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*(४) '''गोलपाद ''' (५० छंद): [[आकाशीय गोले|आकाशीय क्षेत्र]] के ज्यामितिक /[[त्रिकोणमिति|त्रिकोणमितीय]] पहलू, [[क्रांतिवृत्त]], [[आकाशीय भूमध्य रेखा]], आसंथि, पृथ्वी के आकार, दिन और रात के कारण, क्षितिज पर [[राशिचक्र चिन्ह|राशिचक्रीय संकेतों]] का बढ़ना आदि की विशेषताएं।
 
इसके अतिरिक्त, कुछ संस्करणों अंत में कृतियों की प्रशंसा आदि करने के लिए कुछ [[कालफ़न (प्रकाशन)|पुश्पिकाएंपुष्पिकाएं]] भी जोड़ते हैं।
 
आर्यभटीय ने गणित और खगोल विज्ञान में पद्य रूप में, कुछ नवीनताएँ प्रस्तुत की, जो अनेक सदियों तक प्रभावशाली रही। ग्रंथ की संक्षिप्तता की चरम सीमा का वर्णन उनके शिष्य [[भास्कर प्रथम]] (''भाष्य '', ६०० और) द्वारा अपनी समीक्षाओं में किया गया है और अपने ''आर्यभटीय भाष्य'' (१४६५) में [[नीलकंठ सोमयाजी]] द्वारा।
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