"सुभाष चन्द्र बोस" के अवतरणों में अंतर

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पिता की इच्छा थी कि सुभाष आईसीएस बनें किन्तु उनकी आयु को देखते हुए केवल एक ही बार में यह परीक्षा पास करनी थी। उन्होंने पिता से चौबीस घण्टे का समय यह सोचने के लिये माँगा ताकि वे परीक्षा देने या न देने पर कोई अन्तिम निर्णय ले सकें। सारी रात इसी असमंजस में वह जागते रहे कि क्या किया जाये। आखिर उन्होंने परीक्षा देने का फैसला किया और 15 सितम्बर 1919 को इंग्लैण्ड चले गये। परीक्षा की तैयारी के लिये लन्दन के किसी स्कूल में दाखिला न मिलने पर सुभाष ने किसी तरह किट्स विलियम हाल में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान की ट्राइपास (ऑनर्स) की परीक्षा का अध्ययन करने हेतु उन्हें प्रवेश मिल गया। इससे उनके रहने व खाने की समस्या हल हो गयी। हाल में एडमीशन लेना तो बहाना था असली मकसद तो आईसीएस में पास होकर दिखाना था। सो उन्होंने 1920 में वरीयता सूची में चौथा स्थान प्राप्त करते हुए पास कर ली।
 
इसके बाद सुभाष ने अपने बड़े भाई शरतचन्द्र बोस को पत्र<ref>{{citecute and funny and funn book |last1=क्रान्त|first1=मदनलाल वर्मा |authorlink1= |last2= |first2= |editor1-first= |editor1-last= |editor1-link= |others= |title=स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास |url=http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 |format= |accessdate= |edition=1 |series= |volume=2 |date= |year=2006 |month= |origyear= |publisher=प्रवीण प्रकाशन |location=नई दिल्ली |language=Hindi |isbn= 81-7783-120-8|oclc= |doi= |id= |page=501 से 503 तक |pages= |chapter= |chapterurl= |quote=भइया! हम लोग, जो एक ओर स्वामी विवेकानन्द और दूसरी ओर अरविन्द घोष के प्रभाव-छत्र में बड़े हुए हैं; भाग्य या दुर्भाग्य से ऐसी मानसिकताबना चुके हैं कि ध्रुवों जैसे भिन्न दृष्टिकोणों पर लदा कोई समझौता हमें स्वीकार नहीं है। उन्होंने इस बात के लिये खेद भी प्रकट किया कि उनके और मात्र उनके कारण भरे पूरे समंजित परिवार में मतभेद पैदा हो चुके हैं। इसका कारण उन्होंने यह बताया कि बचपन से ही कुछ ऐसे आदर्श उनके दिलो-दिमाग पर हावी हो चुके हैं जो परिवार के किसी दूसरे व्यक्ति को मंजूर नहीं हैं।|ref= |bibcode= |laysummary= |laydate= |separator= |postscript= |lastauthoramp=}}</ref>
लिखकर उनकी राय जाननी चाही कि उनके दिलो-दिमाग पर तो [[स्वामी विवेकानन्द]] और महर्षि [[अरविन्द घोष]] के आदर्शों ने कब्जा कर रक्खा है ऐसे में आईसीएस बनकर वह अंग्रेजों की गुलामी कैसे कर पायेंगे? 22 अप्रैल 1921 को भारत सचिव ई०एस० मान्टेग्यू को आईसीएस से त्यागपत्र देने का पत्र लिखा। एक पत्र देशवन्धु चित्तरंजन दास को लिखा। किन्तु अपनी माँ प्रभावती का यह पत्र मिलते ही कि "पिता, परिवार के लोग या अन्य कोई कुछ भी कहे उन्हें अपने बेटे के इस फैसले पर गर्व है।" सुभाष जून 1921 में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान में ट्राइपास (ऑनर्स) की डिग्री के साथ स्वदेश वापस लौट आये।
 
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