"अंग्रेजी हटाओ आंदोलन" के अवतरणों में अंतर

(भूमिका ठीक की।)
यह यह आंदोलन सफल होता तो आज भाषाई त्रासदी का यह दौर न देखना पडता। लोहिया इस तर्क कि "अंग्रेजी का विरोध न करें, हिन्दी का प्रचार करें" की अंतर्वस्तु को भली भांति समझते थे। वे जानते थे कि यह एक ऐसा भाषाई षडयंत्र है जिसके द्वारा औपनिवेशिक संस्कृति की मृत प्राय अमरबेल को पुन: पल्लवित होने का अवसर प्राप्त हो जायेगा। उनका कहना था,
: ''जिस जबान में सरकार का काम चलता है, इसमें समाजवाद तो छोड़ ही दो, प्रजातंत्र भी छोड़ो, इमानदारी और बेईमानी का सवाल तक इससे जुड़ा हुआ है। यदि सरकारी और सार्वजनिक काम ऐसी भाषा में चलाये जाएँ, जिसे देश के करोड़ों आदमी न समझ सकें, तो यह केवल एक प्रकार का जादू-टोना होगा। जिस किसी देश में जादू-टोना-टोटका चलता है, वहां क्या होता है? जिन लोगों के बारे में मशहूर हो जाता है कि वे जादू वगैरह से बीमारियाँ आदि अच्छी कर सकते है, उनकी बन आती है। ऐसी भाषा में जितना चाहे झूठ बोलिए, धोखा कीजिये, सब चलता रहेगा, क्योंकि लोग समझेंगे ही नहीं। आज शासन में लोगो की दिलचस्पी हो तो कैसे हो'' – डॉ॰ राममनोहर लोहिया.
 
१९६७ के नवम्बर माह में [[काशी हिन्दू विश्वविद्यालय]] के छात्रनेता [[देवव्रत मजूमदार]] के नेतृत्व में 'अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन' किया गया था जिसका असर पूरे देश पर पड़ा। उस समय इंजीनियरिंग के छात्र देवव्रत मजूमदार बीएचयू छात्रसंघ के अध्यक्ष थे। २८ नवम्बर १९६७ को मजूमदार के आह्वान पर बनारस में राजभाषा संशोधन विधेयक के विरोध में पूर्ण हड़ताल हुई। सभी व्यापारिक प्रतिष्ठान और बाजार बंद रहे और गलियों-चौराहों पर मशाल जुलूस निकले।
 
==सन्दर्भ==