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'''(12)''' और साठ नाड़ियों से एक दिवस (दिन और रात्रि) बनते हैं। तीस दिवसों से एक मास (महीना) बनता है। एक नागरिक (सावन) मास सूर्योदयों की संख्याओं के बराबर होता है।
 
'''(13)''' एक चंद्र मास, उतनी चंद्र तिथियों से बनता है। एक सौर मास सूर्य के राशि में प्रवेश से निश्चित होता है। बारह मास एक वरषवर्ष बनाते हैं। एक वरषवर्ष को देवताओं का एक दिवस कहते हैं।
 
'''(14)''' देवताओं और दैत्यों के दिन और रात्रि पारस्परिक उलटे होते हैं। उनके छः गुणा साठ देवताओं के (दिव्य) वर्ष'''दिव्यवर्ष''' होते हैं। ऐसे ही दैत्यों के भी होते हैं।
 
'''(15)''' बारह सहस्र (हज़ारहजार) दिव्य वर्षों को एक [[चतुर्युग]] कहते हैं। यह चार लाख बत्तीस हज़ारहजार सौर वर्षों का होता है।
 
'''(16)''' चतुर्युगी की उषा और संध्या काल होते हैं। [[कॄतयुग]] या [[सतयुग]] और अन्य युगों का अन्तर, जैसे मापा जाता है, वह इस प्रकार है, जो कि चरणों में होता है:
'''(21)''' इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु एक सौ वर्ष होती है; उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है।
 
'''(22)''' इस कल्प में, छः मनु अपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब सातवें मनु (वैवस्वत: विवस्वान (सूर्य) के पुत्र) का सत्तैसवांसत्ताइसवां चतुर्युगी बीत चुका है।
 
'''(23)''' वर्तमान में, अट्ठाईसवांअट्ठाइसवां चतुर्युगी का कॄतयुगकृतयुग बीत चुका है। उस बिन्दु से समय का आकलन किया जाता है।
 
हिन्दू समय मापन, ('''काल व्यवहार''') का सार निम्न लिखित है: