"भारतीय दण्ड संहिता" के अवतरणों में अंतर

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भारतीय दण्ड संहिता ब्रिटिश काल में सन् १८६२ में लागू हुई। इसके बाद इसमे समय-समय पर संशोधन होते रहे (विशेषकर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद)। [[पाकिस्तान]] और [[बांग्लादेश]] ने भी भारतीय दण्ड संहिता को ही लागू किया। लगभग इसी रूप में यह विधान तत्कालीन अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों ([[बर्मा]], [[श्रीलंका]], [[मलेशिया]], [[सिंगापुर]], [[ब्रुनेई]] आदि) में भी लागू की गयी थी।
 
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==अध्याय १==
;उद्देशिका
 
* '''धारा १''' संहिता का नाम और उसके प्रर्वतन का विस्तार
* '''धारा २''' भारत के भीतर किए गये अपराधों का दण्ड
==अध्याय २==
;साधारण स्पष्टीकरण|
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* '''धारा ६''' संहिता में की परिभाषाओं का अपवादों के अध्यधीन समझा जाना
* '''धारा ७''' एक बार स्पष्टीकृत पद का भाव
==अध्याय ३==
;दण्डों के विषय में
 
* '''धारा ५३''' दण्ड
* '''धारा ५३''' क निर्वसन के प्रति निर्देश का अर्थ लगाना
* '''धारा ८६''' किसी व्यक्ति द्वारा, जो मत्तता में है, किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय या ज्ञान का होना अपेक्षित है
* '''धारा ८७''' सम्मति से किया गया कार्य जिसमें मृत्यु या घोर उपहति कारित करने का आशय हो और न उसकी सम्भव्यता का ज्ञान हो
* '''धारा ८८''' किसी व्यक्ति के फायदे के लिये सम्मति से सदभवनापूर्वक किया गया कार्य जिससे मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है धारा ८९ संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से शिशु या उन्मत्त व्यक्ति के फायदे के लिये सदभवनापूर्वकसद्भावनापूर्वक किया गया कार्य
* '''धारा ९०''' सम्मति
** उन्मत्त व्यक्ति की सम्मति
** शिशु की सम्मति
* '''धारा ९१''' एसे कार्यों का अपवर्णन जो कारित अपहानि के बिना भी स्वत:स्वतः अपराध है
* '''धारा ९२''' सम्मति के बिना किसी ब्यक्ति के फायदे के लिये सदभावना पूर्वक किया गया कार्य
* '''धारा ९३''' सदभावनापूर्वक दी गयी संसूचना
* '''धारा ९५''' तुच्छ अपहानि कारित करने वाला कार्य
 
;निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय में
 
निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय में
 
* '''धारा ९६''' निजी प्रतिरक्षा में दी गयी बातें
 
==अध्याय ५ क==
;आपराधिक षडयंत्रषडयन्त्र
* '''धारा १२० क''' आपराधिक षडयंत्र की परिभाषा
* '''धारा १२० ख''' आपराधिक षडयंत्र का दण्ड