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| isbn = 9788187780045
| page = २१६
}}</ref> वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर [[उत्तर भारत]] का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। [[हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत]] का [[बनारस घराना]] वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है। भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें [[कबीर]], [[वल्लभाचार्य]], [[रविदास]], स्वामी [[रामानंद]], [[त्रैलंग स्वामी]], [[शिवानन्द गोस्वामी]], [[मुंशी प्रेमचंद]], [[जयशंकर प्रसाद]], [[आचार्य रामचंद्र शुक्ल]], पंडित [[रवि शंकर]], [[गिरिजा देवी]], पंडित [[हरि प्रसाद चौरसिया]],[[अश्वनी कुमार सिंह ]] एवं [[उस्ताद बिस्मिल्लाह खां]] आदि कुछ हैं। [[गोस्वामी तुलसीदास]] ने [[हिन्दू धर्म]] का परम-पूज्य [[ग्रंथ]] [[रामचरितमानस]] यहीं लिखा था और [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही [[सारनाथ]] में दिया था।<ref>{{cite web | url=http://varanasi.nic.in/tourist/tourist7.html | title=वाराणसी के जिले - सारनाथ| publisher=राष्ट्रीय सूचना केन्द्र - वाराणसी| accessdate=५ जनवरी २००९}}</ref>
 
वाराणसी में चार बड़े विश्वविद्यालय स्थित हैं: [[बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय]], [[महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ]], [[सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज़]] और [[संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय]]। यहां के निवासी मुख्यतः काशिका [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] बोलते हैं, जो [[हिन्दी]] की ही एक बोली है। वाराणसी को प्रायः 'मंदिरों का शहर', 'भारत की धार्मिक राजधानी', 'भगवान शिव की नगरी', 'दीपों का शहर', 'ज्ञान नगरी' आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है।<ref>{{cite web |url=http://www.bhu.ac.in/varanasi.htm |title=वाराणसी: द इटर्नल सिटी|publisher=[[बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय]] |accessdate=२ अप्रैल २००७}}</ref>