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==संरक्षण==
राजस्थान के छः दुर्ग, आमेर, [[चित्तौड़गढ़ दुर्ग|चित्तौड़ दुर्ग]], [[गागरौन दुर्ग]], [[जैसलमेर दुर्ग]], [[कुम्भलगढ़ दुर्ग]] एवं [[रणथम्भोर दुर्ग]] को यूनेस्को विश्वदाय समिति ने फ्नोम पेन में जून २०१३ में आयोजित ३७वें सत्र की बैठक में [[यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल]] सूची में सम्मिलित किया था। इन्हें सांस्कृतिक विरासत की श्रेणी आंका गया एवं राजपूत पर्वतीय वास्तुकला में श्रेणीगत किया गया। <ref>{{cite news|title=दुर्गों की विरासत स्थिति [Heritage Status for Forts]|url=http://www.highbeam.com/doc/1P3-3028072831.html|accessdate=५ जुलाई २०१५|date= २८ जून २०१३|publisher= ईस्टर्न आई|via=हाई बीम |language = अंग्रेज़ी|subscription=yes}}</ref><ref>{{cite news|title=संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिष्ठित विरासत दुर्ग स्थल [Iconic Hill Forts on UN Heritage List]|url=http://www.highbeam.com/doc/1G1-334781049.html|accessdate= ५ जुलाई २०१५|date= २२ जून २०१३|publisher=मेल टुडे|location= नई दिल्ली, भारत |via=हाइ बीम|subscription=yes| language= अंग्रेज़ी}}</ref>
 
आमेर का कस्बा इस दुर्ग एवं महल का अभिन्न एवं अपरिहार्य अंग है तथा इसका प्रवेशद्वार भी है। यह कस्बा अब एक धरोहर स्थल बन गया है तथा इसकी अर्थ-व्यवस्था अधिकांश रूप से यहाँ आने वाले बड़ी संख्या के पर्यटकों (लगभग ४००० से ५००० प्रतिदिन, सर्वोच्च पर्यटक काल में) पर निर्भर रहती है। यह कस्बा ४ वर्ग कि॰मी॰ (४,३०,००,००० वर्ग फ़ीट) के क्षेत्रफ़ल में फ़ैला हुआ है और यहाँ १८ मन्दिर, ३ जैन मन्दिर एवं २ मस्जिदें हैं। इसको विश्व स्मारक निधि (वर्ल्ड मॉन्युमेण्ट फ़ण्ड) द्वारा विश्व के १०० लुप्तप्राय स्थलों में गिना गया है। इसके संरक्षण हेतु व्यय रॉबर्ट विलियम चैलेन्ज ग्रांट द्वारा वहन किया जाता है।<ref name="Publishing2008"/> वर्ष २००५ के आंकड़ों के अनुसार दुर्ग में ८७ हाथी रहते थे, जिनमें से कई हाथी पैसों की कमी के कारण कुपोषण के शिकार थे।<ref name="Ghosh2005">{{cite book|last=घोष|first=र्हिया|title= कड़ियों में ईश्वर [Gods in chains]|url=https://books.google.com/books?id=3Av0YQXO1mgC&pg=PT24|accessdate= १९ अप्रैल २०११|year=२००५|publisher= फ़ाउण्डेशन बुक्स|isbn=978-81-7596-285-9|page=24| language= अंग्रेज़ी}}</ref>
 
 
आमेर विकास एवं प्रबन्धन प्राधिकरण (''आमेर डवलपमेण्ट एण्ड मैनेजमेण्ट अथॉरिटी'' (एडीएमए)) द्वारा आमेर महल एवं परिसर में ४० करोड़ रुपये ( ८.८८ मिलियन [[अमेरिकी डॉलर|अमरीकी डॉलर]]) का व्यव संरक्षण एवं विकास कार्यों में किया गया है। हालांकि इन संरक्षण एवं पुनरोद्धार कार्यों को प्राचीन संरचनाओं की ऐतिहासिकता और स्थापत्य सुविधाओं को बनाए रखने के लिए उनकी उपयोगिता के संबंध में गहन वाद-विवादों, चर्चाओं एवं विरोधों का सामना करना पड़ा है। एक अन्य मुद्दा इस स्मारक के व्यावसायीकरण संबंधी भी उठा है।<ref>{{Cite news|url=http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2009-01-03/jaipur/28018732_1_adma-Amer-development-jaleb-chowk|title= आमेर महल पुनरोद्धार: इतिहास से छेड़छाड़? [Amer Palace renovation: Tampering with history?]| language= अंग्रेज़ी|accessdate= १९ अप्रैल २०११|publisher=[[टाइम्स ऑफ़ इण्डिया]]|date= ३ जून २००९}}</ref>
 
एक फ़िल्म शूटिंग करते हुए एक बड़ी फिल्म निर्माण कंपनी से एक ५०० वर्ष पुराना झरोखा गिर गया तथा चाँद महल की पुरानी चूनेपत्थर की छत को भी क्षति पहुंची है। कंपनी ने अपने सेट्स खड़े करने हेतु यहाँ छेद ड्रिल किये तथा जलेब चौक पर खूब रेत भी फ़ैलायी और इस तरह राजस्थान स्मारक एवं पुरातात्त्विक स्थल एवं एन्टीक अधिनियम (१९६१) की उपेक्षा एवं उल्लंघन किया था।<ref name= High>{{Cite news|url=http://timesofindia.indiatimes.com/Cities/Film-crew-drilled-holes-into-historic-Amer/rssarticleshow/4134002.cms|title= फ़िल्म दल ने आमेर में ड्रिल किये [ Film crew drilled holes in Amer]|accessdate= १९ अप्रैल २०११|publisher=[[टाइम्स ऑफ़ इण्डिया]]| language= अंग्रेज़ी|date=१६ फ़रवरी २००९}}</ref>
 
[[राजस्थान उच्च न्यायालय]] की जयपुर बेंच ने हस्तक्षेप कर शूटिंग को बंद करवाया। इस बारे में उनका निरीक्षण उपरांत कथन था: "दुर्भाग्यवश न केवल जनता बल्कि विशेषकर संबंधित अधिकारीगण भी पैसे की चमक से अंधे, बहरे और गूंगे बन गए हैं, और ऐसे ऐतिहासिक संरक्षित स्मारक आय का एक स्रोत मात्र बन कर रह गए हैं।"<ref name= High/>