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इसके एक दिन बार फ़िराक़ ने कहा, "मैं मीना कुमारी की वजह से वहां से नहीं हटा था। आयोजकों और दर्शकों के व्यवहार के कारण वहां से हटा, जिन्होंने हमारी बेइज्जती की थी।" उनकी दलील थी कि, "मुशायरा शायरी का मंच है। यहां के कलाकार सिर्फ शायर होते हैं और यहां की व्यवस्था में एक पदानुक्रम होता है जिसका पालन किया जाना चाहिए।”
 
यहाँ ये बता देना ज़रूरी है कि फ़िराक़ गोरखपुरी (मूल नाम रघुपति सहाय; 28 अगस्त 1896—3 मार्च 1982) उर्दू भाषा के प्रसिद्ध रचनाकार है। उनका जन्म गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में कायस्थ परिवार में हुआ। इनकी शिक्षा अरबी, फारसी और अंग्रेजी में हुई।
 
'''<big>शा'यरा</big>''' '''<big>मीना कुमारी जी की दो ग़ज़लें</big>'''
 
'''(1.)'''
 
''आबला-पा कोई इस दश्त में आया होगा''
 
''वर्ना आँधी में दिया किस ने जलाया होगा''
 
''ज़र्रे ज़र्रे पे जड़े होंगे कुँवारे सज्दे''
 
''एक इक बुत को ख़ुदा उस ने बनाया होगा''
 
''प्यास जलते हुए काँटों की बुझाई होगी''
 
''रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा''
 
''मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर''
 
''अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा''
 
''ख़ून के छींटे कहीं पूछ न लें राहों से''
 
''किस ने वीराने को गुलज़ार बनाया होगा''
 
'''(2.)'''
 
''आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता''
 
''जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता''
 
''जब ज़ुल्फ़ की कालक में घुल जाए कोई राही''
 
''बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता''
 
''हँस हँस के जवाँ दिल के हम क्यूँ न चुनें टुकड़े''
 
''हर शख़्स की क़िस्मत में इनआ’म नहीं होता''
 
''दिल तोड़ दिया उस ने ये कह के निगाहों से''
 
''पत्थर से जो टकराए वो जाम नहीं होता''
 
''दिन डूबे है या डूबी बारात लिए कश्ती''
 
''साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता''
 
==मृत्यु==
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