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15वें अनुवाक् में टेलेमैकस अपनी माँ के पाणिग्रहणार्थियों के षड्यंत्र से बचकर सुरक्षित घर लौट आता है। 16वें अनुवाक् में टेलेमैकस शूकरपाल के घर में अपने पिता को पहचान लेता है। पश्चात् पितापुत्र पिनलोपी के पाणिग्रहणार्थियों से छुटकारा पाने की योजना बनाते हैं। 17वें तथा 18वें अनुवाक् में भिक्षुकवेशी ओदिसियस अपने प्रासाद में पहुँचता है जहाँ उसका पुराना कुत्ता एरगस उसे पहचानकर खुशी के मारे दम तोड़ देता है। इसी समय ओदिसियस प्रासाद में उपस्थित पिनलोपी के पाणिग्रहणार्थियों का औद्धत्य देखता है जिससे आगे चलकर उन्हें मारने के उसके भयंकर कृत्य की उचित भूमिका भी बन जाती है। 19वें अनुवाक् में ओदिसिय तथा पिनलोपी की आमने सामने बातचीत होती है परंतु पिनलोपी अपने पति को पहचान नहीं पाती, जबकि उसकी पुरानी धाय यूरीक्लिया उसके पैर में बचपन में बने क्षतचिह्न को देखकर उसे पहचान जाती है। 20 वें अनुवाक् में ओदिसियस गुस्से के कारण रात भर जागकर अनेक बातें सोचता रहता है।
 
21 वें अनुवाक् में पिनलोपी अपने पाणिग्रहणार्थियों को चुनौती देती है कि वे सब पारी पारी ओदिसियस के धनुष का चिल्ला चढ़ाकर इस तरह तीर चलाएँ कि वह विशाल वृक्ष में टँगे 12 छल्लों के बीच से निकल जाए। सब असफल होते हैं किंतु भिक्षुकवेशी ओदिसियस छल्लों के बीच से तीर निकाल देता है। 22 वें अनुवाक् में महाकाव्य का चरमोत्कर्ष है। ओदिसियस पिनलोपी के सारे पाणिग्रहणार्थियों को तीरों से बेधकर मार देता है। कोई भी एक, बचकर निकल नहीं पाता, क्योंकि विशाल कक्ष के सभी दरवाजें पहले ही बंद कर दिए गए थे 23वें अनुवाक् में पिनलोपी अपने पति को पहचानती है और दोनों के मिलन का हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी दृश्य सामने आता है। महा काव्य के अंतिम अथवा 24वें अध्याय में, जिसे कुछ आलोचक प्रक्षिप्त मानते हैं, देवदूत मरकरी पिनलोपी के सभी पाणिग्रहणार्थियों की आत्माओं को नरक के निचले एवं निकृष्ट प्रदेशों में ले जाता है जहाँ उन्हें विभिन्न प्रकार के त्रासमय दंड दिए जाते हैं। इसी बीच ओदिसियस नगर के बाहर खेतों में जाकर अपने पिता लैरटीज़ से मिलता है। अंत में ओदिसियस के घर लौट आने के उपलक्ष में शानदार दावत होती है और इथाका में सुखशांति स्थापित होने की सूचना के साथ ग्रंथ का समापन हो जाता है।<ref>इस अनुभाग के अंतर्गत लिखी गयी पूरी सामग्री [[हिंदी विश्वकोश]], खंड-2, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, द्वितीय संस्करण-1975 ई०, पृष्ठ-297-298 से यथावत उद्धृत है, जिसके मूल लेखक कैलासचंद्र शर्मा हैं।</ref>
 
== कथा कौशल ==