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ऐहलौकिकता, श्रृंगारिकता, नायिकाभेद और अलंकार-प्रियता इस युग की प्रमुख विशेषताएं हैं। प्रायः सब कवियों ने ब्रज-भाषा को अपनाया है। स्वतंत्र कविता कम लिखी गई, रस, अलंकार वगैरह काव्यांगों के लक्षण लिखते समय उदाहरण के रूप में - विशेषकर श्रृंगार के आलंबनों एवं उद्दीपनों के उदाहरण के रूप में - सरस रचनाएं इस युग में लिखी गईं। भूषण कवि ने वीर रस की रचनाएं भी दीं। भाव-पक्ष की अपेक्षा कला-पक्ष अधिक समृद्ध रहा। शब्द-शक्ति पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, न नाटयशास्त्र का विवेचन किया गया। विषयों का संकोच हो गया और मौलिकता का ह्रास होने लगा। इस समय अनेक कवि हुए— [[केशव]], [[कवि चिंतामणि|चिंतामणि]], [[कवि देव|देव]], [[बिहारी]], [[मतिराम]], [[भूषण]], [[घनानंद]], [[पद्माकर]] आदि। इनमें से [[केशव]], [[बिहारी (साहित्यकार)|बिहारी]] और [[भूषण]] को इस युग का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है। बिहारी ने दोहों की संभावनाओं को पूर्ण रूप से विकसित कर दिया। आपको रीति-काल का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है।
 
इस काल के कवियों को दोतीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-
 
(1) [[रीतिमुक्तरीतिबद्ध कवि]]
 
(2) [[रीतिसिद्धरीतिमुक्त कवि]]
 
(३) [[रीतिसिद्ध कवि]]
 
विद्वानों का यह भी मत हॅ कि इस काल के कवियों ने काव्य में मर्यादा का पूर्ण पालन किया है। घोर शृंगारी कविता होने पर भी कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन देखने को नहीं मिलता है।