"क्रमचय-संचय" के अवतरणों में अंतर

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:''स्थानान्तमेकादिचयाङ्कघातः संख्याविभेदाः नियतैस्युरङ्कैः।
:''भक्तोsङ्कमित्याङ्कसमासनिघ्नः स्थानेषु युक्तः मितिसंयुतिः स्यात्॥<ref>[http://www.sanskritdeepika.org/sandharb-sahitya/2017-09-09-20-20-16/leelavati/2017-10-28-05-00-36 अङ्क-पाशम् -१]</ref><ref>[www.sanskrit.nic.in/svimarsha/V3/c5.pdf लीलावती में भास्कराचार्य का गणितचातुर्य]</ref>
At number of places which are filled with equal nymbers of digits, place 1, 2, 3, 4 ... in increasing order. The product of these (placed) digits is the required number of permutations.
 
 
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में क्रमचय-संचय के अध्ययन ने त्वरित गति प्राप्त की और इस विषय के दर्जनों जर्नल अस्तित्व में आये तथा इस विषय पर कई [[संगोष्ठी|संगोष्ठियाँ]] हुईँ।
 
==सन्दर्भ==
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== इन्हें भी देखें ==