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[[लाला लाजपत राय]] की मौत का बदला लेने के लिये जब योजना बनी तो साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का पूरा साथ दिया था। यही नहीं, सन् १९२९ में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किये जाने के विरोध में राजनीतिक बन्दियों द्वारा की गयी व्यापक हड़ताल में बढ़-चढ़कर भाग भी लिया था। गान्धी-इर्विन समझौते के सन्दर्भ में इन्होंने एक खुला खत गान्धी के नाम [[अंग्रेजी]] में लिखा था जिसमें इन्होंने महात्मा जी से कुछ गम्भीर प्रश्न किये थे। उनका उत्तर यह मिला कि निर्धारित तिथि और समय से पूर्व जेल मैनुअल के नियमों को दरकिनार रखते हुए २३ मार्च १९३१ को सायंकाल ७ बजे सुखदेव, राजगुरु और [[भगत सिंह]] तीनों को [[लाहौर]] सेण्ट्रल जेल में [[फाँसी]] पर लटका कर मार डाला गया। इस प्रकार भगत सिंह तथा राजगुरु के साथ सुखदेव भी मात्र २३वर्ष की आयु में शहीद हो गये।
 
[[File:Statues of Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev.jpg|thumb|भगत सिंह,राजगुरु एवं सुखदेव ]]
'''शहादत :'''
 
भारत माता के सपूत [[भगत सिंह]], [[राजगुरु]] और सुखदेव को लाहौर के केंद्रीय कारागार में 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे तीनो ने हंसते-हंसते फ़ाँसी के फंदे को अपने गले से लगा लिया और अपनी मात्रभूमि की आज़ादी के लिए शहीद हो गए. और सुखदेव सिर्फ 24 साल की उम्र में वे शहीद हो गए.
 
'''फाँसी की तिथि  :'''
 
इतिहासकार को कहना हैं कि फाँसी की तिथि 24 मार्च निर्धारित थी. लेकिन फाँसी को लेकर जनता में बढ़ते रोष [[भारत]] के तमाम राजनैतिक नेताओं द्वारा अत्यधिक दबाव और कई अपीलों को ध्यान में रखते हुए फाँसी के बाद उत्पन्न होने वाली स्थितियों से डरे अंग्रेजो ने निर्धारित तिथि से एक दिन पहले '''23 मार्च, 1931''' की शाम को ही आज़ादी के दीवानों को फाँसी दे दी.[[File:Statues of Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev.jpg|thumb|भगत सिंह,राजगुरु एवं सुखदेव ]]
 
 
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
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