणों में अंतर

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{{स्रोतहीन|date=सितंबर 2014}}
{{Infobox Former Country
{| border=1 align=right cellpadding=4 cellspacing=0 width=250 style="margin: 0 0 1em 1em; background: #f9f9f9; border: 1px #aaa solid; border-collapse: collapse; font-size: 95%;" |+<big>''' सातवाहन साम्राज्य '''</big> |- | align=center colspan=2 |[[चित्र:SatavahanaMap.jpg|250px]]<br /><small>सातवाहन साम्राज्य का विस्तार (सतत रेखा) और विजित प्रदेश (टूटी रेखा).</small><br /> |- | '''[[आधिकारिक भाषा]]s''' || [[महाराष्ट्री]] <br />[[संस्कृत]]<br />[[तेलगू भाषा|तेलगू]] |- | '''[[राजधानियां]]''' || [[पैठान]], [[जुन्नार]] और [[धरनीकोटा]]/ [[अमरावती] (गुंटूर के निकट) |- | '''[[सरकार]]''' || [[राजशाही]] |- | '''पूर्ववर्ती''' || [[मौर्य साम्राज्य]] |- | '''परवर्ती''' || [[इक्ष्वांकु]], [[कदम्ब]], [[पश्चिमी क्षत्रप]] |- |}
|conventional_long_name = सातवाहन साम्राज्य
|common_name = सातवाहन साम्राज्य
|continent = एशिया
|region = दक्षिण एशिया
|era = [[प्राचीन इतिहास|पुरातन]]
|government_type = राजतंत्र
|leader1 = सीमुक (प्रथम)
|year_leader1 = 100-70 ईसा पूर्व
|leader2 = विजय (अन्तिम)
|year_leader2 = दुसरी शताब्दी ईसवी
|year_start = 1ली शताब्दी ईसा पूर्व
|year_end = 2री शताब्दी ईसवी
|p1 = मौर्य साम्राज्य
|p2 = कानव राजवंश
|s1 = पश्चिमी क्षत्रप
|s3 = आन्ध्रा इक्ष्वांकु
|s4 = चुटू राजवंश
|s5 = पल्लव राजवंश
|image_map = Satvahana.svg
|image_map_alt = Satavahana
|image_map_caption= Approximate extent of the Satavahana empire under [[Gautamiputra Satkarni]]
|capital = [[प्रतिस्ठान]], [[अमरावती (राजधानी)|अमरावती]]
|common_languages = [[प्राकृत]], [[तेलगू भाषा|तेलगू]], [[तमिल भाषा|तमिल]], [[संस्कृत]]<ref>{{Citation|last=Nagaswamy|first=N|title=Roman Karur|publisher=Brahad Prakashan|year=1995|oclc=191007985|url=http://www.tamilartsacademy.com/books/roman%20karur/chapter04.html|deadurl=yes|archiveurl=https://web.archive.org/web/20110720024602/http://www.tamilartsacademy.com/books/roman%20karur/chapter04.html|archivedate=20 July 2011|df=dmy-all}}</ref><ref>{{Harvnb|Mahadevan|2003|pp=199–205}}</ref><ref>{{Citation|last=Panneerselvam|first=R|year=1969|title=Further light on the bilingual coin of the Sātavāhanas|journal=Indo-Iranian Journal|volume=4|issue=11|pages=281–288|doi=10.1163/000000069790078428}}</ref><ref>{{Citation|last=Yandel|first=Keith|title=Religion and Public Culture: Encounters and Identities in Modern South India |publisher=Routledge Curzon |year=2000 |page=235,&nbsp;253 |isbn=0-7007-1101-5}}</ref>{{sfn|Carla M. Sinopoli|2001|p=163}}<!-- Do not add other languages here without discussing them in the article first, along with reliable sources -->
|religion = [[हिन्दू धर्म|हिन्दू]], [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]]
|title_leader = [[सम्राट]]
|today = {{flag|India}}
}}
 
'''सातवाहन''' प्राचीन [[प्राचीन भारत]] का एक राजवंश था। इसने ईसापूर्व २३० से लेकर तीसरीदूसरी सदी (ईसा के बाद) तक केन्द्रीय [[दक्षिण भारत]] पर राज किया। यह [[मौर्य वंश]] के पतन के बाद शक्तिशाली हुआ था। इनका उल्लेख ८वीं सदी ईसापूर्व में मिलता है परहै। [[सम्राट अशोक|अशोक]] की मृत्यु (सन् २३२ ईसापूर्व) के बाद सातवाहनों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।
 
== परिचय ==
 
== गौतमी पुत्रा श्री शातकर्णी (70ई0-95ई0)==
लगभग आधी शताब्दी की उठापटक तथा शक शासकों के हाथों मानमर्दन के बाद गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी के नेतृत्व में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित कर लिया। गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी सातवाहन वंश का सबसे महान शासक था जिसने लगभग 25 वर्षों तक शासन करते हुए न केवल अपने साम्राज्य की खोई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित किया अपितु एक विशाल साम्राज्य की भी स्थापना की। गौतमी पुत्र के समय तथा उसकी विजयों के बारें में हमें उसकी माता गौतमी बालश्री के नासिक शिलालेखों से सम्पूर्ण जानकारी मिलती है। उसके सन्दर्भ में हमें इस लेख से यह जानकारी मिलती है कि उसने क्षत्रियों के अहंकार का मान-मर्दन किया। उसका वर्णन शक, यवन तथा पहलाव शससकों के विनाश कर्ता के रूप में हुआ है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्षहरात वंश के शक शासक नहपान तथा उसके वंशजों की उसके हाथों हुई पराजय थी। जोगलथम्बी (नासिक) समुह से प्राप्त नहपान के चान्दी के सिक्कें जिन्हे कि गौतमी पुत्र शातकर्णी ने दुबारा ढ़लवाया तथा अपने शासन काल के अठारहवें वर्ष में गौतमी पुत्र द्वारा नासिक के निकट पांडु-लेण में गुहादान करना- ये कुछ ऐसे तथ्य है जों यह प्रमाणित करतें है कि उसने शक शासकों द्वारा छीने गए प्रदेशों को पुर्नविजित कर लिया। नहपान के साथ उनका युद्ध उसके शासन काल के 17वें और 18वें वर्ष में हुआ तथा इस युद्ध में जीत कर र्गातमी पुत्र ने अपरान्त, अनूप, सौराष्ट्र, कुकर, अकर तथा अवन्ति को नहपान से छीन लिया। इन क्षेत्रों के अतिरिक्त गौतमी पुत्र का ऋशिक (कृष्णा नदी के तट पर स्थित ऋशिक नगर), अयमक (प्राचीन हैदराबाद राज्य का हिस्सा), मूलक (गोदावरी के निकट एक प्रदेश जिसकी राजधानी प्रतिष्ठान थी) तथा विदर्भ (आधुनिक बरार क्षेत्र) आदि प्रदेशों पर भी अधिपत्य था। उसके प्रत्यक्ष प्रभाव में रहने वाला क्षेत्र उत्तर में [[मालवा]] तथा [[काठियावाड़]] से लेकर दक्षिण में [[कृष्णा नदी]] तक तथा पूवै में बरार से लेकर पश्चिम में कोंकण तक फैला हुआ था। उसने 'त्रि-समुंद्र-तोय-पीत-वाहन' उपाधि धारण की जिससे यह पता चलता है कि उसका प्रभाव पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी सागर अर्थात बंगाल की खाड़ी, अरब सागर एवं हिन्द महासागर तक था। ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी मृत्यु के कुछ समय पहले गौतमी पुत्र शातकर्णी द्वारा नहपान को हराकर जीते गए क्षेत्र उसके हाथ से निकल गए। गौतमी पुत्र से इन प्रदेशों को छीनने वाले संभवतः सीथियन जाति के ही करदामक वंश के शक शासक थे। इसका प्रमाण हमें टलमी द्वारा भूगोल का वर्णन करती उसकी पुस्तक से मिलता है। ऐसा ही निष्कर्ष 150 ई0 के प्रसिद्ध रूद्रदमन के जूनागढ़ के शिलालेख से भी निकाला जा सकता है। यह शिलालेख दर्शाता है कि नहपान से विजित गौतमीपुत्र शातकर्णी के सभी प्रदेशों को उससे [[रूद्रदमन]] ने हथिया लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि गौतमीपुत्र शातकर्णी ने करदामक शकों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर रूद्रदमन द्वारा हथियाए गए अपने क्षेत्रों को सुरक्षित करने का प्रयास किया।
लगभग आधी शताब्दी की उठापटक तथा शक शासकों के हाथों मानमर्दन के बाद गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी के नेतृत्व में अपनी
खोई हुई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित कर लिया। गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी सातवाहन वंश का सबसे महान शासक था जिसने लगभग
25 वर्षों तक शासन करते हुए न केवल अपने साम्राज्य की खोई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित किया अपितु एक विशाल साम्राज्य की भी
स्थापना की। गौतमी पुत्र के समय तथा उसकी विजयों के बारें में हमें उसकी माता गौतमी बालश्री के नासिक शिलालेखों से सम्पूर्ण
जानकारी मिलती है। उसके सन्दर्भ में हमें इस लेख से यह जानकारी मिलती है कि उसने क्षत्रियों के अहंकार का मान-मर्दन किया।
उसका वर्णन शक, यवन तथा पहलाव शससकों के विनाश कर्ता के रूप में हुआ है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्षहरात वंश के
शक शासक नहपान तथा उसके वंशजों की उसके हाथों हुई पराजय थी। जोगलथम्बी (नासिक) समुह से प्राप्त नहपान के चान्दी
के सिक्कें जिन्हे कि गौतमी पुत्र शातकर्णी ने दुबारा ढ़लवाया तथा अपने शासन काल के अठारहवें वर्ष में गौतमी पुत्र द्वारा नासिक
के निकट पांडु-लेण में गुहादान करना- ये कुछ ऐसे तथ्य है जों यह प्रमाणित करतें है कि उसने शक शासकों द्वारा छीने गए प्रदेशों
को पुर्नविजित कर लिया। नहपान के साथ उनका युद्ध उसके शासन काल के 17वें और 18वें वर्ष में हुआ तथा इस युद्ध में जीत
कर र्गातमी पुत्र ने अपरान्त, अनूप, सौराष्ट्र, कुकर, अकर तथा अवन्ति को नहपान से छीन लिया। इन क्षेत्रों के अतिरिक्त गौतमी
पुत्र का ऋशिक (कृष्णा नदी के तट पर स्थित ऋशिक नगर), अयमक (प्राचीन हैदराबाद राज्य का हिस्सा), मूलक (गोदावरी के निकट
एक प्रदेश जिसकी राजधानी प्रतिष्ठान थी) तथा विदर्भ (आधुनिक बरार क्षेत्र) आदि प्रदेशों पर भी अधिपत्य था। उसके प्रत्यक्ष प्रभाव
में रहने वाला क्षेत्र उत्तर में [[मालवा]] तथा [[काठियावाड़]] से लेकर दक्षिण में [[कृष्णा नदी]] तक तथा पूवै में बरार से लेकर पश्चिम में कोंकण
तक फैला हुआ था। उसने 'त्रि-समुंद्र-तोय-पीत-वाहन' उपाधि धारण की जिससे यह पता चलता है कि उसका प्रभाव पूर्वी,
पश्चिमी तथा दक्षिणी सागर अर्थात बंगाल की खाड़ी, अरब सागर एवं हिन्द महासागर तक था।
ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी मृत्यु के कुछ समय पहले गौतमी पुत्र शातकर्णी द्वारा नहपान को हराकर जीते गए क्षेत्र उसके हाथ
से निकल गए। गौतमी पुत्र से इन प्रदेशों को छीनने वाले संभवतः सीथियन जाति के ही करदामक वंश के शक शासक थे। इसका
प्रमाण हमें टलमी द्वारा भूगोल का वर्णन करती उसकी पुस्तक से मिलता है। ऐसा ही निष्कर्ष 150 ई0 के प्रसिद्ध रूद्रदमन के जूनागढ़
के शिलालेख से भी निकाला जा सकता है। यह शिलालेख दर्शाता है कि नहपान से विजित गौतमीपुत्र शातकर्णी के सभी प्रदेशों
को उससे [[रूद्रदमन]] ने हथिया लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि गौतमीपुत्र शातकर्णी ने करदामक शकों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित
कर रूद्रदमन द्वारा हथियाए गए अपने क्षेत्रों को सुरक्षित करने का प्रयास किया।
 
==सन्दर्भ==
{{भारतीय इतिहास}}
{{Reflist}}
 
[[श्रेणी:दक्षिण भारत का इतिहास]]