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'''लेखा शास्त्र''' शेयर धारकों और [[प्रबन्धन|प्रबंधकों]] आदि के लिए किसी [[व्यावसायिक इकाई]] के बारे में वित्तीय जानकारी संप्रेषित करने की कला है।<ref>बैरी इलियट और जॅमी इलियट: ''फाइनेंशियल अकाउंटिंग एण्ड रिपोर्टिंग'', [[परेंटाइस हॉल]], लंदन 2004, ISBN 0-273-70364-1, पृष्ठ 3, [http://books।google।co।uk/books?id=82B1L70-xrsC&lpg=PP1&dq=Financial%20accounting%20and%20reporting&pg=PA3#v=onepage&q=&f=false Books।Google।co।uk]</ref> लेखांकन को 'व्यवसाय की भाषा' कहा गया है।<ref>Peggy Bishop Lane on [http://kwhs.wharton.upenn.edu/2013/09/peggy-bishop-lane-on-why-accounting-is-the-language-of-business/ Why Accounting Is the Language of Business], Knowledge @ Wharton High School, September 23, 2013, retrieved 25 Deember 2013</ref> [[हिन्दी]] में 'एकाउन्टैन्सी' के समतुल्य 'लेखाविधि' तथा 'लेखाकर्म' शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है।
 
लेखाशास्त्र [[गणितीय विज्ञान]] की वह शाखा है जो [[व्यवसाय]] में सफलता और विफलता के कारणों का पता लगाने में उपयोगी है। लेखाशास्त्र के [[सिद्धांत]] व्यावसयिक इकाइयों पर व्यावहारिक कला के तीन प्रभागों में लागू होते हैं, जिनके नाम हैं, लेखांकन, [[बही-खाता|बही-खाता (बुक कीपिंग)]], तथा [[लेखा परीक्षा|लेखा परीक्षा (ऑडिटिंग)]]।<ref>गुडइयर, लॉयड अर्नेस्ट: ''प्रिंसिपल्स ऑफ अकाउंटेंसी'', गुडइयर-मार्शल प्रकाशन कंपनी, [[सेडर रैपिड्स, लोवा]], 1913, पृष्ठ 7 [http://www।archive।org/download/principlesofacco00goodrich/principlesofacco00goodrich।pdf Archive।org]</ref>
 
== परिचय ==
'''{{मुख्य|लेखांकन का इतिहास}}'''
 
सर्वप्रथम प्रारंभिक लेखांकन के रिकॉर्ड प्राचीन [[बेबीलॉन]], [[असीरिया]] और [[सुमेरिया]] के खंडहरों[[खंडहर]] ों में पाए गए, जो 7000 वर्षों से भी पहले की तारीख के हैं। तत्कालीन लोग फसलों और मवेशियों की वृद्धि को रिकॉर्ड करने के लिए प्राचीन लेखांकन की पद्धतियों पर भरोसा करते थे। क्योंकि कृषि और पशु पालन के लिए प्राकृतिक ऋतु होती है, अतः अगर फसलों की पैदावार हो चुकी हो या पशुओं ने नए बच्चे पैदा किए हों तो हिसाब-किताब कर [[अधिशेष]] को निर्धारित करना आसान हो जाता है।
 
== लेखांकन की विशेषताएँ==
लेखांकन व्यावसायिक सम्पत्तियों के अनुचित एवं अवांछनीय उपयोग से सुरक्षा करता है। ऐसा लेखांकन द्वारा प्रबन्ध को निम्न सूचनाएं प्रदान करने के कारण सम्भव होता है -
 
*(१) व्यवसाय में स्वामियों के कोषों की विनियोजित राशि,
*() व्यवसायव्यावसाय को अन्य व्यक्तियों सेको कितना वसूल करनादेना है,
 
*() व्यावसायव्यवसाय को अन्य व्यक्तियों कोसे कितना देनावसूल करना है,
 
*(३) व्यवसाय को अन्य व्यक्तियों से कितना वसूल करना है,
 
*(४) व्यवसाय के पास स्थायी सम्पत्तियां, हस्तस्थ रोकड़, बैंक शेष तथा कच्चा माल, अर्द्ध-निर्मित माल एवं निर्मित माल का स्टॉक कितना है?
 
 
*'''(१) व्यापारिक लेन-देन को लिखित रूप देना आवश्यक होता है'''- व्यापार में प्रतिदिन अनगिनत लेन-देन होते हैं, इन्हें याद नहीं रखा जा सकता। इनको लिख लेना प्रत्येक व्यापारी के लिए आवश्यक होता है। पुस्तपालन के माध्यम से इन लेन-देनों को भली-भांति लिखा जाता है।
 
*(२)''' बेईमानी व जालसाजी आदि से बचाव के लिए लेन-देनों का समुचित विवरण रखना होता है''' - व्यापार में विभिन्न लेन-देनों में किसी प्रकार की बेईमानी, धोखाधड़ी व जालसाजी न हो सके, इसके लिए लेन-देनों का समुचित तथा वैज्ञानिक विधि से लेखा होना चाहिए। इस दृष्टि से भी पुस्तपालन को एक आवश्यक आवश्यकता समझा जाता है।
 
*(३)''' व्यापारिक करों के समुचित निर्धारण के लिए पुस्तकें आवश्यक होती हैं''' - एक व्यापारी अपने लेन-देनों के भली-भांति लिखने, लेखा पुस्तकें रखने तथा अन्तिम खाते आदि बनाने के बाद ही अपने कर-दायित्व की जानकारी कर सकता है। पुस्तपालन से लेन-देनों के समुचित लेखे रखे जाते हैं। विक्रय की कुल राशि तथा शुद्ध लाभ की सही व प्रामाणिक जानकारी मिलती है जिसके आधार पर विक्रय-कर व आयकर की राशि के निर्धारण में सरलता हो जाती है।
 
*(४)''' व्यापार के विक्रय-मूल्य के निर्धारण में पुस्तपालन के निष्कर्ष उपयोगी होते हैं''' - यदि व्यापारी अपने व्यापार के वास्तविक मूल्य को जानना चाहता है या उसे उचित मूल्य पर बेचना चाहता है तो लेखा पुस्तकें व्यापार की सम्पत्तियों व दायित्वों आदि के शेषों के आधार पर व्यापार के उचित मूल्यांकन के आंकड़े प्रस्तुत करती है।
 
== लेखांकन के लाभ ==
*'''1. पूंजी या लागत का पता लगाना'''- समस्त सम्पत्ति (जैसे मशीन, भवन, रोकड़ इत्यादि) में लगे हुए धन में से दायित्व (जैसे लेनदार, बैंक का ऋण इत्यादि) को घटाकर किसी विशेष समय पर व्यापारी अपनी पूंजी मालूम कर सकता है।
 
*'''2. विभिन्न लेन-देनों को याद रखने का साधन''' - व्यापार में अनेकानेक लेन-देन होते हैं। उन सबको लिखकर ही याद रखा जा सकता है और उनके बारे में कोई जानकारी उसी समय सम्भव हो सकती है जब इसे ठीक प्रकार से लिखा गया हो।
 
*'''3. कर्मचारियों के छल-कपट से सुरक्षा'''- जब लेन-देनों को बहीखाते में लिख लिया जाता है तो कोई कर्मचारी आसानी से धोखा, छल-कपट नहीं कर सकता और व्यापारी को लाभ का ठीक ज्ञान रहता है। यह बात विशेषकर उन व्यापारियों के लिये अधिक महत्व की है जो अपने कर्मचारियों पर पूरी-पूरी दृष्टि नहीं रख पाते हैं।
 
*'''4. समुचित [[आयकर]] या बिक्री कर लगाने का आधार'''- अगर बहीखाते ठीक रखे जायें और उनमें सब लेनदेन लिखित रूप में हों तो कर अधिकारियों को कर लगाने में सहायता मिलती है क्योंकि लिखे हुए बहीखाते हिसाब की जांच के लिए पक्का सबूत माने जाते हैं।
 
*'''5. व्यापार खरीदने बेचने में आसानी''' - ठीक-ठीक बहीखाते रखकर एक व्यापारी अपने कारोबार को बेचकर किसी सीमा तक उचित मूल्य प्राप्त कर सकता है। साथ ही साथ खरीदने वाले व्यापारी को भी यह संतोष रहता है कि उसे खरीदे हुऐ माल का अधिक मूल्य नहीं देना पड़ा।
 
**'''6. अदालती कामों में बहीखातों का प्रमाण (सबूत) होना'''- जब कोई व्यापारी दिवालिया हो जाता है (अर्थात् उसके ऊपर ऋण, उसकी सम्पत्ति से अधिक हो जाता है) तो वह न्यायालय में बहीखाते दिखाकर अपनी निर्बल स्थिति का सबूत दे सकता है और वह न्यायालय से अपने को दिवालिया घोषित सकता है। उसके ऐसा करने पर उसकी सम्पत्ति उसके महाजनों के अनुपात में बंट जाती है और व्यापारी ऋणों के दायित्व से छूट जाता है। यदि बहीखाते न हों तो न्यायालय व्यापारी को दिवालिया घोषित करने में संदेह कर सकता है।
 
*'''7. व्यापारिक लाभ-हानि जानना''' - बही खातों में व्यापार व लाभ-हानि खाते निश्चित समय के अन्त में बनाकर कोई भी व्यापारी अपने व्यापार में लाभ या हानि मालूम कर सकता है।
 
*'''8. पिछले आँकड़ों से तुलना''' - समय-समय पर व्यापारिक आँकड़ों द्वारा अर्थात् क्रय-विक्रय, लाभ-हानि इत्यादि की तुलना पिछले सालों के आंकड़ों से करके व्यापार में आवश्यक सुधार किए जा सकते हैं।
 
*'''9. वस्तुओं की कीमत लगाना'''- यदि व्यापारी माल स्वयं तैयार कराता है और उन सब का हिसाब बहीखाते बनाकर रखता है तो उसे माल तैयार करने की लागत मालूम हो सकती है। लागत के आधार पर वह अपनी निर्मित वस्तुओं का विक्रय मूल्य निर्धारित कर सकता है।
 
*'''10. आर्थिक स्थिति का ज्ञान'''- बहीखाते रखकर व्यापारी हर समय यह मालूम कर सकता है कि उसकी व्यापारिक स्थिति संतोषजनक है अथवा नहीं।
 
* व्यक्तिगत खाते (Personal accounts)
:* 1. एक व्यक्ति का खाता, (जैसे राम का खाता, मोहन का खाता, पूंजी खाता)
:* 2. फर्म का खाता (जैसे गुप्ता ब्रदर्स, मै. गणेश प्रसाद राजीव कुमार)
 
* अव्यक्तिगत खाते (Impersonal accounts)
 
*1. '''सामान्यतः स्वीकृत लेखांकन सिद्धान्त''' : वित्तीय विवरण सामान्यतः स्वीकृत लेखांकन सिद्धान्त के अनुसार तैयार किये जाने चाहिए ताकि इनसे अन्तः अवधि तथा अन्तः कर्म की तुलना की जा सके।
 
*2. '''लेखांकन सिद्धान्त''' - किसी व्यवस्था या कार्य के नियंत्रण हेतु प्रतिपादित कोई विचार जिसे व्यावसायिक वर्ग के सदस्यों द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। ये मनुष्य द्वारा निर्मित हैं। रसायन एवं भौतिक विज्ञान की तरह सार्वभौमिक नहीं है।
*3. लेखाशास्त्र के सिद्धान्त सामान्य रूप से तभी स्वीकृत होते है जब उनमें तीन लक्षण विद्यमान हों, ये हैं - सम्बद्धता, वस्तु परकता एवं सुगमता
 
*3. लेखाशास्त्र के सिद्धान्त सामान्य रूप से तभी स्वीकृत होते है जब उनमें तीन लक्षण विद्यमान हों, ये हैं - सम्बद्धता, वस्तु परकता एवं सुगमता
 
*4. '''सत्ता की अवधारणा''' - व्यवसाय का उसके स्वामियों तथा प्रबंधकों से स्वतंत्र एवं पृथक अस्तित्व होता है। अतः व्यवसाय का स्वामी भी पूँजी के लिए व्यवसाय का लेनदार माना जाता है। व्यवसाय के स्वामी का पृथक् अस्तित्व माना जाता है। लाभों का एक भाग जो स्वामी के हिस्से में आता है देय होता है और चालू दायित्व का।
 
*5. '''मुद्रा माप संबंधी अवधारणा''' - लेखांकन मौद्रिक व्यवहारों से संबंधित है अमौद्रिक घटनाएँ जैसे - कर्मचारियों को ईमानदारी, स्वामिभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा आदि का लेखांकन नहीं किया जा सकता।
 
*6. '''निरन्तरता की अवधारणा''' - यह बताती है कि व्यवसाय दीर्घकाल तक निरन्तर चलता रहेगा, जब तक कि कोई विपरीत कारण न हो। अमूर्त सम्पत्तियों तथा आस्थिगत व्ययों का उनकी उपयोगिता के आधार पर प्रतिवर्ष अपलेखन, स्थायी सम्पत्तियों को चिट्ठे में अपलिखित मूल्य पर इसी आधार पर दिखाया जाता है।
 
*7. '''लागत अवधारणा''' - निरन्तर की अवधारणा पर आधारित है जो यह बताती है कि सम्पत्तियों को उनके लागत मूल्य पर दर्ज किया जाता है।
 
*8. '''लेखांकन की दोहरा लेखा प्रणाली''' द्विपक्ष अवधारणा पर आधारित है जिसके अनुसार प्रत्येक डेबिट के बराबर क्रेडिट होता है। लेखांकन समीकरण द्विपक्ष अवधारणा पर आधारित है।
 
*9. व्यवसाय में आगत उस अवधि में प्राप्त मानी जाती है जब ग्राहक के मूल्य के बदले माल या सेवायें दी जाती है। किन्तु दीर्घकालीन ठेकों, सोने की खानों, जहाँ आय प्राप्ति अनिश्चित हो, में आगम सुपुर्दगी देने पर नहीं मानी जाती।
 
*10. '''उपार्जन अवधारणा''' के अनुसार व्यवसाय में आय-व्यय के मदों का लेखा देय आधार पर किया जाता है - जो कि उस अवधि से संबंधित हो।
 
*11. '''लेखा अवधि की अवधारणा''' के आधार पर प्रत्येक लेखा अवधि के अन्त में वर्ष भर किये गये व्यवहारों के आधार पर लाभ-हानि खाता तथा चिट्ठा बनाया जाता है। सत्ता और मुद्रा मापन लेखांकन की मौलिक अवधारणाएँ है।
 
*12. मिलान की अवधारणा उपार्जन की अवधारणा पर आधारित है।
 
*13. कालबद्धता की संकल्पना को मिलान की अवधारणा लागू करते समय अपनाया जाता है।
 
*14. लेखाकार को चाहिए कि वित्तीय विवरण पत्र पूर्णतया सत्य हो तथा समस्त महत्वपूर्ण सूचनाओं को इनमें प्रदर्शित किया गया हो। इसी आधार पर कम्पनयिँ पिछले वर्षां के तुलनात्मक आँकड़े अनुसूचियों के रूप में विस्तृत सूचनाएँ आदि शामिल करती है।
 
*15. लेखापाल को उन्हीं तथ्यों एव घटनाओं को वार्षिक लेखों में प्रदर्शित करना चाहिए जो कि महत्वपूर्ण हों। सारहीन तथ्यों की उपेक्षा करनी चाहिए।
 
*16. '''रूढ़िवादिता''' ( अनुदारवादिता) - के अनुसार एक लेखाकार को भावी संभाव्य सभी हानियों की व्यवस्था करनी चाहिए तथा भावी आय व लाभों को शामिल न करें। इस संकल्पना के आधार पर लेखाकार - देनदारों पर डूबत एवं संदिग्ध ऋणों व बट्टे के लिए आयोजन, स्टॉक का लागत मूल्य व बाजार मूल्य में से कम पर मूल्यांकन लेनदारों पर बट्टे के लिए आयोजन न करना, अमूर्त सम्पत्तियों का अपलेखन, मूल्य हृस का की क्रमागत हृस विधि को अपनाना, ऋणपत्रों के निर्गमन के समय ही शोधन पर देय प्रीमियम का प्रावधान करना, आदि करता है।
 
*17. '''महत्वपूर्णता या सारता''' एक व्यक्तिनिष्ठ मद है।
 
*18. लेखांकन की तीन आधारभूत मान्यताएँ है - सुदीर्घ संस्थान, सततता, उपार्जन।