"आमेर दुर्ग" के अवतरणों में अंतर

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== नाम व्युत्पत्ति ==
आंबेर या आमेर को यह नाम यहां निकटस्थ ''चील के टीले'' नामक पहाड़ी पर स्थित अम्बिकेश्वर मन्दिर से मिला। अम्बिकेश्वर नाम भगवान [[शिव]] के उस रूप का है जो इस मन्दिर में स्थित हैं, अर्थात [[अम्बिका]] के ईश्वर। यहां के कुछ स्थानीय लोगों एवं किंवदन्तियों के अनुसार दुर्ग को यह नाम माता [[दुर्गा]] के पर्यायवाची [[अम्बा]] से मिला है।<ref>ट्रूडी रिंग, नोवेल वॉटसन, पाउल शेलिन्जर (२०१२)।''[Asia and Oceania: International Dictionary of Historic Places]''. {{ISBN|1-136-63979-9}}. पृष्ठ २४.</ref> इसके अलावा इसे अम्बावती, अमरपुरा, अम्बर, आम्रदाद्री एवं अमरगढ़ नाम से भी जाना जाता रहा है। इतिहासकार [[जेम्स टॉड|कर्नल जेम्स टॉड]] के अनुसार यहां के राजपूत स्वयं को अयोध्यापति राजा [[रामचन्द्र]] के पुत्र [[कुश]] के वंशज मानते हैं, जिससे उन्हें कुशवाहा नाम मिला जो कालांतर में [[कछवाहा]] हो गया। <ref name="भारत">{{cite web |url= http://www.allsubjectjournal.com/download/3137/4-6-54-466.pdf
|title= आमेर रियासत की भौगोलिक एवं सामरिक स्थिति
|accessmonthday= |accessdate= ०६ फ़रवरी २०१८ |accessmonthday= |accessdaymonth = |accessyear=
|author= |last= आर्य |first= भारत|authorlink= |coauthors=
|date= मार्च २०१७|year= |month= |format= |work=
|publisher= ''इंटरनेश्नल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एण्ड डवलपमेण्ट''|pages= २७३-२७५|language= |archiveurl= |archivedate= |quote= }} </ref> आमेर स्थित संघी जूथाराम मन्दिर से मिले मिर्जा राजा जयसिंह काल के [[विक्रम संवत|वि॰सं॰]] १७१४ तदनुसार १६५७ ई॰ के शिलालेख के अनुसार इसे अम्बावती नाम से '''[[ढूंढाड़]] '''क्षेत्र की राजधानी बताया गया है। यह शिलालेख राजस्थान सरकार के पुरातत्त्व एवं इतिहास विभाग के संग्रहालय में सुरक्षित है।
 
यहाँ कि अधिकांश लोगों की मान्यता अनुसार इसका तार्किक अर्थ [[अयोध्या]] के [[इक्ष्वाकु वंश]] के राजा विष्णुभक्त भक्त [[अम्बरीष]] के नाम से जोड़ते हैं। इसके अनुसार अम्बरीश ने दीन-दुखियों की सहायता हेतु अपने राज्य के भण्डार खोल रखे थे। इससे राज्य में सब तरफ़ सुख और शांति तो थी परन्तु राज्य के भण्डार दिन पर दिन खाली होते गए। उनके पिता राजा [[नाभाग]] के पूछने पर अम्बरीश ने उत्तर दिया कि ये गोदाम भगवान के भक्तों के है और उनके लिए सदैव खुले रहने चाहिए। तब अम्बरीश को राज्य के हितों के विरुद्ध कार्य के आरोप लगाकर दोषी घोषित किया गया, किन्तु जब गोदामों में आई माल की कमी का ब्यौरा लिया जाने लगा तो कर्मचारी यह देखकर विस्मित रह गए कि जो गोदाम खाली पड़े थे, वे रात रात में पुनः कैसे भर गये। अम्बरीश ने इसे ईश्वर की कृपा बताया जो उनकी भक्ति के फलस्वरूप हुआ था। इस पर उनके पिता राजा नतमस्तक हो गये। तब ईश्वर की कृपा के लिये धन्यवादस्वरूप अम्बरीश ने अपनी भक्ति और आराधना के लिए अरावली पहाड़ी पर इस स्थान को चुना। उन्हीं के नाम से कालांतर में अपभ्रंश होता हुआ अम्बरीश से "आम्बेर" बन गया।<ref name="अभिव्यक्ति">{{cite web |url=http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/amber/amber1.htm
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